बंद खदानों में पति-पत्नी लाशें सिर्फ; माफिया परम्परा का निर्वहन…( त्रिलोकीनाथ )

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धनपुरी में बंद खदानों में से कुछ युवाओं की लाशें ऐसे निकली जैसे खदान से पत्थर ही नहीं लाशें भी निकलती हैं तब तब साथ लाशें निकालने का जिक्र आया था आदिवासी विशेष क्षेत्र कानून संविधान में संरक्षित होने के कारण शहडोल पांचवी अनुसूची का अनुसूचित क्षेत्र है यानी कानून की विशेष कृपा यहां के नागरिकों को सुरक्षा देता है किंतु शासन और प्रशासन की मनसा नागरिकों को सुरक्षा देने की नहीं है यही कारण है कि पिछले दिनों इसी धनपुरी क्षेत्र में एक पति पत्नी नये सिरे से ऐसी ही एक कोयला खदान में जिंदा दफन हो गए हल्ला हो गया तो पता चल गया यानि पिछली घटनाओं से कुछ नहीं सीखा गया।
  20 महीना से आदिवासी विशेष क्षेत्र पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर सांप्रदायिकता की आग में मानवीय संबंधों को जला रहा था। औरतों को निर्वस्त्र करके जुलूस बनाकर जश्न मनाया जा रहा था सत्ता को इस्तीफा देने में 20 महीने लग गए अब राज्यपाल की सरकार यानी राष्ट्रपति शासन लागू है तो इतने दिनों बाद राष्ट्रपति उसे क्षेत्र के आदिवासियों से गिड़गिड़ाते हुए नजर आ रहे हैं कि वह शांति प्रियता के नाते जो हथियार पुलिस थानों से लूटे थे उसे वापस कर दें यानी राष्ट्रपति शासन की भी यह ताकत नहीं है कि वह अपने शासन से नागरिकों को नियंत्रित करके लूट गए हथियार हासिल कर सके इसलिए वह आदिवासी नागरिकों से भीख मांगती नजर आ रही है यह भी प्रशासन का एक तरीका है।
   तो प्रशासन इस समय अमेरिका के ट्रंप का तड़ातड़ तरीके से भारत को ब्लैकमेल करने पर उतारू है बिना कोई लोक लिहाज किया एक बेहतरीन पूंजीपति की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर आक्रामक है वह छुपे हुए पत्तों को जमकर खेल रहे हैं कभी अवैध प्रवासियों को जिसमें पुरुष महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं हथकड़ी और बेड़ी डालकर अपने हवाई जहाज से कचरे की तरह भारत में फेंक रहे हैं तो कभी यह बात कर कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा अपने नागरिकों से टैक्स वसूलत है इसलिए उसे अमेरिकी डॉलर यानी रुपया की मदद क्योंकि जाए और वह भी वह करोड़ अरबो रुपया कहां देता है यह बताना नहीं चूकता वह अपनी बात यह कहकर दर्शा रहा है है कि भारत के लोकतंत्र की जो औकात है चुनाव आयोग उसको रुपया दिया जाता था और वह हमारी हस्तक्षेप से भारत में चुनाव करता था। यह सार्वजनिक रूप से बताने की जरूरत क्यों आन पड़ी भारतीय नागरिकों को अपमानित तरीके से हवाई जहाज में कचरे की तरफ फेंकने की जरूरत क्यों आन पड़ी…?
इसके अलावा वह यह भी दर्शाने में नहीं चूकता कि कुछ राष्ट्रों ने जो संगठन ब्रिक्स बनाया है उसे पर भारत भी शामिल है ऐसे किसी संगठन को मैं नहीं मानता। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार भी इसका सक्षम प्रतिवाद नहीं किया।इसके पहले भारत के “राष्ट्रीय उद्योगपति” के रूप में स्थापित हो चुके गौतम अडानी के उसे पूंजीवादी व्यवस्था को भी अपने न्यायालय में सार्वजनिक करता है कि बिना हमारी सहमति के भारत में 2200 करोड रुपए का घूंस रिश्वत भारतीय अधिकारियों यह अन्य जगह दे करके हमारी पूंजीवादी व्यवस्था को नुकसान क्यों पहुंचाया गया…?
