
अभी हम रोहनिया के आसपास ही घूम रहे हैं चार दशक पहले भी रोहनिया के आसपास ऐसा ही था कोई विशिष्ट बदलाव नहीं आया सोन नदी के पानी के मामले में थोड़ा सा जागरूकता आई है किंतु चार दशक पहले सोन यात्री इस आदिवासी अंचल जो संविधान की पांचवी अनुसूची में सुरक्षित है उसे लेकर स्पष्ट रूप से सांस्कृतिक परिवर्तन पर चिंतित दिखाई देते थे जो क्षेत्र वैभवशाली पूर्व मध्यकालीन के अलंकरण से सुशोभित था जिसे भारत की पर्यटन नगरी होने का गौरव प्राप्त हो सकता था वह औद्योगिक साम्राज्यवाद के और उसके गुलामी में पल रहे नेताओं के कारण बर्बाद हो गया उसकी पहचान विशाल पुरातत्व क्षेत्र की न होकर आदिवासी अंचल की पिछड़ी पन की बनी रह गई उसकी सांस्कृतिक विरासत निश्चित रूप से तक्षशिला और नालंदा के विद्वानों की तरह भलाई ना हो किंतु जो हर 20-25 किलोमीटर में पुरातत्व की हजारों साल की पुरानी मूर्तियां और पत्थर मिलते हैं वह दवा ही देते हैं कि यहां विद्वानों का बड़ा मेला लगा करता था वह विद्वान धार्मिक पृष्ठभूमि के थे तांत्रिक पृष्ठभूमि के थे या आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के थे इसमें बहस हो सकती है किंतु इसमें कोई बहस नहीं हो सकती कि यह कभी मानव श्रृंखला के विकास का बड़ा संग्रहालय रहा होगा जहां पर मानव विकास क्रम के बदलावों की पद चाप को सुना जा सकता था जब से सोन का पुरुषार्थ यहां से गुजरा होगा तब से ही यहां आध्यात्मिक चेतना के तमाम चाहते आने लगे थे उन्होंने अपनी बसाहट भी बसाई थी सोने का पानी आज भी उसकी कहानी को बयां करता है किंतु लोकतंत्र आने के बाद लोकतंत्र के गिद्धों और चीजों ने इसकी विरासत को उसकी पहचान को अपना शिकार बनाने लगे उसके कुछ खंडहर पर आज भी अवशेष अपनी बात बताते हैं किंतु क्या कोई सुनने वाला है क्योंकि हम आदिवासी क्षेत्र के निवासी हैं इसलिए हम भी आदिवासी हैं हमारी नियति लुट जाने की है शोषण और दमन की है इसलिए उसकी वैभव को हम नहीं सुनना चाहते क्या । अन्यथा क्या कारण है की हर 20 -25 किलोमीटर हमारा पुरातत्व हमारा विरासत हमसे अपनी पहचान मांग रहा है और हम उसे औद्योगिक साम्राज्यवाद के राक्षसों के हवाले कर कर उसकी हत्या करना चाहते हैं तो देखे उसे समय 4 दशक पहले देवशरण मिश्रा ने गुजरते हुए सोन तट पर क्या देखा था……..
