बिजौरी का बैगा-बच्चा बेच दिया गया दास-प्रथा में… बाप की गुहार (त्रिलोकी नाथ)

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सांख्यिकी आंकड़ों में यदि हम जानकारी लेने के लिए स्टैटिकल डिपार्टमेंट गये तो उन्होंने कहा हमारे पास बैगा समुदाय की वास्तविक आंकड़े नहीं है। शहडोल में देश की आजादी के बाद शायद पहली बार पी.आई.बी.( प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो) केंद्र सरकार की सूचना प्रसारण की संस्था है कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम किया। उसे वक्त कलेक्टर तरुण भटनागर और एसडीएम अरविंदसाह वहां पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम सिर्फ दो मुद्दों पर केंद्रित रखा गया एक तो लोक स्वास्थ्य यंत्र की जल संसाधन को लेकर और दूसरा आदिम जाति कल्याण विभाग में विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान के लेकर।जो भी अधिकारी शहडोल से इसमें अपनी प्रस्तुति दे रहे थे उसमें शहडोल संभाग की आदिवासी विभाग की उपयुक्त एक महिला थी और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी के कोई सब इंजीनियर। वहां पर इस औपचारिकता को पूरा करने के लिए आए थे क्योंकि उन्हें भी मालूम था कि यह सरकारी ड्रामा बाजी मात्र है ताकि फोटोग्राफी हो और पीआईबी के लोग अपना बिल निकाल सके।इस तरीके से बिना किसी तैयारी के आए थे कोई साहित्य संभाग स्तर के पत्रकारों को उपलब्ध नहीं कराया गया। क्योंकि उनके पास कोई साहित्य है ही नहीं…ऐसा क्यों नहीं समझना चाहिए..?

