गर्व से कहो हम कॉकरोच हैं-१; तो क्या सिस्टम ही कॉकरोच है…? बहुत कन्फ्यूजन है। ( त्रिलोकी नाथ )

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गर्व से कहो हम कॉकरोच हैं-१; तो क्या सिस्टम ही कॉकरोच है…?

        हम आदिवासी क्षेत्र के लोग हैं इसलिए अमेरिका में, जैफ्री एपिस्टिन के फाइल में इजराइल में क्या रूस या चीन में क्या कुछ घट रहा होता है हमें इस तरह पता नहीं जैसे दिल्ली में टॉप लेवल के लोग क्या कर रहे होते हैं पता नहीं चलता। लेकिन सोशल मीडिया का युग आ गया है इसलिए कई चीजे हैं जमीन पर आ जाती है इस तरह चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सुप्रीम कोर्ट की बिल्डिंग के अंदर क्या विचार व्यक्त करते हैं वह कच्चे चावल से पढ़ी खिचड़ी की तरह हमारे सामने आ जाती है। तो सबसे पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भारतीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका की सुपरस्टार के भव्य विचार को पढ़ने का प्रयास कीजिए अगर आपने कहीं पढ़ा हो तो नहीं तो अंत में हम विस्तार से दैनिक जनसत्ता में  जो छपा है उसे  साभार जनसत्ता प्रकाशित कर देंगे।मोटा-मोटी समझे तो मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट ने किसी मामले में “खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की स्टाइल में”किसी वकील साहब से  इतना नाराज हुए कि उसका गुस्सा समाज के बेरोजगार तबके को चिन्हित करते हुए कई लोगों को कॉकरोच घोषित कर दिया खूब बोले; कि यह कॉकरोच, सिस्टम पर हमला करता है। यह अलग बात है कि उन्होंने सिस्टम को परिभाषित नहीं किया की सिस्टम का मतलब क्या होता है “27 लाख पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को लोगों को अगली बार वोट डाल देना…सिस्टमहै या फिर जस्टिस वर्मा जिसके घर के अंदर दिल्ली में किसी कमरे में करोड़ों रुपए की गांधीजी वाले नोट की गड्डियां जल रही थी एक्सीडेंटल फायर ब्रिगेड वाले उसे चिन्हित कर बैठे हैं या फिर अरविंद केजरीवाल ने उसे सिस्टम को आवेदन दिया कि वह प्रभावित है इसलिए प्रकरण से आप हट जाएं या फिर मैं खुद हट जाऊंगा बावजूद सिस्टम कुछ दिन अड़ा रहा फिर उसे लगाकर है जाना चाहिए और वह हट गया इसका मतलब अरविंद केजरीवाल सही है हो सकता है इस जगह सही हूं किंतु जी दिल्ली में उन्होंने एक सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति की तरह मुख्यमंत्री बनकर कई साल शासन किया वहां उन्होंने ना तो कूड़े का पहाड़ हटाए और ना ही यमुना को साफ किया, वायु प्रदूषण मैं शायद भी जन्मे थे इसलिए नहीं हटा पाए; इस सिस्टम की बात कर रहे थे सीजेआइ शर्मा या कुछ और कहना चाहते थे क्योंकि उन्होंने अपने विचारों में इसे स्पष्ट नहीं किया इसलिए पूरा गुस्सा पंचतंत्र के नए नायक कॉकरोच पर उतार डाला।
दुर्भाग्य से या इत्तेफाक से या एक्सीडेंटल  भी इस कॉकरोच की दुनिया में अचानक घुस गया कॉकरोच का कीड़ा जब मुझे इनफैक्ट कर रहा था उस दौर में मेरे पास उनका सिस्टम वह सब कुछ देने को तैयार था जिसमें ऐसे विचार पैदा होते हैं उस समय शुरुआत थी, कोयला माफिया, वन माफिया, बिल्डिंग माफिया…. इस माफिया नगर का मैं शानदार निवासी हो सकता था.. लेकिन क्योंकि पिताजी समाजवादी विचारधारा से जुड़े थे और कम समय में ही सहज स्वभाव के कारण वह प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के निकट भी जा पहुंचे थे.. क्योंकि उसे समय सिस्टम उतना विकसित नहीं हुआ था. कि उस पर घुसा नहीं जा सकता था…तो हम भी कॉकरोच के काटने से कॉकरोच की दुनिया में चल पड़े… आदिवासी क्षेत्र के थे इसलिए बहुत सारी चीज जो विरासत में मिलना चाहिए वह नहीं मिले.

