प्रधानमंत्री डरे हुए है क्योंकि सच्चाई का सामना नहीं कर सकते: राहुल/ दलाई लामा को बदनाम करना निंदनीय:सीएम खांडू

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प्रधानमंत्री डरे हुए है क्योंकि सच्चाई का सामना नहीं कर सकते: राहुल

नयी दिल्ली: नौ फरवरी (भाषा) लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सदन में आने से डरे हुए हैं क्योंकि वह उस सच्चाई का सामना नहीं कर सकते जिसे वह (राहुल) पूर्व सेना प्रमुख एम एम नरवणे की पुस्तक के एक अंश को उद्धृत करते हुए सामने रखना चाहते थे।

गलत सूचना के जरिए आध्यात्मिक संस्था को बदनाम करना निंदनीय:सीएम खांडू

नई दिल्ली,समाचार एजेंसी ईएमएस के अनुसार 14वें दलाई लामा कभी भी विवादित जेफ्री एडवर्ड एपस्टीन से नहीं मिले है। दलाई लामा के कार्यालय ने रविवार को हाल की मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर की पोस्ट को झूठा और बेबुनियाद बताया है, जिनमें तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को एपस्टीन से जोड़ने की कोशिश की गई थी। बयान में कहा गया कि बिना किसी तथ्यात्मक आधार के मनगढ़ंत संबंध बनाने की कोशिश की जा रही है।

 दिल्ली,समाचार एजेंसी ईएमएस के अनुसारसदियों से आस्था, तपस्या और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रहा कैलाश मानसरोवर का पारंपरिक पैदल मार्ग धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है। लगभग 400 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर कभी श्रद्धालुओं के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, लेकिन अब यह रास्ता कहीं सड़क निर्माण में कट चुका है तो कहीं जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए बनी करीब 500 धर्मशालाएं भी देख-रेख के अभाव में खंडहर में तब्दील होती जा रही हैं।इतिहासकारों के अनुसार, 1962 के भारत-चीन युद्ध तक इस यात्रा पर कोई रोक नहीं थी और भारत-तिब्बत के बीच व्यापार भी निर्बाध चलता था। युद्ध के बाद यात्रा और व्यापार बंद हुए, जिन्हें 1981 और 1992 में फिर बहाल किया गया। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्राचीन पैदल मार्ग और उससे जुड़ी धर्मशालाओं का संरक्षण नहीं किया गया, तो यह अमूल्य विरासत पूरी तरह समाप्त हो सकती है

पुरातात्विक स्थलसंरक्षित स्मारकों  चारों ओर एक समान100 मीटर निषिद्ध क्षेत्र और 200 मीटर विनियमित क्षेत्र निर्धारितप्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 (एएमएएसआर अधिनियम) की धारा 20ए और 20बी के अनुसार, सभी संरक्षित स्मारकों और संरक्षित क्षेत्रों (स्थलों) के चारों ओर एक समान 100 मीटर निषिद्ध क्षेत्र और 200 मीटर विनियमित क्षेत्र निर्धारित किया गया है।एएमएएसआर अधिनियम की धारा 20ई प्रत्येक संरक्षित स्मारक और संरक्षित क्षेत्र (स्थलों) के लिए विरासत उपनियम बनाने का प्रावधान करती है, ताकि निषिद्ध और विनियमित क्षेत्रों के भीतर तर्कसंगत और संदर्भ-विशिष्ट विरासत नियंत्रण निर्धारित किए जा सकें। ये नियंत्रण उनके महत्व और संवेदनशीलता पर आधारित हैं और विरासत संरक्षण के विकास की आवश्यकताओं और आस-पास के निवासियों की आजीविका के साथ संतुलित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण ऑनलाइन आवेदन  प्रणाली (एनओएपीएस) पोर्टल को आवेदनों के ऑनलाइन  के लिए 2015 में शुरू किया गया था। इसे 14 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के साथ एकीकृत किया गया है, जिसमें एकल खिड़की प्रणाली के अंतर्गत चार शहरी स्थानीय निकाय और गैर-एकल खिड़की प्रणाली के अंतर्गत 1,407 शहरी स्थानीय निकाय शामिल हैं।यह जानकारी केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने आज लोकसभा में लिखित उत्तर में दी।09 FEB 2026 PIB Delhi

पचामा दादर के जंगल में खदान के लिए 60 हेक्टेयर वन भूमि   पर्यावरणीय असर और ग्रामसभा की सहमति पर उठे सवाल

