
“भारत के संविधान की 75 वर्ष की गौरवपूर्ण यात्रा..” संसद की शीत कालीन सत्र में उस वक्त दम तोड़ दी, जब नैतिकता की धरातल में 11 वर्ष सत्ता की ताज महल को जिस ढंग से सजा संवार कर रखा गया वह संसद में गृहमंत्री अमित शाह के भाषण में ताश के पत्तों की तरह सजे महल को 11 सेकंड में ढहा दिया; यह कहकर.कि “….अब यह फैशन हो गया है अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर ,अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता….”
————-(त्रिलोकीनाथ )—————
यह सत्ता का ही नशा था कि बजाय अमित शाह के इस अपमानजनक वक्तव्य जो संविधान निर्माण प्रमुख बाबा साहब अंबेडकर के बारे में जो अपशब्द बोले गए उस पर कोई माफी नाम आ जाता,..।स्वयं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहते हैं सात बार में ट्वीट करके अमित शाह की ओर से उन्हें संरक्षण देने वाला बचाव पूर्ण बयान किया। शायद ही अपनी राजनीतिक जीवनमें इतने कम समय में किसी एक विषय पर एक साथ धड़ाधड़ करके सात बार ट्वीट किया हो.. वह चाहते तो कह सकते थे कि “मैं आत्मा से अमित शाह को कभी माफ नहीं करूंगा..” और बात को यही समाप्त कर देते किंतु मेंटल-ऑर्डर कुछ ऐसा फॉलो हो रहा था की ताश के पत्ते से बने हुए 11 साल के आशियाना को 11 सेकंड में ही जल्द ही गिर जाने का डर उन्हें सता गया और वह उसे संभालने में लग गए।
स्वाभाविक है जिस हवा में उनका आभासी भवन खड़ा है वह उसी तर्ज में गिर जाएगा.. इसके लिए उन्हें संभालना जरूरी था ऐसा प्रतीत होता है इसलिए ऐसा ट्वीट उन्होंने धड़ाधड़ किया है। बात ट्वीट से नहीं बनी और राजनीतिक अवधारणा से मजबूत होकर के दूसरे दिन जब संसद में अंबेडकर जी की मूर्ति के सामने विपक्ष पुन: आया तो वह सब कुछ हो गया जिससे संविधान के 75 साल की गौरव यात्रा संसद की गलियारे में दम तोड़ती हुई नजर आई।, खुद सत्ता पक्ष के लोग विपक्षी नेताओं की तरह गैर कानूनी तरीके से लकड़ी के डंडे पर तख्ती लेकर के शायद विपक्ष के खिलाफ धरना दे रहे थे..।
हो सकता है यह एक नया प्रयोग हो । लेकिन शायद सत्ता पक्ष की मन्सा प्रोटेस्ट कर रहे विपक्ष के नेताओं के खिलाफ कुछ और थी, परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष आया उसमें भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूर्ण गौरवपूर्ण यात्रा वाले लोकतंत्र के विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर नागालैंड की भाजपा आदिवासी महिला सांसद कोन्याक द्वारा जो अभद्र आरोप लगाए गए, उससे आशा थी की 11 सेकंड का वीडियो अपनी मजबूती की पकड़ को ढीला कर देगा ।
जबकि विपक्ष के कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने प्रेस कांफ्रेंस करके कोन्याक पर ही हाथ फैलाकर सीना तान रास्ता रोकने का आरोप लगाया.. बहरहाल बात इससे भी नहीं बनती दिखी संसद के मकर दरवाजे में कहते हैं धक्का मुक्की हुई जिसमें उड़ीसा के सांसद सारंगी जी धड़ाम से गिर पड़े और उन्हें सर पर थोड़ा सा चोट लग गई, खून भी रिसने लगा…,।
