भारत में स्वतंत्रता की असमानता: तिब्बती, इज़राइली और आदिवासी संघर्ष की एक तुलना-( त्रिलोकीनाथ )

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  भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न समुदायों को अलग-अलग स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन जीने का अधिकार मिलता दिखाई देता है। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में पटेल चौक बाजार की दुकानों और घरों में “फ्री तिब्बत” (Free Tibet) के नारे खुले तौर पर लगे रहते हैं। तिब्बती शरणार्थी बिना किसी डर के अपनी मातृभूमि की आजादी की मांग को व्यक्त कर सकते हैं। इसी तरह, धर्मकोट जैसी बस्तियों में रहने वाले इज़राइली नागरिक भी भारत में स्वतंत्रता और आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।ये उदाहरण दिखाते हैं कि भारत ने शरणार्थियों और विदेशी नागरिकों को अभिव्यक्ति और जीवनशैली की काफी छूट दी है। तिब्बती समुदाय सदियों से यहाँ शरणार्थी के रूप में रह रहा है और उनकी सांस्कृतिक-पॉलिटिकल अभिव्यक्ति पर कोई सख्त प्रतिबंध नहीं लगाया जाता।लेकिन यही स्वतंत्रता भारत के अपने आदिवासी और जनजातीय समुदायों के लिए उपलब्ध नहीं दिखती, खासकर जब बात पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों की हो।                                        ( त्रिलोकीनाथ )
भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विशेष प्रावधान करती है। इसका उद्देश्य है: प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संरक्षण। स्थानीय निवासियों (जनजातीय और गैर-जनजातीय) को अपने दायित्वों के साथ विकास सुनिश्चित करना ताकिआर्थिक साम्राज्यवाद या सामंतवादी ताकतों द्वारा इन क्षेत्रों को उपनिवेश न बन सके।ये प्रावधान विकास के नाम पर लूट और नष्टभ्रष्ट होने से बचाने के लिए बनाए गए थे। लेकिन वास्तविकता में इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाएँ और प्रशासन अक्सर विकास के नकाब में संसाधनों की लूट को बढ़ावा देते दिखते हैं।
इस संदर्भ में लद्दाख के प्रसिद्ध वैज्ञानिक, इंजीनियर और गांधीवादी विचारक सोनम वांगचुक का मामला सबसे प्रमुख उदाहरण है। वांगचुक लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और राज्य का दर्जा दिलाने की मांग के लिए लंबे समय से संघर्षरत थे। यह मांग भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में भी शामिल रही थी। उन्होंने अहिंसक अनशन, पैदल मार्च और विरोध प्रदर्शन किए।
लेकिन सितंबर 2025 में लद्दाख में हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़कने के बाद (जिसमें चार लोगों की मौत हुई), वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें लद्दाख से हटाकर राजस्थान के जोधपुर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ वे कई महीनों से (2026 तक) बंद हैं। सरकार ने उन्हें “राष्ट्रद्रोही” और हिंसा भड़काने वाला बताकर जेल में रखा हुआ है, जबकि उनकी पत्नी और समर्थकों का कहना है कि यह राजनीतिक कारणों से किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका पर सुनवाई चल रही है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया धीमी है और वे अभी भी हिरासत में हैं।
यह स्पष्ट दोहरापन  है
तिब्बतियों को “फ्री तिब्बत” का नारा लगाने की आजादी है। इज़राइलियों को भारत में स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बोलने वाले सोनम वांगचुक जैसे व्यक्ति को जेल में डाल दिया जाता है, क्योंकि वे आर्थिक साम्राज्यवाद और विकास के नाम पर लूट के खिलाफ बाधा बन रहे थे। एक अन्य उदाहरण मध्य प्रदेश का है, जहाँ IAS अधिकारी संतोष वर्मा (जो  पदोन्नति के माध्यम से IAS बने) ने ब्राह्मण महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। इसके खिलाफ भोपाल में ब्राह्मण समुदाय ने बड़े प्रदर्शन किए। लेकिन यदि यही ऊर्जा और एकजुटता सोनम वांगचुक के पक्ष में या पांचवीं अनुसूची के संरक्षण के लिए दिखाई जाती, तो जनजातीय समाज अपनी पर्यावरण, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा में मजबूत कदम उठा सकता था। इससे वे राष्ट्रीय मुख्यधारा से बेहतर जुड़ सकते थे।
शहडोल जैसे जनजातीय क्षेत्रों में भी यही स्थिति है—विकास के नाम पर सरकारी योजनाएँ और प्रशासन पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को कमजोर करते दिखते हैं, बिना किसी बाधा के संसाधनों का दोहन होता है। यह दोहरापन भारत की लोकतांत्रिक छवि पर सवाल उठाता है। जहाँ विदेशी शरणार्थियों को अभिव्यक्ति की छूट है, वहीं अपने नागरिकों—खासकर आदिवासियों—के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वालों को दबाया जा रहा है। आर्थिक साम्राज्यवाद और उसके दलालों का यह युग आदिवासी क्षेत्रों को बलिदान बनाने पर तुला है। क्या भारत वाकई “सबका साथ, सबका विकास” का वादा निभा पाएगा, जब उसके अपने संविधान द्वारा संरक्षित समुदायों को ही न्याय नहीं मिलता? यह सवाल समय की मांग है कि दोहरे मापदंडों को खत्म किया जाए और सभी नागरिकों को समान स्वतंत्रता और सुरक्षा मिले।

 


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