बालाघाटसमाचार एजेंसी ईएमएस के अनुसार जिले के दक्षिण बैहर क्षेत्र के पचामा दादर के घने वन क्षेत्र में लगभग 60 हेक्टेयर भूमि पर बाक्साइट खदान को शासन से स्वीकृति मिलने के बाद मामला तूल पकडऩे लगा है। खदान प्रस्ताव को लेकर जहां प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं ग्रामीणों ने पर्यावरणीय प्रभाव और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गांव-गांव बैठकें हो रही है। आंदोलन की रणनीति तैयार की जा रही है। जनसुनवाई से पहले आंदोलन की तैयारी की जा रही है।... जानकारी के अनुसार दक्षिण बैहर के ग्राम पंचायत लूद, बम्हनी, सारद, धानीटोला, घोंदी सहित अन्य गांवों के बीच जंगल में बाक्साइट खदान के लिए प्रशासकीय स्वीकृति मिली है। यह बाक्साइट खदान इन गांवों से करीब 10-12 किमी के दूरी पर संचालित होगी। लेकिन खदान के संचालन के लिए न केवल पेड़-पौधों की कटाई की जाएगी। बल्कि ग्रामीणों के आजीविका पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। इधर, बैहर विधायक संजय उइके के नेतृत्व में ग्रामीणों द्वारा आंदोलन की रणनीति तैयार की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, खदान परियोजना को प्रारंभिक स्वीकृति मिली है और आगे की प्रक्रिया पर्यावरणीय एवं वैधानिक अनुमतियों पर निर्भर करेगी। ग्रामसभा की सहमति पर प्रश्न स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि खदान जैसी परियोजना के लिए वनाधिकार कानून और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम (पेसा) के तहत ग्रामसभा की स्पष्ट सहमति आवश्यक है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें इस संबंध में समुचित जानकारी नहीं दी गई और प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही। ग्राम पंचायत लूद के सरपंच चमरु सिंह टेकाम ने बताया कि पचामा दादर का जंगल क्षेत्र केवल वन भूमि नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय की आजीविका और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा है। यहां से महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी और अन्य लघु वनोपज ग्रामीणों की आय का प्रमुख स्रोत है। पर्यावरणीय प्रभाव की आशंका वन भूमि पर खनन कार्य प्रारंभ होने की स्थिति में बड़े पैमाने पर पेड़-पौधों की कटाई संभावित है। इससे वन्यजीवों के आवास और जल स्रोतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि दक्षिण बैहर का इलाका जैव विविधता की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में पर्यावरण प्रभाव आकलन की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। जनसुनवाई से पहले रणनीति इस मामले में 18 फरवरी को ग्राम पंचायत लूद में जनसुनवाई प्रस्तावित है। हालांकि, उससे पहले ही गांव-गांव बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। बैठकों में खदान को लेकर किस तरह से विरोध किया जाना है, आंदोलन कैसे करना है सहित अन्य तरह की रणनीति तैयार कर ग्रामीणों को जागरुक किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे जनसुनवाई में बड़ी संख्या में पहुंचकर अपना पक्ष रखेंगे। बैठकों में यह भी चर्चा हो रही है कि यदि उनकी आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। कुछ ग्रामीण संगठनों ने इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। अब निगाहें 18 फरवरी की जनसुनवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशासन ग्रामीणों की आपत्तियों और पर्यावरणीय चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए परियोजना की शर्तों में बदलाव करता है या विरोध और तेज होता है। इनका कहना है पचामा दादर के जंगल में बाक्साइट खदान को स्वीकृति मिली है। करीब 60 हेक्टेयर भूमि पर इसका संचालन होगा। ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरु कर दिया है। गांव-गांव बैठके ली जा रही है। 18 फरवरी को जनसुनवाई से पहले ग्रामीण वृहद पैमाने पर आंदोलन करने की योजना तैयार कर रहे हैं। 

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भागवत ने बीजेपी को लेकर बड़ी लकीर खींच दी

मुंबई,समाचार एजेंसी ईएमएस के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने बीजेपी को लेकर बड़ी लकीर खींच दी है। 2024 के आम चुनाव में तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि हम आरएसएस के बिना भी चुनाव में जीत सकते हैं। इसे लेकर संघ कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष फैल गया था। अब सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि बीजेपी के ये अच्छे दिन आरएसएस के चलते ही आए हैं। उन्होंने कहा कि राम मंदिर आंदोलन के लिए आरएसएस ने प्रतिबद्धता दिखाई थी और जिसने इसका साथ दिया, उसे फायदा मिला। इस तरह उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि संघ के नेतृत्व में चले राम मंदिर आंदोलन का फायदा बीजेपी को चुनाव में भी मिला।

भूजल के लिए निगरानी प्रणाली

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा देश भर में भूजल व्यवस्था की कुशल मॉनिटरिंग के लिए उन्नत डिजिटल प्रोद्योगिकी के प्रगामी प्रयोग को प्रगतिशील रूप से  अपनाया गया  है। जल शक्ति मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं जैसे भूजल मॉनिटरिंग और विनियमन (जीडब्ल्यूएम एंड आर) योजना, राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (एनएचपी), अटल भूजल योजना आदि के तहत और राज्य सरकारों की अन्य योजनाओं के तहत, लगभग सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को शामिल  करते हुए देश के विभिन्न  स्थानों पर टेलीमेट्री प्रणाली के साथ डिजिटल जल स्तर रिकॉर्डर (डीडब्ल्यूएलआर) संस्थापित किए गए हैं। इन टेलीमेट्री सहित डीडब्ल्यूएलआर द्वारा वास्तविक समय के आधार पर भूजल स्तर और गुणवत्ता संबंधी आकड़ें जारी किए जाते हैं, जिससे देश में भूजल की स्थिति की और अधिक विस्तृत और सटीक स्थिति प्रस्तुत करने में सहायता प्राप्त होती केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) द्वारा राज्य सरकारों के समन्वय से देश के गतिशील भूजल संसाधनों का वार्षिक आकलन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देश के जल की कमी वाले ब्लॉक/तहसील/तालुकों की पहचान की जाती है। भूजल संसाधनों के साथ-साथ भूजल स्तर और गुणवत्ता के आकलन पर रिपोर्ट को प्राथमिकता आधार पर नियोजन और लक्षित उपाय हेतु जल जीवन मिशन अधिकारियों सहित सभी हितधारकों के साथ साझा किया जाता है।

 


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