गिरे तो कांग्रेस के वयो वृद्ध अध्यक्ष दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी थे.. क्योंकि उनकी भी उम्र बहुत संभल कर चलने वाली थी।
दोनों तरफ से शिकायतें हुई थाने में और सत्ता पक्ष की शिकायत में नॉन-बायोलॉजिकल ज्ञान के आधार पर तत्काल दिल्ली पुलिस ने गंभीर धाराओं हत्या के प्रयास तक के विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर एफआईआर दर्ज कर दी। जबकि पुलिस चाहती तो प्राथमिक रूप से वह सैकंडो में भारत के अत्याधुनिक संसद भवन में लगे सीसीटीवी कैमरे से संपूर्ण स्थिति को एक नजर देख लेती। इसके बाद कार्यवाही करती, तो बात कुछ और होती।
लेकिन वह भी शायद जल्दबाजी में थी या फिर दबाव था नॉन बायोलॉजिकल पुरुष ऊपर वाले का, क्योंकि जो बायोलॉजिकल नेता थे वह भी बड़े प्रभावशाली थे, उनकी तो एफआईआर भी दर्ज नहीं की गई…इससे तो यह प्रमाणित हो ही गया कि भारत के संविधान की 75 वर्ष की गौरवपूर्ण यात्रा थाने में मुंशी के सामने आकर दम तोड़ दी। कोई संविधान कोई कानून अब राहुल गांधी को नहीं बचा सकता… यह अहंकार भरी सोच ने अपना झंडा बुलंद किया।
ऐसा शहडोल जैसे आदिवासी क्षेत्रों में अक्सर होता है कोई बड़ी बात नहीं है… किंतु भारत के सर्वोच्च लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन में हो जाना थोड़ा सा चिंतित तो करता है… कि संविधान कहां से कहां पहुंच गया है।उसमें जो प्रेरणा की शक्ति थी वह कितनी निरर्थक साबित हो रही है। राजनीतिक धरातल पर इसकी क्या औकात है…
इसमें कोई शक नहीं कि लोकतंत्र के न्यायपालिका का स्तंभ फिर भी जिंदा है जहां संभावनाएं समान रूप से मरती दिखाई नहीं देती और कम से कम विपक्ष के नेता राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी के पास इतनी संपन्नता तो है ही कि वह महंगी ही सही न्याय प्रणाली के जरिए न्याय पा लेंगे.. वह चिंता की बात नहीं है….।
तो चिंता की बात क्या है…? यह बड़ा प्रश्न है. क्या फर्जी तौर से गढ़ी गई शिकायतें संसद से लगे थाने में देश का मॉडल बनेगी.. अथवा यह घटना यह प्रमाणित करेगी कि इसमें चाहे सत्ता पक्ष जीते या फिर विपक्ष, संसदीय संस्था को सर नीचा करके संस्थागत रूप में ध्वस्त होते देखना ही पड़ेगा.. उसकी जवाब देही लोकतंत्र के प्रति नपुंसक साबित होगी ही होगी।
क्योंकि कोई महिला आदिवासी सांसद कोन्याक अगर सही माने में झूठा ही सही प्रमाणित आरोप लगा रही हैं और उसे प्रमाणित किया जाता है तो अत्याधुनिक बने संसद भवन में क्या सीसीटीवी के कैमरे घास छील रहे थे…? और अगर सीसीटीवी कैमरा सामने आता है और प्रमाणित होता है की हां लीडर आप अपोजिशन राहुल गांधी ने सब कुछ वैसा ही किया है जैसा की महिला आदिवासी सांसद बोल रही हैं तो आदिवासी महिला शोषण का एक ऐतिहासिक मिल का पत्थर संसदीय द्वार पर स्वाभाविक रूप से हमेशा के लिए खड़ा मिलेगा। कि 75 साल बाद भी संसद के द्वार पर ही आदिवासी सांसदमहिला की सुरक्षा देने में हमारा संविधान फेल हो गया…?
