
शहडोल संभाग में नक्शा तरमीम सहित अन्य राजस्व प्रकरणों चलेगा 10 से 25 जुलाई तक राजस्व सेवा अभियान
शहडोल 9 जुलाई 2024- कमिश्नर शहडोल संभाग बीएस जामोद की पहल पर शहडोल संभाग में 10 जुलाई से 25 जुलाई 2024 तक राजस्व सेवा अभियान चलाया जाएगा। राजस्व सेवा अभियान में नक्शा तरमीम तथा 2 से 5 वर्षाें से लंबित राजस्व प्रकरणों का शत-प्रतिशत निराकरण किया जाएगा। साथ ही राजस्व अभियान समाप्ति के पश्चात संबंधित राजस्व न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी तहसीलदार, नायब तहसीलदार शत-प्रतिशत निराकरण का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना भी सुनिश्चित करेंगे।
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मामला अवैध कॉलोनाइजर्स का;पारदर्शी-भ्रष्टाचार पर बिना लाग-लपेट समीक्षा क्यों नहीं होना चाहिए –
सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में कई बार यह खबरें आ गई है कि कॉलोनाइजर अवैध तरीके से कॉलोनी बना रहे हैं इसलिए उसमें क्रय विक्रय पर रोक लगाई जाती है। पहले तो यह कंफ्यूजन हो रहा था की क्या एक ही जमीनों पर बार-बार प्रेस नोट जारी की जा रहा है लेकिन जल्दी स्पष्ट हो गया कि नहीं अलग-अलग तरीके से अलग-अलग जमीनों पर जो कॉलोनाइजर एक्ट को नजर अंदाज पर कालोनियां विकसित हो रहे हैं उसे पर कार्यवाही हो रही है। इससे यह तो स्पष्ट हो गया सरकारी तौर पर, कि कई कॉलोनाइजर हैं जो गैर कानूनी तरीके से कालोनियों का निर्माण कर रहे हैं, किंतु जो वैध कॉलोनी है और जो अवैध कालोनियां है उनकी पूर्ण समीक्षा जिले स्तर पर क्यों नहीं होनी चाहिए..?
————(त्रिलोकी नाथ)———–
क्योंकि आम आदमी इतना जागरुक नहीं है कि वह सामान्य तौर पर यह समझ सके कि कौन सी कॉलोनी का खसरा नंबर बैध है और कौन सी कॉलोनी का खसरा नंबर अवैध है। इसे दूसरी भाषा में समझें क्योंकि जमीनो के खसरों का नक्शा सही ढंग से तरमीम नहीं हो पाया है इसलिए भी स्पष्ट तौर पर यह पता नहीं चलता की कौन सी जमीन पर चल रही कॉलोनी कब अवैध घोषित हो जाए और कैसे उसे बैध मान लिया जाए ।इससे बृहद स्तर परभ्रष्टाचार की संभावना पल्लवित होती है या ऐसा भी भ्रम पैदा होता है कि यह कार्यवाही भ्रष्टाचार के लिए एक प्रयोगशाला की तरह काम कर रही है, वास्तव में ऐसा है नहीं यह पहली बार हुआ है कि बढ़ते हुए शहडोल नगर को केंद्र में रखकर विकास के क्रम में कॉलोनाइजर को लेकर प्रशासनिक अधिकारी अपने दायित्वों का गंभीरता से निर्माण कर रहे हैं।
इसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए। वह आम नागरिकों के भविष्य के लिए बेहद सुरक्षित और कानून व्यवस्था को देने वाला है किंतु यह भी बात बहुत गंभीरता से देखी जानी चाहिए की शहडोल में रियल स्टेट पर काम करने वाले सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े तमाम लोग जमीन के घोटाले पर बड़ी तेजी से आगे बढ़े हैं जो जितना बड़ा नेता है पर उतना ही गैर कानूनी काम करने पर अपनी नेतागिरी की सफलता समझता है। कालोनियों का निर्माण या तो सरकारी जमीनों पर अथवा आदिवासियों की जमीनों पर प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर के उन पर हेरा फेरी करके कब्जा कर रहे हैं। और लोगों को बेंच भी रहे हैं।
यह सही है कि कांग्रेस पार्टी के लोग भी या अन्य पार्टियों के लोग भी इसी तरह का काम प्रतियोगिता के कारण कर रहे हैं यानी तमाम राजनीतिक दल को माफियाओं की तरह अपने को जल्दी से जल्दी अमीर बनने के चक्कर में सत्ता के संरक्षण पाते हुए भूमि का घोटाला भी कर रहे हैं । इसलिए भी विशेष रूप से यह समीक्षा शहडोल केंद्रित अथवा विकसित हो रहे बुढार धनपुरी व्यवहारी अथवा जैसीहनगर क्षेत्र के आसपास की जमीनों को लेते हुए क्यों नहीं करना चाहिए। जो भी कालोनियां या भूखंड कॉलोनी के रूप में विकसित हो रहे हैं उसमें कितने वैध हैं और उसमें कितने अवैध…? कितने सरकारी जमीन पर हैं कितने आदिवासियों की जमीन पर बन रहे हैं..? उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह भी की कितने तालाबों को कब्जा करके बनाया गया है कितने नदी जल स्रोत को प्रभावित करके कालोनियां विकसित की गई है..? और उनके लिए प्राथमिक तौर पर दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित करना चाहिए।
