
मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी जो भविष्य में डॉक्टर बनने वाले हैं उन्होंने शोषित ग्रामीणआदिवासियों की तरह भीड़ इकट्ठी कर ली और डीन के कार्यालय में जाकर मांग कर रहे थे कि उन्हें पानी के कारण पानी का संकट है अब पिछले चार-पांच साल से वहां पर विद्यार्थी पानी के लिए इस तरह परेशान है और अपनी व्यवस्था से काम कर रहे हैं जैसे भविष्य में होने वाली एक-एक बूंद के लिए परेशान किरण टॉकीज के पास के आम आदमी परेशान है। यह अलग बात है की सभी विद्यार्थी संपन्न परिवार के होंगे अन्यथा आरक्षित श्रेणी के होंगे तो उन्हें पैसा आता होगा और वह बाहर से पानी का इंतजाम कर लेते होंगे। लेकिन उतनी तकलीफ नहीं है जितनी किरण टॉकीज के आसपास के लोगों को जल स्रोत के नष्ट हो जाने से पानी की समस्या की जागरूकता का क्रमिक धरना आंदोलन करने जैसे हालात हो।
. (त्रिलोकी नाथ)
मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी जो भविष्य में डॉक्टर बनने वाले हैं उन्होंने शोषित ग्रामीणआदिवासियों की तरह भीड़ इकट्ठी कर ली और डीन के कार्यालय में जाकर मांग कर रहे थे कि उन्हें पानी के कारण पानी का संकट है। मेडिकल कॉलेज नया-नया बना है इसमें बहुत सारी चीज अभी नहीं है। कुछ डॉक्टर हैं बहुत कुछ विद्यार्थी हैं। शुरू-शुरू में खाने-पीने की समस्या रही धीरे-धीरे सब ठीक हो रही है। पानी की समस्या शुरू से ही बरकरार रही जो डॉक्टर के लिए अगर है तो मरीजों के लिए भी होगी ही होगी.. उसमें कोई शक नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि विद्यार्थी डॉक्टर के लिए पानी का संकट हो और मरीज भरपूर पानी पा रहे हो, जैसे विद्यार्थी अपना जुगाड़ लगा लेते हैं और शोषण बर्दाश्त कर पानी को होने का महसूस करते होंगे वैसे ही मरीज भी थोड़ा सा ज्यादा महसूस करते होंगे.. चिंता की बहुत बात नहीं है।
क्योंकि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव पहले जब शहडोल आए थे तो उन्होंने कहा था बाणसागर का पानी शहडोल में लाकर वह देंगे, तो इंतजार करना चाहिए जब बाणसागर का पानी आएगा तो शहडोल में लबालब पानी भर जाएगा और शहडोल की आम जनता को होने वाली पानी के भविष्य के संकट से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसा आशा करने में कोई समस्या नहीं है, जैसे पाकिस्तान और उनके आतंकवादियों पर कैसे हमला करके पहलगाम में 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या का बदला कैसे लिया जाए इस पर हाई लेवल मीटिंग पर निष्कर्ष दिखने में नहीं आया… अंदर निश्चित रूप तौर पर हो चुका होगा। तो बदले का हमला कब होगा कैसे होगा वह भगवान भरोसे है.. लेकिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में जो हाई लेवल की बैठक हुई उसमें यह निकल कर आ गया कि जब कभी भारत में जनगणना होगी उसमें लंबी समय से चली आए राजनीतिक समस्या जातिगत जनगणना का समाधान उसमें किया जाएगा। पिछले 5 साल से होने वाली जनगणना फिलहाल तो इस वर्ष भी नहीं होनी है। यह तय है इस वर्ष को खत्म होने में 9 महीने लग जाएंगे।