शहडोल
जिला अस्पताल में जब से नए सिविल सर्जन साहब आए हैं तब से लगातार नवाचार की प्रक्रिया गति पकड़े हुए हैं, करोड़ों रुपए सरकारी फंड भी मिल जाता है और उसे हिसाब से खर्च करना जिला अस्पताल के प्रबंधन की एक जिम्मेदारी भी हो जाती. इसलिए अस्पताल में फिल्म की तरह पैसा खर्च करने का टारगेट बना हुआ है.
इस रफ्तार में तकलीफ आम नागरिक और मरीजों को भी हो रही है, तो कह सकते हैं कि जिला अस्पताल बिल्डिंग की प्रसव पीड़ा इन दिनों गर्मी में जबरदस्त बनी हुई है. और इस चक्कर में छोटे-छोटे अपराध होते ही रहते हैं अब जैसे अस्पताल में मरीज को दिखाना है तो पहली शर्त होती है कि उसे अपना रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है और रजिस्ट्रेशन कराने के लिए लाइन भी लगाना पड़ता है क्योंकि वैकल्पिक व्यवस्था कुछ भी नहीं है. पेड़ पौधे तो जड़ से खत्म है, ऐसे में इन दिनों गर्मी अपनी पूरी ताकत से धूप फेंक कर जिला अस्पताल की बिल्डिंग को और तपिश दे रही है. इस बीच में रजिस्ट्रेशन कराने वाले लोगों को धूप में घंटों खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है. क्योंकि छाया के लिए जो टीन सेट लगा हुआ था उसे भविष्य में बनाने वाले इस भवन के उत्तर भाग में लगा दिया गया है. जहां कोई अभी व्यवस्था रजिस्ट्रेशन की नहीं की गई है. इस कारण कड़ी धूप का सामना मरीज और उसके परिवारों को भवन की प्रसव प्रताड़ना के दौरान सहना पड़ता है.
यह एक बड़े कुप्रबंधन का हिस्सा है जो मरीजों के हित में बिल्कुल नहीं है अभी कुछ दिन पहले कुप्रबंधन के चलते ही एक खून की कमी के गर्भवती महिला मरीज को गलत खून चढ़ा दिया गया जिसका परिणाम यह हुआ की महिला का बच्चा उसके गर्भ में ही खत्म हो गया और महिला को लाखों रुपए लगाकर अपनी जान बचाने के लाले पड़ गए जो अभी भी गलत खून चढ़ने की समस्या से अकेले जूझ रही है.. ऐसा उसके पति कंचनपुर निवासी मुकेश ने प्रशासन से और पुलिस से अपनी शिकायत में अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को प्रमाणित किया है. बहरहाल इन सब घटनाओं से जो दुर्घटना बस हो जाती हैं उन्हें ठीक करने के लिए कोई इमरजेंसी व्यवस्था अस्पताल में नहीं है .किंतु जो मरीज अस्पताल में सामान्य इलाज के लिए आ रहे हैं उन्हें कड़ी धूप में अस्पताल के कु-प्रबंधन के चलते घंटों सजा सहना पड़ता है. अस्पताल को अपनी इन छोटी-छोटी किंतु प्रताड़ित करने वाली घटनाओं पर तत्काल समाधान पूर्ण कार्यवाही करनी चाहिए किंतु शायद करोड़ों रुपए पुराने खंडार अस्पताल भवन के प्रसव पीड़ा खर्च करने के चक्कर में अस्पताल प्रबंधन मरीज हित को नजरअंदाज कर रहा है. संभव है जिला प्रशासन के अधिकारी अल्टरनेट वहां जाकर इसे ठीक कर सकते हैं अगर प्रशासकीय संवेदना जागेगी तो…? सब कुछ ठीक हो सकता है फिलहाल अस्पताल प्रताड़ना की इंट्री के साथ बरकरार है.

