
इस बार बाबा जी के नाम से लोकप्रिय किशोरी लाल चतुर्वेदी की बारी आ गई है क्योंकि माफिया की सूची अगर निकल जाएगी तो इसमें नेता अधिकारी सब संगठित रूप से लोकतंत्र को माफियातंत्र बनाने में दिखाई देंगे यह कहना जल्दबाजी होगी की शहडोल मध्य प्रदेश का पिछला क्षेत्र है शहडोल में काम कर चुके हर उस अधिकारी को यहां की हकीकत का ज्ञान है विशेषण राघवेंद्र सिंह को जो शहडोल में कलेक्टर रहे हैं और इस समय प्रदेश शासन में नियंत्रित करने वाले प्रमुख अधिकारी हैं तो क्या जो भी शहडोल में घट रहा है वह भोपाल के नियंत्रण में घट रहा है..?यहएक विचारणीय प्रश्न है..किंतु इसका समाधान कैसे होगा यह उससे भी गंभीर विचारणीय प्रश्न बन जाता है..?हमारे कर्तव्य निष्ठ अधिकारी जो शहडोल में विशेषकर मोहब्बत रखते हैं अपने आवास बना रखे हैं उन्हें शहडोल की अशांत होती इस माफिया गिरी से चिंता नहीं होती …?लेकिन क्या उनके हाथ से भीमाफिया तंत्र निकलता जा रहा है..?क्या शहडोल का व्यवहारी बिहार बनने से रोक नहीं जा सकता..?यह उन कर्तव्य निष्ठ शासन और प्रशासन वर्ग की ही जिम्मेदारी है किंतु वह कितना सफल होते हैं यह तो परिणाम बतायगा फिलहाल क्या परिस्थितियों हैं हम उसे पर चर्चा करेंगे..
………………..… (त्रिलोकी नाथ)……………………..
वैसे तो वर्तमान में शहडोल में स्थापित कोयला माफिया पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही थी शासन और प्रशासन का रेत माफिया पर केंद्रित था। रेत माफिया उस वक्त अवतरित हुआ जिस वक्त पहली बार एक बाहरी विधायक को शहडोल जिले की रेत का एकाधिकार का कारोबार कांग्रेस पार्टी के नीतिगत फैसले से सौंपा गया। तब करीब 50 करोड रुपए में शहडोल का खनिज रेत खदाने 3 साल के लिए ठेकेदार वंशिका ग्रुप को दे दिया गया। उसके मुखिया कांग्रेस के विधायक रहे जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रिय होने के बाद भी भाजपाई खट-पट के शिकार हो गए थे और उन्हें भाजपा छोड़कर कांग्रेस में विधायक बनना पड़ा। कांग्रेस की सरकार में कमलनाथ मुख्यमंत्री हुए और विधायक जी को शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में रेत उत्खनन का काम मिला। संजू भैया काम कर पाते कांग्रेस पार्टी पल्टी-मार का शिकार हो गई फिर से शिवराज सिंह, प्रदेश के चौहान यानी मुख्यमंत्री बन गए। ठेकेदार-विधायक जी को नियंत्रित करना साधारण नहीं था इसलिए शहडोल में कलेक्टर बंदना महिला-सशक्तिकरण का रूप रख कर आयी और आते ही सबसे पहले विधायक जी के व्योहारी के रेत उत्खनन पर एक मुस्त ताबड़तोड़ हमला किया, करीब 56 गाड़ियां पकड़ी गई उनके आदमी अपराधी बनाए गए फिर स्थिति सामान्य बन सकी और इतनी सामान्य बना दी गई की पारदर्शी तरीके से माफिया तंत्र की जड़े मजबूत होने लगी।
