
वैसे तो शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र है, इसलिए इस क्षेत्र में विशेष कानून भी हैं कानून के पेसा एक्ट के तहत महामहिम राष्ट्रपति स्वयं शहडोल आकर के आम नागरिक और सरकारी अधिकारियों को भी को बताने का प्रयास किए हैं ।आम नागरिक स्वाभाविक रूप में आदिवासी क्षेत्र का है तो आदिवासी प्रकृति का है। लेकिन अधिकारी पढ़ा लिखा समझदार है उसमें उच्च बौद्धिक समाज के लोग भी हैं जिसमें कलेक्टर ,कमिश्नर ,एसपी और न्यायपालिका के लोग तो कुछ नेता लोग भी हैं। पत्रकारिता के पास भी अपनी एक समझ है। वास्तव में संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल होने का मतलब आदिवासी क्षेत्र के हितों की सर्वोच्च प्राथमिकता और उसके पर्यावरण और परिस्थिति की को बनाए रखना कानून का मुख्य उद्देश्य है । ताकि शोषणकारी व्यवस्था का तंत्र माफिया-गिरी को बढ़ावा ना मिले किंतु वास्तव में विशेषकर शहरी क्षेत्र में उसमें भी शहडोल संभाग मुख्यालय में राष्ट्रपति जी और भारत के संविधान की मंसा के अनुसार क्या काम हो रहे हैं…? इसकी समीक्षा करने के लिए कोई कानून नहीं है, ऐसा समझ में आता है।
तो पहले समझ ले की समस्या कहां से चालू हुई है.. कार्यपालिका यानी जिसे इन कानून को लागू करना है उसमें आई.ए.एस, आई.आर.एस, आई.पी.एस, आई.एफ.एस, यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा के सर्वोच्च पढ़े लिखे होने का डिग्री प्राप्त अधिकारी-कर्मचारी महज दो-तीन साल के लिए यहां पदस्थ होता है और इसके बाद वह कहीं और पदस्थ हो जाता है।
——————(त्रिलोकीनाथ)———————
यही स्वभाव रियल स्टेट का काम करने वाले बिल्डर और भू-माफिया का होता है। वह भी जहां काम करता है काम करने के बाद उस स्थान को भारी लाभ लेकर छोड़ देता है। तो भू माफिया और कार्यपालिका के लोग इस मामले में मूलत: एक स्वभाव के होते हैं और अक्सर अपना पेट पालने के बाद उसे स्थान को छोड़ देते हैं। तो ऐसे स्थान पर इनका कोई मोह या जिम्मेदारी नहीं होती। उस स्थान को वह ज्यादा से ज्यादा शोषण करें, लूटे, नष्ट करें अथवा कानून के अनुसार बनाए और उसका भविष्य सुनिश्चित करें यह उनकी निजी इच्छा पर निर्भर होता है । क्योंकि जनप्रतिनिधि और पत्रकार वर्ग आम नागरिकों के प्रति सीधे जवाब दे होता है और आम नागरिक के हितों के लिए ही यह संरचना निहित होती है तो वह इसे नजदीक से अनुभव कर पाता है। क्योंकि वह लाभ लेकर वहां से वहां से भाग नहीं सकता, यानी उसे पेट पालने के लिए और अपने बच्चों की भविष्य के लिए भी स्थाई समाधान उसे क्षेत्र के विकास पर सुनिश्चित रखना होता है ।
स्वाभाविक है कार्यपालिका और भू-माफिया अगर वह सकारात्मक विकास को स्वरूप नहीं देता है।
माफिया का अर्थ ही होता है जहां अधिकारी कर्मचारी स्मगलर अपराध करने वाले लोग, राजनेता और पत्रकारिता से जुड़े लोग एक साथ गठबंधन करके सिर्फ अपने हितों के लिए काम करते हैं, वह उच्च वर्ग का गठबंधन ही माफिया तंत्र कहलाता है।
