पत्रकारिता को जिंदा रहने के लिए चाहिए “प्रेस-बॉन्ड” – ( त्रिलोकीनाथ )

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स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को सपना आया कि देश के राजनीतिक दलों के द्वारा करोड़ों और अरबों रुपए जो चंदा लिया जा रहा है उसे बैध तरीके से कैसे लिया जा सकता है.., जनता को पता भी ना चले और किसी को भी पता ना चले सिर्फ मैं और मेरी सरकार यह जाने कि किसने, किसको, कितना पैसा दिया है और बैंक में पैसा भी पैदा हो जाए । परिणाम स्वरुप उन्होंने एक योजना बनाई उसका नाम रखा “इलेक्टोरल बांड”…। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने निश्चित रूप से वित्त मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय से इसमें सहमति ली होगी क्योंकि अब तक का लगभग राजनीतिक दलों के दृष्टिकोण से सबसे बड़ा 160 अरब रुपए इलेक्टोरल बांड के जरिए इकट्ठा होना दिखाया गया है।ऐसा तब खुलासा हुआ जब सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया ने यह तय किया कि लोकतंत्र में इस प्रकार से पैसा नहीं लिया जा सकता और सूची भी चुनाव आयोग की वेबसाइट में जारी कराई गई। यह एक प्रक्रिया है हमने इसे समझा…।इलेक्टोरल बॉन्ड: सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर चुनाव आयोग का कैसा रुख़?- प्रेस रिव्यू - BBC News हिंदी—-( त्रिलोकीनाथ )—–
किंतु हमारे यह समझ में नहीं आया की मुट्ठी भर राजनीतिक दल देश के चार लोकतांत्रिक स्तंभों में एक विधायिका के राजनीतिक दलों के लिए स्टेट बैंक आफ इंडिया ने कितना बड़ा प्लान कैसे बना लिया…. उनके अधिकारियों की सोच अगर इतनी उत्कृष्ट स्तर की है तो उन्होंने देश के उसे अदृश्य चौथे स्तंभ पत्रकारिता के लिए अति आवश्यक “प्रेस बांड”बनाने के बारे में क्यों विचार नहीं किया…? कि देश के लाखों पत्रकार चंदा पर आधारित आजीविका के आधार पर पत्रकारिता का कारोबार कर रहे हैं। तो उन्हें बैध रूप से चंदा क्यों नहीं मिलना चाहिए।

आखिर पत्रकारों को खासकर के जमीनी पत्रकारों को अखबार मालिक या मीडिया मालिकों के लिए नहीं, आजीविका के लिए वैधानिक तरीके से पैसा कैसे उसके परिवार पोषण का सहारा बने..?
Hindi Journalism Day 2022 Special Importance And Challenges Of Journalism In The Way Of Nation's Development - Amar Ujala Hindi News Live - हिंदी पत्रकारिता दिवस 2022 विशेष:राष्ट्र निर्माण में ...   यह तो स्पष्ट है कि देश में जब से पत्रकारिता आई है तो शुरू में दैनिक अखबारों में भी इस बात का उल्लेख रहता था कि अखबार का मूल्य नहीं होता उसकी जगह लिखा रहता था “चंदा की दरें “लिखा  था। और धीरे-धीरे अखबार मालिकों ने अपनी कीमत लगाना चालू किया और आज अखबार में लिखा रहता है “मूल्य”; लेकिन तब भी जमीनी पत्रकारों को आजीविका पार्जन का सही पारिश्रमिक नहीं मिलता था और आज उससे भी ज्यादा बदतर हालात हैं। क्योंकि वह आज भी चंदे पर आश्रित है। और चंदा घोषित तरीके से देने वाली संस्थाएं ना के बराबर हैं। यह सही भी है कि अगर पत्रकार आम जनता से आम लोगों से या संस्थाओं से चंदा नहीं लेगा यानी उसका नमक नहीं खाएगा तो वह जनता के प्रति वफादारी नहीं करेगा यानी उसकी जवाब देही जनता और लोकतंत्र के प्रति कमजोर पड़ जाएगी।

