
आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी की तथाकथित अमृतकाल में कुछ वर्ष हो या ना वर्षा हो एक चीज G20 के सम्मेलन में जमकर वर्षा और उसका प्रभाव इतना शानदार रहा है की चाहे वह भारत का अरब-खरब पति मीडिया-माफिया हो या पत्रकारिता संस्थान अथवा तथाकथित स्वनाम धन्य गुलाम “अधिमान्य पत्रकार” हो या फिर हमारे जैसे शहडोल में पड़े आदिवासी क्षेत्र के पत्रकारों की हालत, दोनों की औकात एक जैसी हो गई है। यानी गुलामी के मामले में समता मूलक गुलाम-पत्रकार-समाज की स्थापना और पत्रकारिता के इस स्तर पर हमारे जैसे आदिवासी क्षेत्र के गैर-अधिमान्य पत्रकार जो वरिष्ठता क्रम में लगभग शीर्ष पर हैं उन्हें अवश्य इस बात का गर्व रहता होगा की गुलामी का : तमगा फिलहाल हम पर नहीं लगा है और हम इस पर गर्व नहीं कर सकते। जो हमारी भारतीय पत्रकारिता के लिए गौरव की बात हो सकती है। और यही उसकी कमजोरी भी हो सकती है।
—————————( त्रिलोकी नाथ )———————————————-
लेकिन यही हमारे लिए ताकत भी है और इसीलिए कहा भी गया है कि “जो आपकी कमजोर कड़ी है दरअसल वही हमारी सबसे ताकतवर कड़ी है” यह फील-गुड हमारे लिए बरकरार है, बावजूद इसके कि हम अपने फील-गुड में आदिवासी क्षेत्र की तबाही को पारदर्शी तरीके से देख और समझ रहे हैं। उसके भविष्य पर हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन ना तो पत्रकारिता में अब शब्दों की ताकत रह गई है और ना ही पत्रकारिता की भावना को समझने वाला नेता या प्रशासक वर्तमान लोकतंत्र में जिंदा हमें महसूस हो रहा है।
यह भी एक फील-गुड है क्योंकि दुर्भाग्य से हम पत्रकारिता के उसे दौर पर अनुभव करके आए हैं जहां भ्रष्ट राजनेताओं
के बावजूद ईमानदार प्रशासक हमें पत्रकारिता में उड़ने की ताकत देता था, और सहारा भी । अब तो वह पूरी ताकत और शहारा माफिया नुमा नेताओं को प्राकृतिक संपदाओं को लूटने में सहयोग प्रदान कर रहा है।
यह गलतफहमी हमें महसूस जरूर होती है कि शायद वह हमें सुन रहा है अथवा देख रहा है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है.. वह हमें तब सुनता और देखता है उनके मालिक की औकात को हमारी पत्रकारिता की धारदार कलम कुछ चुभन पैदा करती है.. अगर हमारी औकात चुभन पैदा करने की नहीं है तो वह देखता भी नहीं…।
नाली के कीड़े मकोड़े की तरह है आपको जिंदा रहने की मात्र इजाजत है जब नाला साफ करना होगा वह एक झटके में नाले को साफ कर देता है। इसीलिए पत्रकारिता को उसका सम्मान देने से वह परहेज करता है वहां पर वह सड़न देखना चाहता है क्योंकि इस सड़न के नशे से उसे नशा चढ़ता है और वह सफल नेता अथवा अधिकारी बनकर लोकतंत्र को चलता रहता है। इसीलिए नैतिक रूप से या आचार संहिता के रूप में होने वाली मासिक-त्रैमासिक पत्रकारों की बैठकों को अघोषित तौर पर निरस्त कर दिया गया है।
और जब से अमृतकाल वाली सरकार आई है। उसने गुलाम मीडिया संस्थान खड़े कर दिए हैं और उन्हें आदर्श बनाकर स्थापित करने का लगातार परपंच करती रहती है। जिससे पत्रकार दो-चार करते रहते हैं ।और इसका परिणाम G20 के शिखर सम्मेलन में बेहद पारदर्शी तरीके से हमें देखने को मिला। अकेले हम ऐसा सोचते हैं ऐसा नहीं है हमारे जैसा एक लोकतंत्र अमेरिका भी है लेकिन यह मदर ऑफ डेमोक्रेसी नहीं है जिसके राष्ट्रपति जो बिडेन है वह भी G20 सम्मेलन में भारत आए थे और पत्रकारिता की दुर्गति को देखकर वियतनाम में जाकर अपनी भड़ास निकाले थे।
क्योंकि भारत में अमृतकाल का तथाकथित अमृत बरस रहा था और वह इस बरसात में भीगना नहीं चाहते थे। क्योंकि उन्हें लगा होगा भारत का लोकतंत्र यही है यही उसका अमृत काल है। इसलिए यह हमारे लिए शर्म करने से ज्यादा गर्व करने की बात है इस गौरव के साथ कि हम आजादी के अमृत काल में गुलामी की पर्यायवाची को नए तरीके से गढ़ रहे हैं। “मेक इन इंडिया” के प्रोडक्ट के रूप में पत्रकारिता का नया रंग देख रहे हैं इससे क्या फर्क पड़ता है की 80 करोड़ जनता को भिखारी बनकर उसे 5 किलो अनाज महीने में पेट भरने के लिए फेंक कर, दुनिया की तथाकथित तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन रहे हैं। इसलिए पर्यायवाची की दुनिया में आजादी को गुलामी के रूप में एक नया शब्द गढ़ लेना चाहिए । कम से कम पत्रकारिता भारत की पूर्ण गुलामी के रूप में समता मूलक समाज स्थापित कर दी है।
अब दिल्ली का चाहे कोई तुर्रम खान पत्रकार हो या कोई अरबपति गुलाम मीडिया हो अथवा शहडोल में बैठा हुआ आदिवासी क्षेत्र का कोई त्रिलोकीनाथ पत्रकार हो सब की औकात एक बराबर है… और हम इस शर्म को बड़े गर्व के साथ फील-गुड कर रहे हैं वैसे यह शब्द पाकिस्तान से भारत आए भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी ने ही दिया था.. उन्हें भी आज गर्व महसूस हो रहा होगा कि उनके चलाए गए रास्ते पर अमृतकाल की गुलामी की वर्षा में सब भीग रहे हैं। इसलिए लिख दिया ताकि हमें संतोष रहे कि हम अभी भी आजाद हैं…….. यही आजादी में अमृतकाल का “प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्” है।