हालांकि तमाम प्रकार से अपमान करते हुए दनादन पूंजीवादी भाषा का मिसाइल डालने वाले अमेरिकी लोकतंत्र का राष्ट्रपति यह भी रह देता है कि भारत के राष्ट्रीय उद्योगपति को न्यायालय में राहत दी जा सकती है यानी कुछ कानून पर रोक लगाने का भी काम किया। किंतु इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा में यह खबर की एफ 35 सेना के विमानों जीने का ए दृष्टिकोण से अमेरिका में ही आलोचना का शिकार होना पड़ा भारत को बेचने का या कहना चाहिए भारत पर दबाव बनाकर के उसे कबाड़ को ऊंची कीमत में खरीदने का समझौता भी चर्चा में आया है।
अब सवाल यह है कि भारत ऐसे सैनिक विमान को जो कबाड़ के रूप में अमेरिका में पड़े हैं क्या भारत की सैन्य क्षमता में मरम्मत के लिए और परेशान होने के लिए वह विमान को खरीदेगा..? यह सब बहुत बड़ी-बड़ी बातें हैं जिससे हम आदिवासी क्षेत्र के निवासियों को सोने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमारी समझ से कुछ हद तक करिए बाहर की भी बातें हैं फिर भीपूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी पतियों के लाभ के लिए शासन व प्रशासन में बैठे हुए कैसे अपने पद का उपयोग करते हैं किस प्रकार से समझौते या सौदे होते हैं समान रूप से यह समझ में आने का हम प्रयास करते हैं।
शहडोल में भी अब बड़े पूंजीपति आ चुके हैं कुछ तो राष्ट्रीय स्तर के भी हैं उनके लिए कोई कानून क्यों लागू होना चाहिए जब अमेरिका के पूंजी पत्तियों के लिए भारतीय लोकतंत्र के नागरिक और यहां का कानून सिर्फ एक मजाक है। तो क्या अमेरिका का पूंजीपति समाज पारदर्शी तरीके से भारतीय लोकतंत्र को ब्लैकमेल कर रहा है कि हमारा कबाड़ खरीदिए..?
लेकिन हम भी तो कथित तौर पर 20000 डॉलर की रुपए की हीरा पूर्व राष्ट्रपति बायडन को गिफ्ट में देकर आ जाते हैं गिफ्ट आदमी तभी देता है या तो संबंध अच्छे हो या फिर हमारा कोई का काम हमारी कोई फाइल किसी अवसर के पास फंसी हो कम से कम महंगा गिफ्ट तो तभी दिया जाता है और उसके बदले हमें तमाम प्रकार की छूट या राहत मिलती है। हमारे जैसे आदिवासी क्षेत्र के आम नागरिकों को भला कोई गिफ्ट क्यों देगा..?
शहडोल में पूंजीपति ओरिएंट पेपर मिल को पिछडे क्षेत्र के उत्थान के लिए शहडोल का पूरा सोन नदी का पानी पीने की छूट दी गई थी। अब अगर उनके प्रिय मित्र मुकेश अंबानी की सीबीएम गैस निकलने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज को को सैकड़ो करोड़ रूपए राजसव भुगतान न करने की छूट दी जाती है तो यह सब का विकास की श्रेणी में क्यों नहीं आता तब कांग्रेस पार्टी ने ऐसा किया था अब भाजपा ऐसा कर रही है। पिछले दिनों शहडोल में भी रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव हुआ उद्योगपतियों को शहडोल की जमीन से उद्योग लगाने की विनती की गई हफ्ते भर बात मध्यप्रदेश के भोपाल में इसी विनती को अन्य जिलों में भीप्रदेश स्तर पर अंतिम रूप दिया जाएगा। पूंजीपतियों को पैसा लगाने की शर्त प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट का छूट भी दिया जा सकता है जैसा कि शहडोल में प्रमाणित होता रहा है अब यह है कि अमेरिका के न्यायालय में राष्ट्रीय उद्योगपति की तरह दिखने वाले गौतम अडानी को उनके कारोबारी पैसे में भारतीय नागरिकों को अरबो रुपए घूस देने के नाम पर छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि वहां का कानून पूंजीपतियों के इस प्रकार के घाटे की अनुमति नहीं देता इसलिए पारदर्शी तरीके से अदानी अपराध के आरोपी बनाकर न्यायालय में खड़े हो जाते हैं भारत के आदिवासी क्षेत्र में यह सब पारदर्शी नहीं है प्रतीत तो यह भी होता है कि भारत में ही घूंस के मामले में ऐसी पारदर्शिता अपराध की श्रेणी में खड़ी भी की जा सकती है अथवा नहीं यह हमारे लोकतंत्र के नेताओं की रहस्यमयी सोच से प्रमाणित होती है।
