
केंद्र की सरकार ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप “पीपीपी” मॉडल के तहत कई शासकीय संस्थाओं को निजी व्यक्तियों के हवाले किया है दूसरी भाषा में इसे कहा जाता है की प्राइवेट लोगों को शासकीय आराजी और संपत्ति बेच दी है। इसी क्रम में रेलवे की संपत्ति को भी विक्रय करने का जगह-जगह काम किया है सत्ता में बैठे लोगों के उनके अपने कुछ पूंजीपति मित्र हैं और उन मित्रों के कुछ प्राइवेट कॉन्टैक्टर हैं पेटी कॉन्टैक्टर हैं वह सब मिलकर के पूरे देश की रेलवे की संपत्ति में अपनी सुविधा के अनुसार पीपीपी मॉडल पर रेलवे की सैकड़ो साल की संपत्ति को कब्जा कर रहे हैं। और उसे विक्रय भी करने का विकास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम आदमियों के हित में आखिर यह “पीपीपी मॉडल” काम क्यों नहीं कर पा रहा है। भारत के लोकतंत्र में आम आदमियों के द्वारा अक्सर देखा गया है रिक्त स्थानों पर आकर ठेले वाले रेहड़ी वाले सब्जी वाले लोगों की सेवा के लिए अपने वस्तुओं को लाकर के विक्रय कर और अजीबका भी कमाते हैं। यह वर्षों वर्ष से चला आया है धीरे-धीरे वह स्थान बड़े बाजार का स्वरूप लेता है और फिर कोई पूंजीपति वहां आते हैं और उसे स्थान पर कब्जा कर लेते हैं । कुछ लोग इसे छोटी मछली को बड़ी मछली खा लेती है यह प्रकृति का नियम है ऐसा कहकर प्रचलित करते हैं वास्तव में लोकतंत्र में इसकी कोई जगह नहीं है…
………….(त्रिलोकी नाथ)……………….
यदि पूंजीपति मित्रों की पूंजी और उनके षड्यंत्र देश की संपत्ति पर कब्जा कर रहे हैं या ऐसी नीतियां बनाई गई है तो आम आदमी जो लोक विधा के धनी होते हैं उनके ज्ञान के आधार पर ऐसे बाजार विकसित होते हैं उनकी अधिकारिक लोकतंत्र में सुनिश्चित क्यों नहीं होनी चाहिए हमने देखा है शहडोल के रेलवे स्टेशन में एक सब्जी मंडी है जहां शुद्ध सब्जी मिलने की गारंटी है क्योंकि आसपास की ग्रामीण उसे स्थल पर आते हैं और उसे आवाज करते हैं पुरी रेलवे कॉलोनी और शहडोल के लोग भी अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोडक्ट यानी सब्जीको खरीदने के लिए आंख मूंद कर इन ग्रामीण विक्रेताओं पर भरोसा करते हैं यह भरोसा ऊंची कीमत में किसी पूंजी पति पर भी नहीं किया जा सकता इसके बावजूद भी हमारा लोकतंत्र इतना नपुंसक क्यों हो चुका है कि अगर बाजार इनके द्वारा सामूहिक तौर पर विकसित किया जा रहा है देश में स्थायित्व और रोजगार देने की चाहत शासकीय नियमों के अधीन क्यों नहीं की जा सकती है…?
बिल्कुल की जा सकती है किंतु इन बाजार विक्रेताओं की अधिकारिकता सिर्फ इतनी है कि वह पूंजीपति षड्यंत्रकारी सत्ता की नियमित गुलामी में सैकड़ो साल से ऐसे बाजार विकसित करते हैं और फिर वहां से हटा दिए जाते हैं। यह रेलवे की संपत्ति पर ज्यादातर देखा गया है जबकि हर रेलवे कर्मचारियों को एक गुणवत्तापूर्ण ऐसी सब्जी बाजार की आवश्यकता है जो आंख मूंदकर उसकी यह सेवा कर सके इस पर स्थायित्व लाने के लिए “पीपीपी” मॉडल पर चिन्हित सब्जी वालों को यह भूमि अगर रेलवे आवंटित करती है अथवा सब्जी मंडी के नाम पर इसे स्थायित्व देती है तो यह रेलवे की कल्याणकारी कार्यक्रमों का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता…? जहां सब चीज स्वच्छता और सुंदरता का प्रयोग क्यों नहीं हो सकता है प्रधानमंत्री के स्वच्छता पखवाड़ा जैसे कार्यक्रम यहां क्यों लागू नहीं होते..? क्या रेलवे के जो उच्च अधिकारी हैं वह मानसिक तौर पर गुलाम हो चुके हैं कि वह पूंजी पतियों के लिए ही ऐसा काम करेंगे अथवा सत्ता की गुलामी उनके डीएनए का हिस्सा हो गया है…? यह बड़ा प्रश्न है ।
और जितने भी यूनियन बने हैं रेलवे के उनके कर्तव्य है कि वह इन सब्जी कामगारों के लिए अथवा वहां पर रेहडी ठेला वालों के लिए स्थाई रूप से ऐसे बाजार जो रेलवे के कर्मचारियों के लिए आवश्यक है क्यों सुनिश्चित करने का काम नहीं होता है…? जिसमें रेलवे और वहां के स्थानीय आम नागरिकों का हित सुनिश्चित हो, समरसता का विकास हो और रेलवे की विश्वसनीयता इस बात पर निहाल हो की रेलवे हमारे लिए आम आदमी के जीवन के सरोकार के बारे में भी कुछ सोचता है अन्यथा पूरी देश की रेलवे की प्रॉपर्टी धीरे-धीरे षड्यंत्रकारी पूंजीपति रेलवे को बेच कर धनी होते चले जाएंगे। और यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही और गुंडागर्दी की पराकाष्ठा होगी ऐसा भी क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए…? इस संबंध में रेलवे यूनियन के अधिकारियों को हमने अप्रोच करने का काम किया किंतु अभी उनसे उनका पक्ष सामने नहीं आ रहा है जैसे उनका पक्ष आता है हम अवश्य रेलवे की सब्जी मंडी शहडोल के लिए लोकतांत्रिक नजरिया से देखने का प्रयास करेंगे।