————————————( त्रिलोकीनाथ)——————————
लेकिन, जब से ऊपर के अमलई कागज कारखाने का दूषित रसायन सोन का पानी गंदा करने लगा, स्वामीजी यहां से उठकर चले गये । तब भी, उनका जमा-जमाया मेला यहाँ माघी मकर संक्रान्ति को लगता है । श्रावण नागपंचमी को मेला क्यों नहीं लगता, यह समझ में नहीं आया । फिर भी, सोन- के कारण अब पहले की-सी बात नहीं रही । मुड़ना-तट पर रहिकला गाँव में जलप्रदूषण अच्छे भी माघी मकर-संक्रांति को ही तीन-रोजा मेला लगता है । ये सभी मेले छोटे, देहाती बाजार की तरह, होते हैं । नगदहा घाट पर मध्यकालीन मूर्तियाँ तो हैं ही, रहिकला के निकट, जैसा कि हम पीछे कह आये हैं, मुड़ना-तट पर भी यथेष्ट मध्यकालीन मूर्तियाँ हैं; जिससे अनुमान होता है कि ये स्थान न केवल पूर्वमध्यकालीन प्रचलित मार्ग पर स्थित थे, बल्कि इधर अच्छी बस्तियाँ भी थीं । रोहनिया से हम लोग जब चले थे तब से नगदहा घाट तक रास्ता बिलकुल जंगलों से होकर गुजरता है, घोर जंगलों से होकर । नगदहा घाट के बाद थोड़ा जंगल मिला अवश्य; लेकिन तुरत बाद ढलान शुरू हो गयी, पठारी भूमि और खेतों से सजी ।
कुँवरसेजा की धरती काली मिट्टी की है, अगहनी फसल के लायक । भौतरा के सामने सड़क पकड़ी तो जंगल बिलकुल ही गायब हो गये । कहीं-कहीं धरती पर हरियाली मिलती है अवश्य । वह भी केवल रास्ते के नालों के दोनों तटों पर; अन्यथा सपाट मैदान, धूप से सेंका जाता हुआ । लगभग पौने दो बजे अपराह्न में हमलोग चँवरी पहुँचे । यह कोई बड़ा गाँव नहीं; लेकिन स्थानीय मापदंड के अनुसार यह सोहागपुर तहसील का अच्छा गाँव माना जाता है । दो टोलों के 60-65 वर होंगे, जिनमें आधे तो राजगोंड़ लोगों के हैं । गाँव में पहुँचने पर जैसे ही आतिथेय दरियावसिंह से वहाँ पहुँचने का अपना उद्देश्य बतलाया, वे झट नयी जगह दिखाने को तैयार हो गये । “चलिये, एक प्राचीन मंदिर दिखा लाऊँ । कोई अधिकदूर नहीं है, सिर्फ एक-डेढ़ मील चलना है ।”
उस दिन विशेष थके नहीं थे, झट तैयार हो गये । लेकिन यह क्या ? गाँव पारकिया, सड़क छोड़ दी। खेतों की नीची मेड़ पर काफी दूर चलने के बाद उसे भी छोड़कर झाड़-झंखाड़ के बीच हम प्रदेश करते हैं; तब भी मंदिर दिखाई नहीं पड़ता । झाड़-झंखाड़ के बाद ऊँचे पेड़ों के नीचे की छाया में चले, पटपढ़ा नाला पार किया, अरहर के खेत में घुसे । इस प्रकार दो मील चलते चले गये । तब देखते हैं कि दूर दो मंदिरों के शिखर दिखाई पड़ रहे हैं । फिर एक पगडंडी पर आधा मील से अधिक चलने पर हमलोग उस मंदिर के पास पहुँचे । देखा, वहाँ दो नहीं, तीन मंदिर थे । “यहाँ तीन नहीं, छोटे-छोटे और भी कई मंदिर थे ।” दरियावसिंह ने बताया, “आप देख रहे हैं न, पुराने पत्थरों को जोड़कर बनायी हुई नयी दीवालें । ये उन्हीं पुराने मंदिरों को तोड़कर बनायी गयी हैं । एक बाबा आये थे । वे ही अपने रहने के लिए बना रहे थे । यहाँ मेला लगाने का विचार था उनका । एक रोज उठे और अचानक कहीं चले गये । तब से यों ही सब पड़ा है । मढ़ी गाँव के निकट होने के कारण इस देवस्थान को हम लोग सीतामढ़ी कहते हैं ।”
मंदिर पूर्व मध्यकालीन थे अवश्य लेकिन जिस अलंकरण के लिए पूर्व मध्यकाल प्रसिद्ध है; वह अलंकरण इस मंदिरों में नहीं था । सम्भवतः, प्रारंभिक पूर्व-मध्यकाल का मंदिर होगा । अत्यन्त साधारण अलंकरण होने पर भी इन मंदिरों की निर्माणकला दर्शनीयथी । बड़े-बड़े पत्थर, बिना गारे के एक-दूसरे पर रखे हुए थे, जो प्रायः डेढ़ हजार वर्ष बाद भी अपनी जगह पर विद्यमान थे । खुले स्थान में ऊँचे चबूतरे पर बने होने के कारण वे मंदिर भव्य दिखाई पड़ रहे थे – पहले के लोक-विश्वास के अनुसार, अपने दैत्यों की सहायता से हेमाडपन्त जादूगर के द्वारा बिना गारे के एक ही रात में बनी कृति का एक नमूना, जिसे ‘हेमाडपन्ती शैली का स्थापत्य कहा गया है ।