इसी प्रकार से शहडोल में शहडोल से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर स्थापित बाणसागर बांध का पानी आएगा तब निश्चित तौर पर पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा।हो सकता है मेडिकल कॉलेज के बुद्धिमान आयातित पदस्थ डीन महोदय मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव की उस भाषण से प्रेरित हो जिसमें बाणसागर से पानी आने पर मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों को पानी मिलाने की गारंटी हो जाएगी ऐसे आदेश को पानी मिलने की गारंटी के आदेश में शामिल किया जाएगा ।इसमें कोई शक नहीं है।
अब समस्या यह है की भरपूर पानी से लबालब रहने वाला शहडोल क्षेत्र का पानी आखिर गया…? कहां लबालब पानी से ओत-प्रोत और भरपूर जल स्रोत रहने वाला शहडोल बूंद बूंद पानी के लिए परेशान क्यों है…? बावजूद इसके की साल 20 साल मध्य प्रदेश की रामराज की सरकार जल गंगा अभियान जैसे अभियान चलाकर फोटोग्राफी और सेल्फी का महोत्सव मानती है… तो इसको दो विरोधाभास में देखना चाहिए एक वह प्रशासनिक और शासन का अमला है जो जनता के पैसे से एकत्र राजस्व को अभियान के तहत खर्च करके चाहे वह कर्ज लेकर के सरकार ने उन्हें दिया हो फोटोग्राफी और सेल्फी का भरपूर आनंद लेती है। यह गर्मियों का मनोरंजन होता है तो दूसरी तरफ एक महीने से किरण टॉकीज के पास विरासत में प्राप्त जल स्रोत को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के निकटतम परिचित शहडोल जिला अध्यक्ष श्रीमती अमिता चपरा के तथाकथित संरक्षण में चपरा एंड कंपनीके द्वारा उसे विरासत के जल स्रोत को जेसीबी लगा करके ढक दिया गया। इस जल स्रोत को खोलने के लिए आम आदमी करीब एक महीने से क्रमिक धरना आंदोलन के जरिए उस वक्त जल संरक्षण के लिए जागरूकता पैदा कर रहे हैं जब समानांतर रूप से मध्य प्रदेश सरकार की कथित जल गंगा संवर्धनअभियान मीडिया में छाई रहती है ।
शहडोल का मीडिया भी भारत की मेंन स्ट्रीम मीडिया की तरह निष्ठावान होकर इस क्रमिक चलने वाले एकमात्र जन लोक आंदोलन के जरिए पानी बचाने के धरना आंदोलन को उतना प्रमुखता नहीं देता जितना कि उसके प्रमुखता से प्रशासन में हलचल मच जाए…। प्रशासन भी जानता है की मीडिया उसी की तरह है निष्ठावान है इसलिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है।
अगर इस क्रमिक धरना आंदोलन और आम आदमी की मांग से भारतीय जनता पार्टी की तथा उनके अध्यक्ष अमिता चपरा की छवि खराब होनेकी आशंका नहीं होती, क्योंकि वह नई-नई साफ सुथरी जिलाअध्यक्ष बनी थी तो वह भी इतनी परेशानी की बात नहीं थी। धीरे-धीरे अमिता चपरा परिपक्व और संवेदनहीन राजनेता की तरह व्यवहार करने लगेगी। आखिर पूत के पांव पालने में दिखते ही लग जाते हैं। अगर कोई पुरुष माफिया नुमा नेता होता तो उसको फर्क नहीं पड़ता है वह तो अभी भी निस फिकर और संवेदनहीनता के साथ शहडोल की भौगोलिक और विरासत की पानी के जल स्रोतों को नष्ट करके आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा करके अपने को करोड़पति और अरबपति बनने में व्यस्त है। ऐसे नेताओं की लिस्ट में आने में अभी अमिता चपरा को वक्त लगेगा। इतनी योग्यता के लिए उन्हें संवेदनहीन होना ही पड़ेगा। इसमें कोई शक नहीं है..।