हम समझ नहीं पाए कि हमें इस आजादी को अनुभव करके एबीसीडी सीखना चाहिए जो 1947 में पैदा हुई थी … 1986-87 में पत्रकारिता का कीड़ा हमें परेशान करने  लगा देश के लिए कुछ करना चाहिए तो कॉकरोच की दुनिया में आ घुसे। होम-सिकनेस के कारण बाहर नहीं निकल पाए इसलिए पत्रकारिता का सुख-वैभव हमें हासिल नहीं हो पाया.. इस संविधान की पांचवी अनुसूची वाले अनुसूचित शहडोल क्षेत्र में इस भारत की कल्पना कर रहे थे जो देश की आजादी से जुड़ा हुआ था.., नहीं मालूम था की सिस्टम विकसित हो गया है और सिस्टम को स्वीकारना ही सफलता की पहली सीढ़ी है इसलिए कई काम करते-करते 1992 में सोन नदी पर एकाधिकार पर उसे कच्चा माल के रूप में उपयोग करने वाली ओरिएंट पेपर मिल पर सिस्टम के खिलाफ काम चालू किया, क्योंकि तब कॉकरोच  हमें ही नहीं काटा था उसे समय का जो प्रशासन कलेक्टर आद थे वाह भी कॉकरोच से प्रभावित, इमानदारी को जीना चाहते थे… अब वह समय बीत गया है अब गुलामी एक आवश्यक योग्यता बन गई है.. सफलता भी मिली. 1998 में दिग्विजय सिंह को मजबूरी में उसे कानून का निर्माण करना पड़ा जिसमें शहडोल की सोननदी बल्कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तमाम नदियों में एकाधिकार कर उसे कच्चा माल की तरह उपयोग करने वाले तमाम उद्योगपतियों का सिस्टम टूट गया और कानून बना, कि नहीं पैसा देना पड़ेगा जो 1998 तक देश की आजादी के बाद से नहीं दिया जा रहा था.. शहडोल के पेपर मिल में ऐसी बकाया राशि करीब 300 करोड रुपए जल संसाधन विभाग को देने के रास्ते खुले.  अलावा हर महीने कुछ लाख रुपए जल करके रूप में उन्होने और देना प्रारंभ कर दिया. ऐसे ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी उद्योगपतियों को पैसा देना पड़ा क्योंकि तब तक मेरे अंदर कॉकरोच का कीड़ा घुस चुका था और मैं कॉकरोच बन गया था… सिस्टम को काटने लगा|

यह अलग बात है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई तो नया सिस्टम आया और अब पता चलता है कि यह 300 करोड रुपए घट करके कोई 60-70 करोड रुपए में बचा रह गया है हो सकता है उसे भी माफ कर दिया गया हो… इस सिस्टम के खिलाफ मुझे, मेरे जैसे कई लोग.. कई जगह काम करते हैं वह भी कॉकरोच ही हैं… क्योंकि उन्हें कुछ मिलता नहीं, क्योंकि वेरोजगार भी है… उन्हें जो पैसा पारिश्रमिक के रूप में मिलना चाहिए… वह सरकार देती नहीं क्योंकि वह सरकारी सिस्टम के खिलाफ काम करते हैं और यही सिस्टम को डिस्टर्ब करने से या उन पर हमला करने से शायद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया श्री शर्मा परेशान है…? अन्यथा उन्हें चिन्हित करना चाहिए किस सिस्टम को, कौन से कॉकरोच.. किस कारण से हमला करते हैं…. जो उन्होंने चिन्हित नहीं किया. इसलिए हम अपनी कल्पना में उड़ना चालू कर दिए हैं….

