
“शहडोल में क्षेत्रीय उद्योग सम्मेलन 2025″अपने स्वरूप में 16 जनवरी को होना सुनिश्चित हो गया है।उसकी तैयारी भी जोर-जोर से भोपाल स्तर पर चल रही है।
अंग्रेजी में इसे “रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव” कहा जाता है। शहडोल क्षेत्र संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित विशेष आदिवासी क्षेत्र है। कोई शक नहीं कि वह “रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव” शब्द से नहीं समझ पाएगा की शहडोल में क्या हो रहा है… पता नहीं इस इवेंट को क्रिएट करने वाले लोगों ने क्यों इसे अंग्रेजी में संबोधित संज्ञा में बोलते हैं…? अगर हिंदी में बोलते तो शायद शहडोल क्षेत्र के आसपास रहने वाले लाखों लोग इस भाषा को समझ पाते कि जैसे उनके अपने लिए कुछ सरकार करने जा रही है।
क्योंकि यह “रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव” है इसलिए इसे समझने की आम आदमियों को जरूरत भी नहीं है। शायद इसी समझ से शहडोल क्षेत्र के तीन जिला अनूपपुर शहडोल और उमरिया के आदिवासी क्षेत्र के निवासियों को विशेष कर इस पर अपने विचार आहूत करने की जरूरत नहीं समझी गई। क्योंकि अगर इतने ही औद्योगिक समझ के लोग स्थानीय नागरिक होते विशेष कर आदिवासी होते तो पिछले 75 साल में यह क्षेत्र 10% ही सही विकास कर गया होता।
उद्योग के सपने शहडोल को दिखाकर के शहडोल क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का दोहन करना कोई नई बात नहीं है, यही काम पहले विदेश से आकर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था इसलिए उसने भी अंग्रेजी को ही अपने विकास अपनी मूल भाषा बन कर रखा। शायद इस समझ से यह समझ विकसित की गई है।
इसलिए इस “क्षेत्रीय उद्योग सम्मेलन” को आम आदमियों के हित से दूर राजस्व वसूली बढ़ाने का जरिया बनाकर निवेशकों को बुलाया जा रहा है। ताकि उनकी सुविधा अनुसार, उनकी सुविधा के लिए, तमाम प्रकार के कानूनी राहत दी जाए… इसी सोच ने 1965 के आसपास सोन नदी के पास ओरिएंट पेपर मिल्स की स्थापना की थी। इस उद्योग ने देश की प्रगति में कितनी भूमिका अदा की इसके आंकड़े स्थानीय लोगों को देने की भी जरूरत नहीं है। क्योंकि वह इसे समझ नहीं पाते। किंतु इतना तय है की भारी राजस्व चोरी के रास्ते निकालने के अलावा पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए ओरिएंट पेपर में आज भी आदिवासी विशेष क्षेत्र में एक बड़ा अभिशाप है। इसमें कोई सफाई देने की भी जरूरत नहीं है। क्योंकि वह हमारे क्षेत्र का गौरव है हम गर्व से कह सकते हैं कि हम इसी विकास को आगे बढ़ा रहे हैं। रही बात सोन नदी के पानी का स्थानिय कृषि में उपयोग करने के लिए तो जब सोन नदी का पूरा पानी ही एक सीजन में ओरिएंट पेपर मिल ले लेती थी तो आसपास की कृषि को यह बलिदान में खत्म हो जाने के लिए करना ही था।
सोन नदी का पानी कृषि उपयोगिता में लगभग सुन्य रहा। अन्य कारण तो होते ही रहे हैं जो अनगिनत हैं। और जिस पानी का उपयोग ओपीएम करती रही। आज तक उसका बकाया भुगतान कहते हैं 100 करोड रुपए के करीब बाकी है..वसूल नहीं गया बल्कि उसे यह छूट कैसे दी जाए इसके रास्ते निकल जा रहे हैं जो आम आदमियों के लिए कभी भी तय नहीं होते शहडोल नगर पालिका में ही मुक्त में मिलने वाला पानी कीमती हो गया है….