क्योंकि वह उसी मोहल्ले की रहने वाली थी जहां कथित तौर पर चपरा एंड कंपनी ने किरण टॉकीज के पास की जल स्रोत को अपनी राजनीतिक आर्थिक और माफिया नुमा ताकत से ढक दिया।और इसीलिए महिला होने के कारण संवेदना से परिपूर्ण होने से अमिता चपरा घबराकर एक दल बनाकर प्रशासन से उस क्षेत्र की जमीन को पारदर्शी तरीके से जांच करने की मांग की। प्रशासन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निकटतम व्यक्तित्व के इस मांग पर कैसे काम नहीं करता…? जांच हो गई उसे भी करीब तीन हफ्ते बीत गए लेकिन रिपोर्ट नहीं आ रही है.. क्योंकि रिपोर्ट में स्पष्ट हो गया है कि यह जल स्रोत रहा और वह सरकारी जमीन पर भी रहा…. यह विवाद हो सकता है कि वह किस खसरा नंबर पर है। दो बार तहसीलदार मौका स्थल पर जाकर यह आश्वासन भी की अनशन को खत्म कर दिया जाए क्योंकि जांच हो चुकी है।
लेकिन अनशनकारी लोकजन का तबका का स्पष्ट मानना है कि जब तक पानी और जल स्रोत की समस्या का समाधान नहीं हो जाता वह अनशन खत्म नहीं करेंगे। इस तरह प्रशासन को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
खैर, खैर हम बात कर रहे थे भविष्य में होने वाले संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित आदिवासी क्षेत्र में स्थापित नई नवेली मेडिकल कॉलेज की जो कोविड काल में एक्सीडेंटल लोकार्पित हो गया। यह अलग बात है कि इस दौर में ऑक्सीजन की लापरवाही से करीब 25 30 लोग वहां मर गए अब हम उसे भूल चुके हैं क्योंकि उसमें कई तैयारी नहीं थी । अब उसमें एक पानी की भी समस्या थी
अब पिछले चार-पांच साल से वहां पर विद्यार्थी पानी के लिए इस तरह परेशान है और अपनी व्यवस्था से काम कर रहे हैं जैसे भविष्य में होने वाली एक-एक बूंद के लिए परेशान किरण टॉकीज के पास के आम आदमी परेशान है। यह अलग बात है की सभी विद्यार्थी संपन्न परिवार के होंगे अन्यथा आरक्षित श्रेणी के होंगे तो उन्हें पैसा आता होगा और वह बाहर से पानी का इंतजाम कर लेते होंगे। लेकिन उतनी तकलीफ नहीं है जितनी किरण टॉकीज के आसपास के लोगों को जल स्रोत के नष्ट हो जाने से पानी की समस्या की जागरूकता का क्रमिक धरना आंदोलन करने जैसे हालात हो।
अगर शहडोल में अब तक के कांग्रेस पार्टी या भारतीय जनता पार्टी के प्रशासन कल में भू माफिया तालाबों को नष्ट नहीं किए होते या जल स्रोतों बावड़ी
पर कब्जा करके उन्हें भाठ नहीं दिए होते तो शहडोल की भूजल की स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती, एक दो हाथ में जमीन के अंदर मिलने वाला पानी प्रशासन और शासन की गलत नीतियों के कारण जमीन के अंदर ही अंदर खत्म होता जा रहा है
इसके लिए ना तो कोई प्रशासनिक पहल है और ना ही शासन स्तर पर कोई प्रभावकारी परिणाम दायक सोच दिखाई देती है क्योंकि दिन प्रतिदिन पानी की समस्या बढ़ती ही जा रही है। तमाम स्थानीय निकाय के पार्षद और पदाधिकारी अपनी-अपनी छोटी-छोटी ठेकेदारी में परेशान रहते हैं। उन्हें भी इन तालाबों और जल स्रोतों को लेकर सपने में भी ख्याल नहीं आता दिखाई देता । कई पार्षदों ने तो अपनी पूरी ताकत लगाकर तालाबों और जल स्रोतों को नष्ट कर दिया है और कॉलोनी बसा दी है उससे भी लखपति और करोड़पति भी बन गए हैं।