तो एक कॉलोनी को देखा गया क्या वह आदिवासी विशेष क्षेत्र के हितों के लिए समर्पित कॉलोनी के रूप में विकसित की गई है…? इस पर भी चर्चा करते हैं। “राज रेजिडेंसी”( कॉलोनी का छायाचित्र उदाहरण के लिएदिया गया है )नाम की इस कॉलोनी में कंक्रीट का एक बड़ा जंगल मकान निर्माण के नाम पर कॉलोनी निर्माण के नाम पर खड़ा किया गया, शेष भाग में विरासत में प्राप्त पर्यावरण और पारिस्थितिकी हरियाली आदिवासी क्षेत्र के हितों के हिसाब से बची हुई है।जल संरक्षण, पेड़ पौधे के संरक्षण, नदी नालों का संरक्षण जिस प्रकार इस कॉलोनी पर दिख रहा है दरअसल पुरे शहडोल में नेताओं और माफियाओं की बन रही तमाम अन्य कॉलोनी में उसका वही स्वरूप है। जिसमें बहुत से कॉलोनी आदिवासियों की जमीन पर बन रही है। अधिकारी वर्ग इस पर आंख मूंदने में अपनी नौकरी सुनिश्चित रखता है यानी अपनी और अपने बच्चों की पेट पलता है।
हर मकान के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं की किस प्रकार से पर्यावरण संरक्षण की सर्वोच्च प्राथमिकता को ध्यान में रखकर मकान का निर्माण किया जाएगा । कॉलोनाइजर उसे प्राथमिकता से काम नहीं करते हैं इसलिए मकान निर्माण के बाद कंक्रीट का जंगल भू-माफिया और बिल्डर के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। और पेड़ पौधों को जो प्राकृतिक रूप से प्रदत्त हैं उन्हें साफ किया जा रहा है।
इन फोटोग्राफ में यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है इसे ठीक करने की जिम्मेदारी जिस कार्यपालिका की है पर वास्तव में इसे नहीं देख रहा है, कि किस प्रकार के पेड़ पौधों की मानव विकास के साथ समन्वय हो ताकि पर्यावरण की क्षति मानव विकास की जीने की आवश्यकता के लिए किसी भी कीमत में सुनिश्चित हो सके।
क्योंकि कार्यपालिका के अंदर निहित माफिया और रियल स्टेट बिल्डर के माफिया का गठबंधन स्पष्ट हो जाता है जिसका जमीनी धरातल पर जंगल हरे-भरे स्थान अलग दिखते हैं और कंक्रीट का जंगल अलग दिखता है। इस विकास के नाम पर विनाश की गारंटी को कहकर बचा नहीं जा सकता । किंतु कार्यपालिका का माफिया और रियल स्टेट का माफिया गठबंधन में दोनों के अंतरंग संबंध इतने समय में पूर्ण होते हैं कि वह इस विकास की पहली शर्त के रूप में आम आदमी को समझाने का प्रयास करते हैं। और औपचारिकता के साथ अपने कॉलोनी में पेड़ पौधों को जगह देते हैं। यानी यह उसी प्रकार का है की गमले के अंदर थोड़ा सा पेड़ लगा दो और अपना लंबा चौड़ा मकान तथा मानव समूह वहां खड़ा कर दो। तो यह मानव समूह का पर्यावरण के साथ एक भयानक अत्याचार भी होता है।
इससे भारत के राष्ट्रपति के उन सभी प्रयासों को धक्का लगता है जो शहडोल आकर के इस बात की गारंटी को सुनिश्चित करने का आश्वासन देती हैं की शहडोल में आदिवासी विशेष क्षेत्र के हितों को बनाए रखने के लिए पेसा एक्ट लागू किया गया है। यह उसकी पहली झलक होती है। वास्तव में आसपास आधुनिक मानव की अतिक्रमणकारियों सोच का अंजाम माफियाओं के कॉलोनी के विकास में स्पष्ट दिखाई देता है । जिसमें अब नेता घूंस के तौर पर नगद रकम नहीं मांगता, बल्कि वह कॉलोनी विकसित करके अफसर को या भ्रष्टाचारियों को मकान पकड़ा देता है जो लाखों व करोड़ों रुपए का होता है।