यह रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव करने के पहले की परंपरा रही है।फिर जब नया सपना नई सरकारों ने देखा उन्होंने भी यही लालच रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को लाते वक्त दिखाया था बाबूलाल गौर उद्योग मंत्री थे औद्योगिक क्षेत्र शहडोल में प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि 90% लोगों को इसमें रोजगार मिलेगा। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड जो सीवीएम गैस निकल रही है कितने स्थानीय आदिवासी क्षेत्र के आदिवासी गैर आदिवासी लोगों को रोजगार दी है.. इसके आंकड़े आज तक सामने नहीं आए हैं… वह देने की जरूरत भी नहीं समझती है । क्योंकि राज्य का जिला सांख्यिकी विभाग अब अपनी आंकड़ों की विश्वसनीय के लिए कुछ प्रस्तुत भी नहीं कर पा रहा है। शायद उन्हें आकड़े मिल भी नहीं रहे हैं। इसलिए वह दे क्या..?
बहरहाल रिलायंस इंडस्ट्रीज 2009 में चालू हुई ,कहते हैं 2029 तक इसकी लीज की अवधि है। वह यहां सपनों का संसार का लालच दिखा कर आई थी और हालात इस पूंजीवादी आर्थिक साम्राज्यवाद के इतने खतरनाक हो गए कि उसने मध्य प्रदेश शासन को ही आंखे दिखाने लगी । नियमों के अनुसार मिलने वाले राजस्व को न देने का बहाना ढूंढने लगी। दिल्ली मुंबई में बैठे उनके लोग इस कदर सफल है कि शहडोल प्रक्षेत्र के हित में राज्य शासन के नियमों के अनुसार खनिज अनुबंध भी आज तक नहीं किया है। जिसमें लाखों करोड़ों रुपए स्टॉप ड्यूटी के तो दबा कर रखे ही हैं.. साथ में शहडोल क्षेत्र के आदिवासी और गैर आदिवासी निवासियों की सुरक्षा जो उसे अनुबंध में निहित होती है उससे भी वह मुक्त है।
शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र को पूरी तरह से मिनी-इंडिया बनाकर के कच्चा माल निकलने का माध्यम बना दिया गया है.. प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन शहडोल में लगाने की शर्त पर कोई आता ही नहीं है। बिजली को छोड़ दे तो क्योंकि वह तो मजबूरी है ।
क्या कोयले से, क्या वन संपदा से, लघु बनोपज से, क्या सीबीएम गैस से, क्या आयरन ओर से अथवा बॉक्साइट से या अन्य प्राकृतिक संपदाओं से इंडस्ट्रियल हब शहडोल को नहीं बनाया जा सकता..?
बनाया जा सकता था किंतु सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। हालात इस कदर खराब रहे कि पेपर इंडस्ट्री को छोड़ दें तो एक भी उत्पादन योग्य इंडस्ट्री आम आदमियों को रोजगार परक आइडियल उद्योग स्थापित नहीं किया जा सका है । आदिवासी विशेष क्षेत्र को शोषण और दमन का अड्डा बना दिया गया है। अन्यथा जड़ी बूटी का विशाल भंडार शहडोल में अलग-अलग क्षेत्र में पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अनुरूप बरकरार है… सीबीएम गैस संभावनाओं को जोड़ा जा सकता था.. यह तो मजबूरी थी की पावर जेनरेशन यूनिट बिजली कारखाना यही लगाना था क्योंकि सस्ता पड़ता था अन्यथा एक भी बिजली कारखाना शहडोल में नहीं लगता। वह भी सीबीएम गैस की तरह एक्सपोर्ट होकर के आसपास के क्षेत्र में शोभा बढ़ा रहा होता। इसलिए भी आम आदमियों को “क्षेत्रीय उद्योग सम्मेलन” से क्या फायदा होने वाला है…? बताने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि वास्तव में उन्हें कोई फायदा होने वाला नहीं है। अगर नाम मात्र का फायदा होने वाला है तो उससे ज्यादा शोषण होने वाला है। और इसलिए भी ना तो ग्राम सभाओं से, ना ही जिला पंचायत से और ही स्थानीय अत्यधिक पिछड़े हो गए स्थानीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से समाचार माध्यमों से इस पर चर्चा की जरूरत समझी गई है… ऐसा प्रतीत होता है।