—————(त्रिलोकी नाथ)———————–

और अगर साहित्य नहीं है तो फोकस बाजी, ड्रामा बाजी, नाटक नौटंकी सरकारी अफसर में इस प्रकार प्रस्तुत किया जैसे गांव की नौटंकी में आकर कुछ चरित्र नायिकाएं वहां कमर हिला कर चली जाती है। इससे ज्यादा उसका कोई अर्थ नहीं था। कोई उसका साहित्यिक पक्ष नहीं होता, कोई कला पक्ष नहीं होता, कोई संगीत पक्ष नहीं होता… सिर्फ फूहड़ बाजी के।
यह इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कल ही शायद इन्हीं आंकड़ों की परिपक्वता के आधार पर यह घोषणा की है की शहडोल जिले में भी पाई जाने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा भरिया और सहरिया जनजाति समाज की एक बटालियन तैयार की जाएगी, उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा समाज की मुख्य धारा में आने के लिए इसकी तारीफ होनी ही चाहिए मुख्यमंत्री की सोच उत्कृष्ट है।
      किंतु उतनी ही जमीनी धरातल पर वास्तविकता निकृष्ट है शहडोल संभाग मुख्यालय से लगे गांव बिजौरी में कहते हैं इन्हीं आदिवासी बच्चों को बहलाफुसला कर अपहरण कर लिया जाता है और इसके बाद नागपुर की मंडी में आदिम जाति के युग की तरह गुलाम प्रथा के विकास के लिए बंधुआ मजदूर के रूप में बेच दिया जाता है। जिस 14 वर्ष के बच्चे शिवम बैगा को बंधुआ मजदूरी के लिए गायब कर दिया गया है। जिसके पिता बब्बू बैगा ने जब थाना सोहागपुर में शिकायत दर्ज करने गया तो उसे पुलिस थाना अधिकारियों ने दुत्कार दिया जैसे पशुओं को भगा दिया जाता है।
 शायद उनमें विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के लोगों में मनुष्य होने के चिन्ह नहीं देखे गए थे परिणाम स्वरूप पुलिस अधीक्षक के समक्ष यह शिकायत दर्ज कराई गई है यह आगे की बात है कि उसमें भारत की संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित अनुसूचित शहडोल का पुलिस और प्रशासन अपनी योग्यता दिखा पता है अथवा नहीं…?
लेकिन आजादी के इस तथाकथित अमृतकाल में भी मानव पशुओं की तरह चोरी करके बेचे जा रहे हैं। यह संयोग संभाग शहडोल मुख्यालय का कड़वा सच है कुछ लोग कहते हैं इस गांव के कुछ और बच्चे भी बंधुआ मजदूर बनाए गए हैं… हम भी कभी-कभी सुनते रहे हैं की बंधुआ मजदूरों को छुड़ाकर पुलिस और प्रशासन वापस लाई है… कोविड१९ के कार्यकाल में यह उपलब्धि शहडोल को ही हासिल है की जैसीनगर विधानसभा क्षेत्र की खन्नौदी क्षेत्र के मजदूर जब औरंगाबाद के रेलवे लाइन से अपनी सुरक्षा के चलते आ रहे थे और नींद लगने से पटरी में सो गए क्योंकि ट्रेन की आवाजाही बंद थी, उसमें करीब 11 मजदूर अचानक आई ट्रेन से कट गए। तब भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची मेंअनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र के इस परिवार की लाशों को सरकारी प्रोपेगेंडाना के तहत प्रचार और प्रसार और राज्य सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित जरूर किया। किंतु ना तो केंद्र सरकार की खजाने से और ना ही राज्य सरकार के खजाने से इन आदिवासी और अन्य मजदूरों कोई बडी राहत राशि नहीं दिया गया ।
भला हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कि उन्होंने शहडोल क्षेत्र की खनिज संपदा में संविधान के अनुसार संरक्षित खनिज मद की घोषणा कर दी थी। कहते हैं इसी विकास कार्यों के लिए कल्याणकारी मद मजदूरों के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए दे दिया गया। आज की स्थिति में उनके परिवार को यदि आंकड़ों में हम ढूंढना चाहे की बस्तुस्थिति क्या है तो शायद ही प्रशासन इस पर कुछ बता पाए।
यह इसलिए बताया जा रहा है की आजादी के अमृत काल के बाद भी इस क्षेत्र की विकास के नाम पर जो प्राकृतिक संसाधनों को खुली लूटपाट चल रही है उन्हें में से एक धनपुरी की कॉलोनी में अवैध काम करने वाले आदिवासी व अन्य वर्ग के मजदूरों की लाशें ऐसे निकल गई थी जैसे कोई खनिज पदार्थ निकल रहा हो । यह भी हमने पाया है।धनपुरी भी शहडोल संभाग मुख्यालय का हिस्सा है इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं की संभाग मुख्यालय से जुड़े विशेष पिछड़ी जनजाति के बैगा का परिवार को आज भी जिंदा रहने के लिए मजदूरी के लिए दास प्रथा की तरह खरीदा और भेजा जाता है । हो सकता है वह अपवाद हो…? लेकिन यह कड़वा सच है यही शहडोल के लिए चंद्रयान है और यही उसका मंगलयान भी है…
यहां से बैठकर पूंजीपति रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुकेश अंबानी अवैध रूप से सीबीएम गैस खदान चला कर गैस निकाल कर दुनिया के। शेयर बाजार में अपना दबदबा बनाते हैं… यहीं से उद्योगपति चंद्रकांत बिरला की ओपीएम पेपर में पिछले 50 साल से पूरे सोन नदी का पानी अकेली पी लेती है और फिर उसे प्रदूषण करके शहडोल वासियो को फेंक देती है।
पर्यावरण के अधिकारी इन उद्योगपतियों की जूठन में अपने परिवार को पलते हुए स्पष्ट देखे जा सकते हैं। इसलिए इस क्षेत्र की पर्यावरण परिश्चित की बुरी तरह से बर्बाद हो रही है भलाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शहडोल क्षेत्र से निकलने वाली नर्मदा नदी पर अपने गुजरात के विकास का गुणगान करते हैं किंतु जब नर्मदा और सोन नदी और अन्य नदी नाले तालाब ही यहां से नष्ट हो जाएंगे तब हो सकता है नरेंद्र मोदी भी जिंदा ना हो और हम-आप भी; किंतु उस पाप को आखिर हमारी अगली पीढ़ी किस रूप में भोगेगी..? यह सोचकर मन दहशत में आ जाता है।
क्योंकि ऐसी ही पिछड़ी जनजातियों और विशेष पिछड़ी जनजातियों से भरा शहडोल क्षेत्र बुरी तरह से पर्यावरण और परिस्थिति की का शिकार हो रहा है क्योंकि उनका विकास उनके अनुरूप नहीं हो रहा है इसीलिए विधायिका और कार्यपालिका लगे हाथ न्यायपालिका का भी यह दोगलापन प्रमाणित होकर आ रहा है की जिसके विकास के लिए सरकारें पाखंड रचती हैं वह आज भी हड़प्पा युग के दास प्रथा की तरह बेचे और खरीदे जाते हैं ।
संविधान में उनकी सुरक्षा के लिए नियुक्त पुलिस और प्रशासन स्वयं हुई संज्ञान नहीं लेता वह आदिम जाति विभाग के भ्रष्टाचार के धंधे में एक अपना भी गोता लगा लेता है इसीलिए विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समाज का बच्चा बंधुआ-मजदूरी के लिए बिक जाता है. जब तक बच्चा वापस नहीं आएगा तब तक यह हमारा केंद्र बिंदु प्राथमिकता के साथ मनोरंजन का साधन है…. इससे ज्यादा कुछ नहीं.. क्योंकि हमारी पत्रकारिता भी राजा हरिश्चंद्र की तरह ईमानदार नहीं.. ऐसा हमको स्वीकार करना चाहिए….. शायद गांधी का ग्राम-स्वराज होता तो बच्चे सुरक्षित होते हैं….. 


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