सवाल यह है कि राष्ट्रपति को इन क्षेत्रों के विकास के लिए कोई समीक्षात्मक सुनिश्चितता कैसे सुनिश्चित करनी चाहिए या वह तंत्र ही विकसित नहीं है..। जो राष्ट्रपति को इस बात के लिए आश्वासन दे कि जहां आप गई थी कम से कम वहां पर आपकी कहीं भी बातों का अमल हो रहा है…।
वन विभाग से जुड़े सेवानिवृत्ति रेंजर दयाशंकर शुक्ल मानते हैं शहडोल में पूरी संभावना है कि प्रत्येक मकान को पर्यावरण और पारिस्थितिकी के मध्य नजर मानव बसाहट सुनिश्चित की जाए। किसी भी कीमत में तालाबों नदी और नालों को छेड़ने की अनुमति नदी जाए दुर्भाग्य से प्रशासन और पालिका परिषद विरासत की इस धरोहर को बच्चा पानी में पूरी तरह से असफल रही है बल्कि तालाबों के ऊपर पेड़ पौधों को काटने और तालाबों में मकान बनाने का पट्टा देकर बड़ा मानवीय अपराध किया है उन्हें तत्काल सुधार कर कम से कम शहडोल मुख्यालय को प्रकृति और मानव के बीच तालमेल का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
“न्यायपालिका से जुड़े वरिष्ठ नागरिक आर के सिंह का कहना है शहडोल में जिस देवी से विकास के नाम पर हरियाली और तलाबों को नष्ट किया गया है वह आश्चर्यचकित करने वाला है। उन्होंने कहा हम शहडोल से कोर्ट जाते थे तो एक जंगल जैसा परिवेश हमको पार करना होता था। इतनी हरियाली तालाब आसपास थी, मानव विकास क्रम में हमने इस अमूल्य धरोहर को बहुत ही बेदर्दी से नष्ट किया है इसके लिए जरूर कुछ होना चाहिए। “अन्यथा यह शहर रहने लायक जगह नहीं रह जाएगा।
समाजसेवी सुशील कुमार शर्मा का कहना है सिर्फ नगर पालिका परिषद विरासत मैं प्राप्त तालाबों और वृक्षों की रक्षा कर ले इतने में ही शहडोल मुख्यालय में मानव सभ्यता प्रदर्शित हो सकती है किंतु सिर्फ भ्रष्टाचार उद्देश्य पूर्ति के लिए आश्चर्यजनक तरीके से तालाबों को और उसके आसपास सैकड़ो हजारों पेड़ों को नष्ट करके नगर पालिका ने शहडोल को नर्क बनाने का काम किया है पालिका परिषद व नेता भी कर्तव्य निष्ठा को भूलकर विकास के नाम पर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर रहे हैं.
इस तरह प्रमाणित होता है की माफिया तंत्र आदिवासी विशेष क्षेत्र में बुरी तरह से क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी को नष्ट कर रहा है। और भारत के राष्ट्रपति एक लाचार, अपाहिज और मानसिक विकलांग पुतले की तरह वह माफियाओं के साम्राज्य में कागजी-पुतला की तरह चौराहे में खड़ी महसूस होती है। यही एक बड़ा दुर्भाग्य है। और कोई बात नहीं…कार्यपालिका के बौद्धिक समाज और अति पिछड़ा बैगा-भरिया जनजाति समाज कम से कम इस मामले में एक जैसा प्रतीत होता है अब इस पर गर्व करें या रोंए दोनों एक ही परिणाम को प्रमाणित करते हैं।बेहतर होता की कम से कम जहां राष्ट्रपति जा रही हैं वहां यह समीक्षा की गारंटी सुनिश्चित होना चाहिए।अथवा भारत के राष्ट्रपति वहां जाती ही ना.. अन्यथा यह साबित होता है कि राष्ट्रपति की आंखें खोलकर माफिया तंत्र मिर्च डाल रहा होता है। ऐसा समझना चाहिए।