अन्यथा फीडबैक लेकर के पहले से यह तैयारी की जाती की आखिर कौन से उद्योग ऐसे हैं जिसे स्थानीय लोगों को उसमें रोजगार सुनिश्चित हो सके। उसे पर कार्यवाही की जा सकती थी… पंचायत में और जिला पंचायत में विचार आहूत किया जा सकते थे… तब यही काम होता तो ऐसे रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव से कुछ कंक्लुजन निकलता… प्राथमिकताएं होती.. किंतु शायद प्राथमिकताएं सुनिश्चित हैं..? इसलिए इस इंडस्ट्रियल कांक्लेव को सीमित दायरे में सिर्फ उनके फायदे के लिए सुनिश्चित किया जा रहा है। ऐसा भी प्रतीत होता है बेहतर होता कि ऐसे बेहतरीन अवसर जब राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार के प्रोत्साहन में कार्यक्रम तय किए जाते हैं उसमें आम आदमियों का हित सर्वाधिक प्राथमिकता में सुनिश्चित कियाजाए.. तभी ऐसे रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव भारतीय लोकतंत्र विशेष कर संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र के हित में कारगर साबित होंगे। अन्यथा अभी तक जो उद्योगपति शोषण और दमन का जरिया बने हुए हैं राजस्व चोरी अथवा असुरक्षा के लिए इस क्षेत्र में अभिशाप सिद्ध हो रहे वही हमारे वरदान बन गए होते.. सरकार का इतना बड़ा कार्यपालिका का अमला आखिर इस लोकतांत्रिक हित में “रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव” को आदिवासी विशेष क्षेत्र में मॉडल के रूप में विकसित क्यों नहीं कर पा रहा है…? आदिवासी विशेष क्षेत्र में उद्योगों की उपयोगिता पर यह महत्व मिल का पत्थर साबित हो सकता था.. यह भी बड़ी चिंता की बात है। सब जानते हैं कि जिस प्रकार से हजारों लाखों साल से शहडोल क्षेत्र में उपलब्ध मेंकल विंध्य पर्वत श्रेणी में जड़ी बूटियां विकास के नाम पर बिना चिन्हित हुए ही विलुप्त नष्ट हो गई क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं… इस पर भी विचार किया जाना चाहिए. रही बात राजस्व की,तो पिछला राजस्व ही यहां स्थापित उद्योगपतियों से ईमानदारी से यदि वसूला जाए तो शायद सैकड़ो हजारों करोड़ों रुपए उन्हीं से ही प्राप्त हो सकता है। देखना होगा की कांक्लेव किसके लिए हो रहा है.. क्योंकि आदिवासी विशेष क्षेत्र में निवास रत में सब आदिवासी हैं.. और आदिवासियों का शोषण हजारों साल की परंपरा का अनुगमन होता है। राष्ट्रीय मुख्य धारा में लाने की जो सोच संविधान की पांचवी अनुसूची के जरिए सुनिश्चित की गई है क्या उसे मंसा को यह “रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव” सुरक्षित व सुनिश्चित तरीके से धरातल में ला पाएगा इस पर भी आम आदमी की नजर होगी। एक आदिवासी क्षेत्र का पत्रकार होने के नाते हमारी यही पिछड़े सोच है…. जैसे कभी केंद्रीय मंत्री रहे दलवीर सिंह सोचा करते थे की अमरकंटक में पेंड्रा रोड से अमरकंटक तक रोपवे के जरिए पर्यटन का मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा केंद्र बनाया जाए…? उम्मीद करना चाहिए 2024 में ही आदिवासी विशेष क्षेत्र में उद्योग के जरिए शोषण और दमन को नष्ट करके एक नए सूरज की रोशनी के सहारे आदिवासी क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्य धारा में विशेष कर आदिवासी जनजाति के लोगों को औद्योगिक समूह में जोड़कर के सपनों का सुनहरा संसार रचा बुना जाए.. .( त्रिलोकीनाथ ).