और इसी रहस्य की दुनिया में आदिवासी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों में राजस्व उपार्जन की हत्या की जाती है अब तक तो यह प्रमाणित होता आया है इसलिए अमेरिका जो पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित राष्ट्र है अपने लाभ के लिए भारत को 20000 डॉलर के करोड़ अरबो रुपए के हीरे के गिफ्ट पर विश्वास नहीं करता बल्कि वह पारदर्शी तरीके से दुनिया में हथकड़ी डालकर भारतीय नागरिकों को अपमानित करता है तो कभी सार्वजनिक रूप से यह बताता है कि भारत की तथाकथित स्वतंत्र निष्पक्ष दिखने वाले निर्वाचन आयोग को वह पैसा देकर अपने तरीके से प्रभावित करता है और नेताओं को निर्वस्त्र करके अपमानित करने की उसकी पुरानी परंपरा रही है ताकि गुलामी की तरह अपमानित होकर पूंजी पतियों का सम्मान करना भारतीय लोग या भारतीय लोकतंत्र स्वीकार करता रहे उसी का छोटा रूप आदिवासी क्षेत्र शहडोल में अथवा मणिपुर राज्य में हमें देखने को मिलता है और कोई नई बात नहीं है शहडोल की कोयल की अवैध खदानों मेला से निकलते ही रहेगी जैसे धर्म के धुंध में प्रयागराज के कुंभ में ज्ञात और अज्ञात लाशों का अंबार निकलता ही रहेगा जैसे भारत की राजधानी दिल्ली में सर्वोच्च सुरक्षित नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में भगदड़ में लाशे निकलते ही रहेगी सब पारदर्शी है…

अमेरिका की बयान बाजी की तरह बस पहले “गंगा ने मुझे बुलाया है..”का धंधा फलता फूलता रहा अब 11 साल बाद इस बार यमुना का प्रदूषण और उसकी पूजा हमारी प्राथमिकता से धुंध के धंधे को बनाए रखने की होती है अच्छी बात यह है कि इस बार “यमुना प्रदूषण” ने दिल्ली की लोकतंत्र सत्ता में आने का शर्त बना। और नदी समाज लोकतंत्र में चुनाव की प्राथमिकता के रूप में चर्चित हुआ यह अलग बात है की बिंध्य और मैंकल पर्वत श्रेणी आदिवासी क्षेत्र से निकलने वाली नर्मदा सोन नदी या जिला नदी अथवा अन्य छोटी बड़ी नदियों को प्रदूषण की समस्या बनने का अवसर मिलता है अथवा नहीं या फिर इन नदियों के मर जाने जैसे शहडोल नगर के मुड़ना नदी के मर जाने का मुद्दा चुनाव की मुद्दा बनता है या नहीं क्योंकि फिलहाल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की शहडोल की नदी और तालाब की हत्या करके आप कितना विकास कर पाते हैं क्योंकि शासन और प्रशासन कि यह कोई प्राथमिकता नहीं है फिलहाल शहडोल नगर का पानी नल में नहीं आ रहा है क्योंकि सरफा कानाला जो कॉलोनी खदान के पानी पर जिंदा है वहां सिस्टम फेल हो गया है… आने वाले गर्मी में यह सिस्टम फेल ही होता रहेगा, इसलिए इसकी आदत डाल लेनी चाहिए

आगामी 25 फरवरी को जब प्रदेश में उद्योगपति इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों के विनाश की शर्त पर विकास करेंगे तो यह अमेरिका के तर्ज पर अपने लाभ के लिए पूंजीवादी व्यवस्था का विकास ही होगा इसमें कोई शक नहीं वर्तमान में यही लोकतंत्र है क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष में नेतृत्व क्षमता पूंजीवादी व्यवस्था के इर्द-गिर्द इस तरह मंडरा रही है जैसे खदान से निकलने वाली लाशों पर सिर्फ चर्चा होती है निराकरण नहीं जैसे क्योंकि आम नागरिक में यह सोचने की नसबंदी हो चुकी है भलाई भारत की आदिवासी वर्ग से आने वाली राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू स्वयं शहडोल आकर के यह बताती हूं कि आप आदिवासी विशेष क्षेत्र के भारतीय संविधान के पांचवी अनुसूची के अनुसूचित निवासी हैं आपको विशेष अधिकार है कि आप अपने मानवीय अधिकारों के प्रति प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कानूनी तौर पर सुरक्षित और संरक्षित हैं आपको कोई पूंजीवादी प्रताड़ित नहीं कर सकता किंतु जब नागरिक ही वैचारिक रूप से नपुंसक हो जाए तो नदी भी खत्म होगी तालाब भी खत्म होंगे और शोषण का साम्राज्य खदानों में से लाशों के रूप में आप चर्चा के विषय बने रहेंगे आप लाश ना बने इसका संविधान ने कोई गारंटी नहीं दी है यही कड़वी सच्चाई है और कोई बात नहीं… जल्द ही भारत अमेरिका के कबाड़ को महंगे में खरीद लेगा तो आप नागरिकता के नाम पर सिर्फ एक कबाड़ ही है ऐसा सोचने पर आपको गर्व क्यों नहीं होना चाहिए…? सोचिए शायद जमीर जिंदा हो जाए…? और कोई बात नहीं….


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