जिस मंदिर में शिवलिंग स्थापित था, उसके द्वार के ऊपर कुछ बेतरतीब से रखे हुए पत्थर दिखे तो मैंने उनका ध्यान उस ओर आकर्षित किया । बोले-“हाँ इसकी एक अलग कहानी है | कई बरस पहले एक परदेसी आया था, इन मंदिरों को देखने की खातिर ही । अकेले ही आया था । वह जब चला गया तो लोगों ने दूसरे-तीसरे दिन या कई रोज बाद मंदिर का यह भाग टूटा देखा था । एक चीज और देखी गाँववालों ने, वह थी ऊँट की लीद । ऊँट कब आया, कव गया, कहाँ गया; यह किसी ने न देखा और न जाना ।”
वे फिर बोले—“आइए, एक और चीज दिखाऊँ आपको ।” मुश्किल से एक फर्लांग चले होंगे हमलोग कि सोन-तट पर पहुँच गये । वही गंदा पानी, जो अमलई के सामने से देखते आ रहे थे । बाबा ने क्यों यह जगह छोड़ दी, समझते देर न लगी ।
सोनतट का एक भाग, जो बीच में थोड़ा कट गया था, सोन के नीचे के पाट से दो पुरसा ऊँचा और ऊपर के तट से एक पुरसा नीचे । उस कटे भाग में गुफा-जैसी जमीन का कुछ खोखला भाग, जिसके सामने घनी वनस्पति लगी हुई थी, छोटे-बड़े झाड़ | एक साधारण खरोह बन गयी थी वहाँ, जो साधारणतः ऐसे स्थानों पर बन जाती है जब तट का पानी बरसात के दिनों में लगातार वह बहकर नदी में जाते समय जमीन काट-काटकरअपने बहाव के उपयुक्त मोटा रास्ता बना देता है । खरोह तो बरसाती जल से बनायी होगी, यह अनुमान किया जा सकता था – हालाँकि, वहाँ जमीन इतनी खड़ी थी कि बरसाती जल के द्वारा उस तरह खड़ा तट बनने की संभावना नहीं थी; लेकिन गुफानुमा जमीन के अन्दर का खोखला भाग ? यह कैसे बना ? क्या वरसात के समय सोन के बढ़े हुए जल की यह करामात है ?
दरियावसिंह बोले— “हम ग्रामवासियों का अनुमान है कि यह किसी सुरंग का मुँह है | हम लोगों का यह भी अनुमान है कि सुरंग का दूसरा मुँह इस प्राचीन मंदिर के आस- पास या उस ऊँचे चबूतरे के नीचे होना चाहिए, जिसपर ये मंदिर स्थापित हैं । प्राचीन मंदिरों के साथ धनसंपदा तो रहती ही थी । संभव है, मंदिर के पुजारियों अथवा रक्षकों ने यह सुरंग बनायी हो, ताकि किसी आक्रमण के समय मंदिर की संपत्ति सुरंग के द्वारा बाहर भेजकर बचायी जा सके । हम लोगों ने देखा है, सुरंग कुछ दूर बाद बंद हो गयी है ।” सुरंग- (खोखली जगह) की बनावट हमारे लिए नयी नहीं थी । केवल दो दिन पहले बिल्कुल इसी तरह का दृश्य हम रोहनिया में सोन -तट पर देख आये थे । इधर की भूमि पठारी होने के कारण सोन काफी गहराई में बहता है ही । पचास-साठ से भी अधिक मीटर नीचे । इस बीस-पचीस पुरसा जमीन का उपयोग इस सीतामढ़ी में जैसा किया गया था ठीक उसी तरह की स्थिति रोहनिया में भी थी । रोहनिया में सोन तट से लगभग उतनी ही एक फर्लांग दूर किसी मध्यकालीन भवन, शायद मंदिर के ध्वंसावशेष दिखाये थे शुक्लजी ने । उन खँडहरों के पास ही एक खोखली जमीन का संदेह था शुक्लजी को, जो पक्की जमीन से ढँकी हुई थी । शुक्लजी का कथन हमें याद आने लगा कि यहाँ कोई गुफा अवश्य होनी चाहिए और यह गुफा साधु-संन्यासियों के ध्यान – तपस्या के लिए एकान्त स्थल रही होगी | लेकिन चँवरी के दरियावसिंह मंदिरों के आसपास किसी सुरंग द्वार के अस्तित्व का अनुमान लगा रहे थे: हाँलाकि वे उसे देख पा नहीं रहे थे । बहरहाल, रोहनिया और सीतामढ़ी के पास के सोन-तट के खोखले स्थानों की समानता आश्चर्यजनक थी । (“सोन का साम्राज्य -3” जारी…)