विधायक जी तो शहडोल आने से रहे लेकिन उनके कर्मचारी नुमा तमाम रेत में काम करने वाले माफिया के रूप में पल्लवित होने लगे थे। और जब उनका ठेका खत्म हुआ तब तक व्योहारी क्षेत्र में पौधे के रूप में विकसित हुआ रेत का माफिया तंत्र इतना विशाल हो चुका था कि वह खुद ठेकेदार बन सकता था। कहते हैं डेविड नाम का एक तंत्र इसी की उपज रहा जो आज भी क्षेत्र की रेत माफिया शासन का मुखिया बनकर जिले के खनिज अमले को नियंत्रित करता है। ठेकेदार चाहे संजू भैया हो या कोई और शहडोल उमरिया और घड़ियाल क्षेत्र में उसी का सल्तनत चलता है। किंतु माफिया गिरी की खेती व्योहारी को बीते तीन-चार साल में शासन के संरक्षण में कितना परिपक्व बना दी थी कि शहडोल का व्योहारी, माफिया गिरी के मामले में कब बिहार बन चला यह पता ही नहीं चला। रेत माफिया तंत्र की कर प्रणाली मेंआम आदमी तो दुर्घटना में कीड़े-मकोड़े की तरह मरता ही रहता है शारीरिक और मानसिक शोषण दमन व्योहारी लोकसभा क्षेत्र के नेताओं के हाथ में एक औजार के रूप में घड़ियाल की तरह विकसित हो गई थी।
किंतु उसका असर तब देखने को मिला जब दो-तीन पटवारी इस माफिया गिरी के चक्कर में रात्रि को अपना कर्तव्य निर्वहन कर रहे थे तो एक पटवारी प्रसन्न सिंह बघेल जो आर्मी से रिटायर था उसकी माफिया तंत्र ने कुचल करके हत्या कर दी। पुलिस और प्रशासन चाहता तो माफिया राज को इस भयानक आक्रमण का जवाब दे देता किंतु जब माफिया गठन शासन और प्रशासन के भ्रष्ट लोगों के साथ गठित के संरक्षण में पल्लवित होता है तो यह सब संभव नहीं था। सब कुछ पारदर्शी रहा।
कहते हैं कलेक्टर ने तब ₹25000 मृतक पूर्व सेना के जवान पटवारी प्रसन्न सिंह के परिवार को देना चाहा किंतु परिवार ने न्याय को प्राथमिकता दिया सरकारी सहायता को तिलांजलि दी। लेकिन इससे भी प्रशासन ने सीखा नहीं… परिणाम स्वरूप जब माफिया तंत्र में नियंत्रण की दृष्टिकोण से खनिज विभाग शहडोल के दो इंस्पेक्टर पपौंध गए थे तो पारदर्शी रेत माफिया तंत्र ने उनके साथ भी वही हरकत करने का प्रयास किया जो पटवारी प्रसन्न सिंह और अन्य पटवारी के साथ हुआ था.. यह दिन की बात थी।कहते हैं खनिज विभाग के इंस्पेक्टर्स ,पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर से सहायता भी मांगे किंतु पुलिस ने पारदर्शी माफिया तंत्र के पक्ष में अपनी कार प्रणाली को पारदर्शी रखा और कार्यवाही में लेट लेतीफी हुई।
यही हाल देवलोंद थाना के पुलिस ने पटवारी यानी राजस्व के मामले में बनाए रखा था। घड़ियाल परियोजना क्षेत्र के रेत माफिया तंत्र से परेशान एक सेना के जवान ने भी जब पुलिस से ऐसी ही सहायता मांगी पुलिस ने उन्हें माफिया तंत्र से न लड़ने की हिदायत दी थी। वह जवान भटकता रहा और उसका खलिहान भी आग लगा दिया गया। इस पावर दिल्ली स्थित एक लेफ्टिनेंट कर्नल ने शहडोल प्रशासन को रेत माफिया की विकसित होने की सूचना दिया और उसे पर कार्यवाही का निर्देश भी दिया किंतु माफिया तंत्र के सामने उसे पत्र की कोई हैसियत नहीं थी। उसका परिवार भी प्रताड़ित हुआ किंतु पटवारी प्रसन्न सिंह की इस क्षेत्र में हत्या से कोई सबक नहीं ली गई। फिर माइनिंग इंस्पेक्टर के साथ असभ्यता में पुलिस ने सकारात्मक रूप नहीं रखा और अनियंत्रित माफिया तंत्र ने व्योहारी के एक पुलिसअधिकारी की कुचलकर हत्या उस वक्त की जब रात्रि में अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा था जैसा कि एडीजीपी दिनेश चंद्रसागर ने बताया।तो पुलिस और प्रशासन के दो लोगों की स्थापित मजबूत हो चुके माफिया तंत्र के द्वारा हत्या की जा चुकी थी। इस माफिया तंत्र की ताकत से निकल करके एक अन्य व्यक्ति विधानसभा में पिछले दिनों चुनकर भी गया जो पड़ोस के जिले से विधायक हैं। वह तो अपनी जगह हैं।