 हो सकता है जो कंगना रनौत वाला नया भारत का, नया आजादी में सिस्टम विकसित हो वह उसे बचाने और उसकी रक्षा के लिए बोलते हैं… या फिर वह सिस्टम से ही इतना गुस्सा गए हो “गरीब की लुगाई ,सबकी भौजाई “के तर्ज पर लोकतंत्र से लगभग खत्म हो चुकी पत्रकारिता नामक चौथे स्तंभ को कमजोर मानकर कुछ भी दाएं-बाएं बोलने लगे. इसलिए चिन्हित नहीं कर पाए की किस सिस्टम को किस कॉकरोच से बचाना है…अथवा वे सिस्टम को ही कॉकरोच बोलना चाहते हो… कुछ समझ में नहीं आया…? अन्यथा अगर चिन्हित करने की सोच ही है तो संज्ञान भी लेना चाहिए कि लोकतंत्र का सर्वाधिक जागरूक समाज बेरोजगार क्यों है….? और उसे जीने का अधिकार इस लोकतंत्र में अभी तक क्यों नहीं दिया गया है…? उसकी आर्थिक सुरक्षा को कौन सुनिश्चित करेगा या फिर सिस्टम की सुरक्षा की चिंता में इन कॉकरोच को खत्म कर दिया जाए…? तो कौन सा जहर डाला जाए, यह भी चिन्हित होना चाहिए…. सिर्फ खिसियानी बिल्ली खंभा नोचने की बात कहने से बात बनती नहीं|

इसलिए अपनी आदिवासी समझ में जो आया अपन भी कह डाले और आगे भी कहते रहेंगे… क्योंकि सिस्टम ही है जो 13 वर्ष बाद भी हाईकोर्ट के आदेश को पालन नहीं करता है.. समझ में यह नहीं आता है की हाई कोर्ट का आदेश मूर्खतापूर्ण है या फिर सिस्टम में बैठा हुआ पालन-करता मूर्ख है या फिर यही सिस्टम ही पूरा मूर्ख है… जिस कारण आदेश के पालन नहीं होते हैं तो जिम्मेदारी किसकी है… इस पर भी चर्चा करेंगे, आज पहली कड़ी के रूप में हमने भी चिन्हित करने का काम किया है कि आखिर क्यों कहना चाहिए कि गर्व से कहो हम कॉकरोच हैं…क्योंकि हम सड़े हुए सिस्टम में पैदा होते हैं और गंदगी को चिन्हित करते हैं इसलिए कॉकरोच भी हैं…..क्यों की तब सिस्टम के खिलाफ महात्मा गांधी और कई क्रांतिकारी जिसमें बहादुर शाह जफर भी, रानी लक्ष्मीबाई भी  मंगल पांडे भी भगत सिंह खुदीराम बोस आदि कई लोग शामिल थे वह भी सिस्टम के खिलाफ थे तो क्या सूर्यकांत शर्मा समय मुख्य न्यायाधीश होते  तो यही बात करते हैं….?  उन्हें  सोचना चाहिए…निश्चित रूप से हम आपके खिलाफ कभी नहीं सोच सकते क्योंकि हम ऐसा करके आत्महत्या कर रहे हैं.. क्योंकि आप हमारे सर्वोच लोकतांत्रिक स्तम्भ के अति सम्मनित पद पर पदासीन सर्वोच न्यायाधीश हैं इसलिए हम आपसे न्याय प्रिय टिप्पणियों की अपेक्षा करते हैं क्योंकि हम आपसे बहुत प्यार करते हैं


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