उससे ज्यादा यह भी होगा की दो-दो बार आतंकवादी हमला झेलने वाली हमारी संसद भवन में तमाम सुरक्षा प्रणाली जो संसद में तैनात थी वह सिर्फ हिजड़ों की फौज थी जो ताली बजाने के मनोरंजन करने के अलावा कुछ नहीं करती…? अथवा सुरक्षा अधिकारियों ने उसका प्रोटोकॉल सुनिश्चित क्यों नहीं किया इसके लिए किस-किस अधिकारी को दंडित किया गया…? यह प्रश्न भी खड़े होंगे।
और अगर यह सीसीटीवी कैमरा बता पाने में सफल हो जाता है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया तो देश में विशेष कर महिला सांसद अगर वह आदिवासी है तो सिर्फ राजनीति की खिलौना मात्र हैं उनकी कोई उपयोगिता भारत के संविधान के जरिए प्राप्त आरक्षण ने उन्हें योग्य बनाने में सहयोग नहीं किया.. जिस कारण वह “उपयोग करो और फेंक दो”के तर्ज पर सिर्फ एक कठपुतलीसामग्री बनकर रह गई हैं..? जो अपने आप में बेहद आश्चर्यजनक प्रमाण पत्र होगा।
ठीक इसी प्रकार धक्का मुक्की के पुलिस प्रकरण में भी पूरा दारोमदार संसद भवन की सर्वोच्च सुरक्षा प्रणाली सीसीटीवी के कमरे में रिकॉर्ड घटनाक्रम बयां करेंगे..? अगर वह रिकॉर्ड सुरक्षित जिंदा रहा तो यदि उसे वक्त किसी कारण से सीसीटीवी की चूहे ने तार काट ली या फिर कोई तांत्रिक गड़बड़ी से सीसीटीवी कैमरे जो मकर द्वारा में लगे थे उन्होंने रिकॉर्ड करने में असमर्थ हो गए हो… तब तो घटिया राजनीति ही सही इस देश में संभावनाओं के कुछ कदम और चल सकेंगे.. अन्यथा सब कुछ पारदर्शी है और इस पारदर्शी पतित व्यवस्था में हमें सबको जीना सीख लेना चाहिए…। यह भी प्रमाणित होगा।
2024 के शीतकालीन सत्र का वह महत्वपूर्ण 11 सेकंड का वीडियो जो बाबा साहब अंबेडकर को अपमानित कर रहा था.. अदाणी मामले पर हावी हो रहा है… इससे शायद अदानी के घूसखोरी कांड को राहत मिल जाए.. किंतु विपक्ष के नेता राहुल गांधी शायद ही माने कि, अदानी का भ्रष्टाचार इतना छोटा है कि अंबेडकर का अपमान उसे छिपा लेगा…. बहरहाल इस घटनाक्रम से और इसके निष्कर्ष से यह भी साबित होगा कि अडानी का भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है या अंबेडकर का अपमान बड़ा मुद्दा है…? या फिर दोनों ही मुद्दे बेहद बड़े हैं..? इससे यह भी साबित होगा की 11 वर्ष की सत्ता में आखिर इतनी मजबूती क्यों नहीं आई की 11 सेकंड में ही वह अपने को ढहता देख रही थी..?
इससे यह भी सिद्ध होगा कि वास्तव में हमारा संविधान बड़ा है या फिर सत्ता में बने रहने का विधान बड़ा है.. जिसके लिए देश की आजादी को बनाए रखने का संविधान को बलिदान किया जा सकता है…?यह कोई बड़ी बात नहीं है किंतु हमारे जो भी दोषी पाए गए पतित माननीय नेता यह भूल गए समय चक्र जब भी अपना रिजल्ट देगा उसमे भारतीय संसद और संसदीय वर्तमान नेताओं की जवाब देही हमेशा कलंकित होती दिखेगी… इसमें कोई शक नहीं है।इसीलिए कहा गया “होईहैं है वही जो राम रचि राखा… “शायद बहुत कुछ अंबेडकर के अपमान में सुलग रहा है… अगर इसे समय से नहीं बुझा दिया गया तो…? क्योंकि अगर आप बिरसा मुंडा को भगवान बना सकते हैं तो अमित शाह अंबेडकर को भगवान के रूप में क्यों नहीं देखते…? जिन्होंने लाखों करोड़ों लोगों के जीवन को परिवर्तन करने वाली संभावनाओं को संजीवनी का काम किया है.. आखिर जीवन दाता भी भगवान ही तो होता है..
वैसे भी आध्यात्म की दुनिया में कहा ही गया है “ईश्वर अंश जीव अविनाशी……”तो कोई भी मनुष्य अपने को ईश्वर क्यों नहीं बना सकता… अगर वह उसका अंश है तो..?तो अंबेडकर में भगवान बनने की क्षमता है तो आपको तकलीफ क्या है..? उनका अपमान क्यों किया जाना चाहिए.., मजाक क्यों उड़ाया जाना चाहिए..? हमारे यहां तो कण-कण में भगवान है। अगर सात जन्मों का स्वर्ग अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर बोलने से मिलने का आभास होता है तो अंबेडकर का नाम क्यों नहीं लिया जाना चाहिए… यह भी बड़ा प्रश्न है…?
(फोटो साभार- दैनिक भास्कर)