तो व्यौहारी माफिया का बिहार बन चुका था । यहां कभी भी कुछ भी पारदर्शी तरीके से आम-बात हो गई थी। दो-दो हत्याओं ने रेत की माफिया तंत्र की ताकत को इतना पावरफुल बना दिया कि उसे नियंत्रित रख पाना अब प्रदेश के डीजीपी अथवा चीफ सेक्रेटरी के लिए या फिर मुख्यमंत्री के लिए समान्य नहीं था । सिवाय इसके की कथित तौर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दिवंगत पुलिस अधिकारी की मृत्यु पर एक करोड रुपए देने की घोषणा की थी जो पटवारी की हत्या में ₹25000 तक ही सीमित थी। ताकि मामला किसी तरह शांत हो।
इसी बीच कई दशकों से स्थापित कोयला माफिया में गेंगवार पारदर्शी तरीके से कोयले के काला बाजार में आधिपत्य को लेकर विकसित हो गया और अमलाई थाना क्षेत्र में सुरक्षा जवानों पर राजनीतिक हमले होने लगे।करीब 40 टन कोयले को अवैध रूप से पकड़ा भी गया किंतु कोयला के काला बाजार के सिकंदर रह चुके किशोरी लाल चतुर्वेदी को अचानक व्योहारी पुलिस ने पुराने 2016 के धूल लगे मुकदमे पर पकड़ लिया। और कार्यवाही की। लंबी-चौड़ी गुणगान गाथा पुलिस के द्वारा प्रस्तुत की गई। यह कितना महान कोयले का कारोबारी था। वास्तव में कोयले का काला बाजार स्थापित माफिया तंत्र का सुव्यवस्थित जहां पारदर्शी तरीके से सब कुछ शांति प्रिय चल रहा था। हालांकि इसी प्रकार की शांति नवजात रेत माफिया तंत्र को भी पल्लवित होने में समय लगता किंतु रेत का माफिया तंत्र 21वीं सदी का माफिया तंत्र है इसलिए उसने जल्दी ही अपने परिणाम देने चालू कर दिए थे। जिसमें दो सरकारी सेवकों की हत्या एक सामान्य उदाहरण रहा और भी हत्याएं स्थापित माफिया तंत्र के द्वारा कभी भी किसी भी वक्त हो सकती हैं क्योंकि उसकी पैठ कोयला माफिया तंत्र की तरह शासन और प्रशासन में परिपक्व नहीं है। वह नवजात है और एकाधिकार चाहता है। जिसका परिणाम कोयला माफिया तंत्र को भुगतना पड़ा। समझा जा सकता है माफिया गिरी की इस मामले को भ्रमित करने के लिए कुछ और चमत्कारिक कार्यवाहीयां दिखाई जा सकती है।
माफिया तंत्र को नियंत्रित करने के लिए एक टीम का गठन
इस बीच प्रदेश के प्रशासन ने दिखाने के लिए ही सही रेत माफिया तंत्र को नियंत्रित करने के लिए एक टीम का गठन कथित तौर पर किया है जिसमें रीवा, जबलपुर और शहडोल के माइनिंग ऑफिसर मिलकर कुछ नया चमत्कार दिखाने के चक्कर में शहडोल में हैं यह अलग बात है की जबलपुर का रेत का वह माफिया ही था जो वायरल ऑडियो फोन कर के शहडोल के वन विभाग के एक महिला रेंजर से माफिया गिरी की मोहब्बत भरी बात करता था। जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही रेंजर पर नहीं की गई है। माफिया जी का तो पता नहीं। यह भी पारदर्शी है। रीवा, शहडोल से माफिया गिरी का अगला पड़ाव है इसलिए