क्योंकि जो भी जीवित पत्रकारिता है वह अक्सर इस बात को प्रकाशित करती रही है की प्रभावशाली लोग सरकारी कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के जरिए प्रभावित करके आदिवासियों की और शासकीय जमीनों तथा तालाबों, कुओं और नदी नालों की जमीन पर आंख मूंद कर कब्जा किया है और उसमें कई भूखंड बेच भी दिए हैं। किंतु अभी तक कोई परिणाम दायी कार्रवाइयां सामने नहीं आई है।
अब जबकि जिला कलेक्टर अथवा संभागीय कमिश्नर इस मामले को लेकर के बेहद संवेदनशील तथा कड़क दिखाई देते हैं तो यह पृथक से सर्वोच्च प्राथमिकता में समीक्षा का विषय होना ही चाहिए। इससे आम नागरिकों को कार्यपालिका की तरफ से लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का आश्वासन भी मिलेगा और वह खुद करके अपनी पीड़ा को प्रशासन के सामने रख सकेगा।
अब तो स्पष्ट तौर पर अहमदाबाद की एक संस्था ने भूजल स्थल गिरावट औरबढ़ते गर्मी की प्रकोप पर पारदर्शी तरीके से कुछ आंकड़े भी जारी किए हैं। जिसमें यह स्पष्ट हो गया है की जल स्तर तेजी से खत्म हो रहा है और उसके परिणाम स्वरुप गर्मी भी तेजी से बढ़ रही है।
तब भारत के संविधान में पांचवी अनुसूची में अनुसूचित शहडोल क्षेत्र को हम एक बड़ी प्रयोगशाला के रूप में विश्वविद्यालयों मे़ स्टडी के जरिए अथवा शोध कार्यों के जरिए सुरक्षित क्यों नहीं रख सकते हैं… शहडोल में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक विश्वविद्यालय है तो दूसरा शंभू नाथ शुक्ला विश्वविद्यालय भी स्थापित है. इन विश्वविद्यालय में भी इस प्रकार की अध्ययन करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होता है और जलस्तर अथवा पर्यावरण तथा स्थिति की का विषय अकेले कार्यपालिका का विषय नहीं है यदि कमिश्नर शहडोल इस प्रकार के अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय को सलाह देंगे तो निश्चित रूप से वह इन शोध कार्यों की ओर आगे बढ़ेंगे.. ताकि शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र जिस संविधान ने सुरक्षित रखने की गारंटी दी है उसे पर व्यापक काम हो सकेगा। लेकिन यह तो हमारे जैसे लोग सोचते हैं और उस पर अपने विचार रखते हैं काम तो प्रशासनिक अधिकारियों को करना है अथवा संबंधित विश्वविद्यालय के कुलपतियों को सवाल यह भी है कि क्या वह इस दिशा में कुछ विचार रख पाते हैं .…।
ताकि शहडोल जैसे मैं कल विंध्य क्षेत्र के गोद में बसे पर्यावरण और परिस्थिति की की सबसे बड़े संवेदनशील क्षेत्र में प्रकृति को मूल रूप में संरक्षित किया जा सके। यह देखना होगा लेकिन जिस तरह से हाल में प्रशासन ने अवैध कॉलोनाइजरों पर अपना नकेल कस है उसकी प्रशंसा बार-बार करनी चाहिए क्योंकि यह आम नागरिकों के हितों की सुरक्षा से संबंधित विषय है और इसे व्यापक समीक्षा के दौरान सिर्फ चिन्हित कॉलोनाइजरों या शिकायत में आए ।
देखा गया कि जितने भी कॉलोनाइजर नगरों के आसपास रियल एस्टेट के जरिए ब्लैक मनी स्टोर कर रहे हैं अथवा आदिवासियों और तालाबों, नदियों को नष्ट करके लूट का धंधा बनाए हुए हैं उसे पर भी समीक्षा होनी ही चाहिए। बिना यह सोच कि फला नेता भारतीय जनता पार्टी का बड़ा नेता है अथवा कांग्रेस का बड़ा नेता है। भू माफिया करोड़पति है या वह अरबपति है निश्चित तौर पर जब लोकतंत्र शहडोल में लौटा है नए प्रशासनिक कर्तव्य लिस्ट अधिकारियों के संरक्षण में तो ऐसी अपेक्षा जिंदा होने के लिए करवट लेती ही है देखना होगा कि प्रशासन आगे आगे प्रकृति संरक्षण और नियम कानून की शांति व्यवस्था के लिए अपनी ताकत और योग्यता का कितना इस्तेमाल करता है