    क्योंकि यह आदमी का स्वभाव है कि वह जिसका नमक खाता है उसी की जी-हुजूरी करता है इससे अगर पत्रकार नौकर बनकर अखबार मालिक का यह मीडिया मलिक का नमक खाएगा तो मीडिया मलिक की अखबार मालिक उसे जैसा कहेंगे वैसा वह करेगा। स्वाभाविक है ऐसे में पत्रकारिता नहीं होगी बल्कि वह एक माफिया की तरह नेटवर्क का हिस्सा कहलाएगा और निष्पक्ष समाचार जनता तक नहीं पहुंचेगी। क्योंकि मीडिया मालिक और अखबार मालिक बहुआयत सरकार के विज्ञापनों पर जिंदा रहते हैं अथवा सरकार के इशारे पर चिन्हित कंपनियों के विज्ञापनों पर आश्रित रहते हैं। क्योंकि सरकारी आदमी या नेता यदि किसी कंपनी को कहेंगे कि वह फला-फला अखबार यह मीडिया को विज्ञापन दे तब विज्ञापन करोड़ अरबो रुपए की अखबार या मीडिया संस्थानों को चलाने लायक पैसा देगा, अन्यथा वह कोई मदद नहीं करेगा… ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता, गुलाम पत्रकारिता के रूप में स्पष्ट रूप से पारदर्शी हो जाती है । जैसा कि इस समय बहुतायत देखा जा रहा है।

इसीलिए जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता से चुनी हुई एक लोकतांत्रिक सरकार में जनता के प्रति जवाब देही पत्रकारिता की प्राथमिक जिम्मेदारी है। और यह जिम्मेदारी तब सुनिश्चित होगी जबकि पत्रकारों का परिवार को पेट पालने के लिए न्यूनतम पैसा यानी पारिश्रमिक दिया जाए किंतु हो यही रहा है कि पत्रकारिता से जुड़े लोगों को किसान की तरह दिन-रात पसीना बहाना पड़ता है और उपज के रूप में उसे नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसी हालत में आम जनता का मिलने वाला चंदा ही इसका सहारा है। तभी वह जनता के प्रति जवाब देह होकर पत्रकारिता के मूल धर्म के तहत लोकतंत्र में अपनी भागीदारी तय कर पता है । अब सवाल यह है की आम जनता का पैसा चंदे के रूप में कैसे वैधानिक तरीके से पत्रकारों को प्राप्त हो..?

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने विधायिका के लिए “इलेक्टोरल-बांड” एक बेहतरीन उत्पादन के रूप में प्रस्तुत किया था किंतु उसकी मंसा अच्छी नहीं होने से इलेक्टोरल बांड की मर्यादा तार तार हो गई और उसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
बहुत पहले बैंकर्स एक विज्ञापन देते थे “शेखचिल्ली हमें भी मिले होते क्योंकि वह सपना देखता था… इसी तरह पवित्रा मंसा से पत्रकारों और निष्पक्ष पत्रकारिता के हित में भी “प्रेस-बांड” को जारी करना चाहिए वह पूरी तरह से पारदर्शी भी होनी चाहिए ताकि कौन पत्रकार किस स्थान से कितनी आर्थिक मदद यानी चंदा ले रहा है यह स्पष्ट हो सके । जिसमें उसकी न्यूनतम चंदा की सीमा भी सुनिश्चित होना चाहिए और अधिकतम चंदा की भी सीमा सुनिश्चित होना चाहिए ताकि यदि आयकर देने की स्थिति बनती है चंदा संग्रहण के दायरे में वह भी राष्ट्रीय भागीदारी में आम पत्रकारों से लिया जाना चाहिए क्योंकि देखा यह जाता है कि कुछ लोग या कुछ संस्थाएं जो आर्थिक मदद करती भी हैं पत्रकारों को वह इस प्रकार का होता है जैसे वह कोई अपराध कर रही है जबकि वेलफेयर फंड के जरिए वह घोषित तरीके से इस प्रकार की आर्थिक मदद स्थानीय जमीनी पत्रकारों को करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह आवश्यक हो सकता है की ऐसे चंदा में g80 के तहत आयकर से छूट का प्रावधान भी होना चाहिए चंदा दाता के लिए किंतु यदि पत्रकार एक निश्चित सीमा के बाद जो उसके परिवार पोषण के लिए न्यूनतम आयकर सीमा के अधीन हो उससे ज्यादा लेता है तो उसे बकायदे आयकर विभाग में टैक्स देकर अपने राष्ट्रीय योगदान को सुनिश्चित करना चाहिए । लेकिन दुर्भाग्य से स्टेट बैंक आफ इंडिया ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बीते 75 साल में इस प्रकार के किसी उत्पाद का प्रयास नहीं किया है बल्कि मुट्ठी भर राजनीतिक दलों के लिए उसने ऐसे इलेक्टोरल बांड का उत्पाद दिखाए जो काला बाजार और बेईमानी के हितों के लिए समर्पित दिखता था। जबकि बैंक में उच्च स्तर के बौद्धिक अधिकारी होते हैं वह अपने गुणवत्ता का उपयोग राष्ट्रीय हित में पारदर्शी तरीके से भी कर सकते थे।