वहां के माइनिंग अफसर को से व्योहारी क्षेत्र का स्थापित माफिया तंत्र कितना तवज्जो देगा यह प्रश्न चिन्ह है… और शहडोल का माइनिंग ऑफिस पूरी तरह से सरकारी तनख्वाह पाने वाला रेत माफिया का एक गुलाम तंत्र में प्रमोद शर्मा के कार्यकाल में स्थापित हो चुका है है ऐसे में नए अधिकारी देवेंद्र पतले को सिस्टम में फिट होने में अभी समय लगेगा हो सकता है यह गठित टीम छुटपुट कार्यवाही करके सिस्टम को विकसित कर करके माफिया के साथ कैसे संबंध में रखे जांए ताकि सब कुछ शांतिप्रिय कानून व्यवस्था तरीके से चल सके
इसे बनाने में सफलता पा सकें। किंतु आदिवासी विशेष क्षेत्र जिसमें महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शहडोल आकर के गारंटी देती हैं कि यह संविधान की पांचवी अनुसूची में सुरक्षित है फिलहाल होता दिखाई नहीं देता… बल्कि कभी नवजात रेत माफिया-तंत्र का कोहराम सुनाई देता है तो उसे दबाने के लिए कोयला माफिया तंत्र की पुरानी फाइलें सामने आने लगते हैं.. दरअसल आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल माफिया तंत्र के काकस में अनजाने में जकड़ गया है जो शहडोल के निरपेक्ष नवजात कमिश्नर और कलेक्टर एवं अन्य अधिकारियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती भी है और एक बड़ा खतरा भी है.. क्योंकि प्रदेश में कई पुलिस के उच्च अधिकारी इसी माफिया तंत्र के रास्ते में आने पर हत्या कर दिए गए हैं ऐसा अनुभव में आया है इसलिए पुलिस और प्रशासन को आंख मूंद कर विश्वास करते हुए कदम बढ़ाने की बजाय सोच समझकर माफिया की जड़ों में मट्ठा डालने का प्लान बनाना चाहिए… अन्यथा बड़ी बात नहीं है कि अब छोटे शासकीय सेवकों की नहीं बड़े अधिकारियों की हत्या की खबरें भी हमें सुनाई देने लगेंगे.. जब तक खनिज विभाग में आमूल चूल परिवर्तन कर्मचारी लेवल पर नहीं हो जाता है कम से कम माईनिंग की नवगठित टीम को यह समझना चाहिए..। जब तक पुलिस से परे विशेष प्रशासनिक दल किसी निरपेक्ष संगठित टीम से यहां पर कार्यवाही नहीं होगी तो कल किसी की बारी हो सकती है।
जैसे इस बार बाबा जी के नाम से लोकप्रिय किशोरी लाल चतुर्वेदी की बारी आ गई है क्योंकि माफिया की सूची अगर निकल जाएगी तो इसमें नेता अधिकारी सब संगठित रूप से लोकतंत्र को माफियातंत्र बनाने में दिखाई देंगे… यही आदिवासी क्षेत्र की प्राकृतिक संसाधनों की लूट की इतिहास बनता चला जाएगा।जैसे पुलिस ने किशोरी लाल चतुर्वेदी की इतिहास को प्रदर्शित किया है क्योंकि प्रश्न यह खड़ा ही है की तब पुलिस और प्रशासन क्या कर रहा था जब किशोरी लाल चतुर्वेदी तमाम सम्मानित पदों में चुनाव लड़ रहे थे तो क्या अब किशोरी लाल चतुर्वेदी को कमजोर खिलाड़ी साबित किया जा रहा है…? माफिया तंत्र की गेंगवारी में….? तो फिर किस को विकसित किया जा रहा है…? कोयले की कालाबाजारी में…यह भी स्पष्ट होना चाहिए ताकि उसे लोकतंत्र नमन कर सके.. क्या कोई यह जानकारी शहडोल में आने वाली आदिवासी वर्ग की राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू को भी बताता होगा यह भी प्रश्न चिन्ह है…?