इतना तो तय है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार फिर से शासन में आती है Electoral Bond | Central Govt Preparations to bring electoral bonds in new avatar | चुनावी बॉन्ड नए अवतार में लाने की तैयारी में सरकार: नई स्कीम के लिए समिति बनेगी; नया मॉडलतो इलेक्टोरल बांड को संसद के जरिए वैध करार दिया जा सकता है कुछ संशोधनों के सहित। किंतु यही प्रयास देश के चौथे स्तंभ पत्रकारिता के लिए आखिर क्यों नहीं किया जा सकता लेकिन यह दबाव असंगठित क्षेत्र के पत्रकारों के द्वारा अपने इच्छा और मनोशक्ति से सर्व समझ निर्णय के जरिए राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को देना चाहिए । जिससे आने वाले समय में भारतीय पत्रकारिता की जड़े मजबूत हो सके।
अन्यथा वह गुलाम से बेहतरीन गुलाम और राग दरबारी बनकर लोकतंत्र की हत्या करने में अनचाहे तरीके से भागीदार हो जाएगा ।क्योंकि लोकतंत्र तभी जिंदा है जब भारतीय पत्रकारिता जब तक जिंदा है और यह आम हो चुका है कि भारतीय पत्रकारिता जड़ों में धीरे-धीरे भ्रष्ट सिस्टम माठा डाल रहा है ताकि वह एक नपुंसक समाज बन कर भ्रष्ट समाज का तलवा चाटने का काम करें और यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम होगा।

इससे देश के आजादी में लाखों शहीदों का अपमान भी होगा इसलिए बेहतर है की इलेक्टोरल बांड की तरह पारदर्शी तरीके से एक “प्रेस-बांड” जारी करना चाहिए जिसे करता अपनी शिक्षा से किसी भी पत्रकार को बैध तरीके से चंदा के रूप में दान कर सके यह भी भारतीय लोकतंत्र के बचाने का एक बड़ा रास्ता हो सकता है। अन्यथा पत्रकारों को चंदा देने वाले और चंदा लेने वाले पत्रकार धीरे-धीरे अपराध बोध से ग्रस्त हो जाएंगे जबकि इस उत्साहवर्धक योजना के रूप में लोकतंत्र के प्रति जवाब देही सुनिश्चित करने के लिए भारतीय पत्रकारिता को खुले आसमान में उड़ने की इजाजत दी जा सकती है।क्योंकि यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारतीय जमीनी पत्रकार आज भी आम आदमी से चंदा लेकर अपना काम चलाती है। पहले तो फिर भी सुरक्षा थी अखबार मालिक पत्रकारिता का सम्मान करते हुए पत्रकारों को पैसा देते थे अब जब यह तय हो जाता है कि वह बेहतरीन नौकर है और गुलाम है तभी उसको आउटसोर्स के जरिए नौकरी दी जाती है जिसे वह पत्रकार कहकर बदनाम करता है तो जो पैसा अवैध रूप से चंदे के तरीके से जमीनी पत्रकारों का पोषण कर रहा है उसे क्यों नहीं प्रेसबांड के जरिए बैध और कानून संगत बनाया जाए….। सवाल हमारे हमारे लोकतंत्र के तीन कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता मनसा पर भी है कि वह भारतीय पत्रकारता को जिंदा रखने में क्या प्रेस-बांड जैसी विकल्प को प्रोत्साहित करेगी…?


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