जब कभी सरकारी फंड आ जाता है उसमें बंदर बांट करना होता है तब उसके तथाकथित गहरीकरण और सौंदरीकरण को लेकर नाटक नौटंकी की चिंता दिखाई देती है । यही कारण है की शहडोल नगर के तमाम जल स्रोत करीब 400 नदी और नाले बावड़ी तथा सैकड़ो की संख्या में प्राचीन कुएं तेजी से नष्ट हो गए।वृक्षों को सड़क सौंदर्य करण और मकान निर्माण के नाम पर काट डाला गया। विकल्प के तौर पर कोई पहल नहीं की गई।इसमें कोई शक नहीं की शहडोल के एक भी तालाब जो बचे हुए हैं उसके आसपास शासन या प्रशासन की तरफ से वृक्षारोपण कर उसे संरक्षित करने के लिए कोई सघन परिणाम दायक अभियान चलाया गया हो. हां उसका तालाब जल स्रोत और नदी नालों का रकवा छोटा करके अतिक्रमण कार्यों को वहां पर पट्टा देकर बसाहट जरूर कर दी गई है। और यही कारण है कि शहडोल का भूजल समाप्त हो गया।
जिससे शहडोल नगर के मुख्य नदी और नाले जिसमें टांकि नाला, पोंडानाला और मुड़ना तथा अड़ना नदी धीरे-धीरे विनाश की ओर चले गए टांकी नाला का अस्तित्व लगभग नष्ट है। पोंडानाला बरसात में समस्या के रूप में दिखाई देता है। और इन सब के कारण जीवित रहने वाली नगर की मुख्य मुड़ना नदी एक गंदे नाले के रूप में जिंदा है.. जो जल्दी ही बदबूदार नाले के रूप में सोन नदी में अपना बदबूदार गंदा पानी प्रवाहित करेगी।
जैसे ही गुजरात की कंपनी अपना सीवर लाइन का काम खत्म करेगी इसकी शुरुआत तय है ऐसा आश्वासन रखना चाहिए।और इसी अश्वाशन की भीड़ में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव का वह आश्वासन जय श्री राम,गर्व से कहो हम हिंदू हैं.. आदि आदि और तमाम ढपोल संघी की नारों के तहत जिंदा रहने का आदत डाल लेनी चाहिए… पता नहीं क्यों मेडिकल कॉलेज के होनहार विद्यार्थी पानी जैसी घटिया और दकियानुशी समस्याओं के लिए दिन से मांग कर रहे हैं। अगर एक महीने में शासन और प्रशासन किरण टॉकीज के पास जन जागरण और जागरूकता का प्रतीक जनलोक आंदोलन से प्रभावित नहीं है वह जल स्रोत को खोलने के मूड में दिखाई ही नहीं देता है तो विद्यार्थियों को एक अध्याय की तरह इसका अध्ययन करना चाहिए ।
भलाई यह मेडिकल का विषय नहीं है लेकिन जिंदा होने के लिए पानी जरूरी है उसे अपने टॉपिक में शामिल करना चाहिए। कहते हैं 70% शरीर में पानी ही पानी है मिनरल वाटर से इसका पूरा नहीं होना है वह जीवन में आवश्यक काम आएगा।रही पानी की बात तो बाणसागर से पानी चल दिया है आएगा… आएगा… आएगा.. और आपकी प्यास बुझाएगा।
क्योंकि इसी बाणसागर के पानी से भविष्य में अमरकंटक जल स्रोत सोन नदी, नर्मदा नदी, जोहिला नदी और तमाम अन्य जल स्रोतों नष्ट होने के बाद हमारा रामराज हमारी प्यास बुझाने वाला है। क्योंकि शीघ्र बाणसागर का पानी अमरकंटक में भी पहुंचाया जाएगा …. ऐसा स्वयं को आश्वासन देना चाहिए।जब तक आपके पास बचा कुछ पैसा है, बुद्धि है, क्षमता और योग्यता है तो आप इस आदिवासी विशेष क्षेत्र में आदिवासियों की तरह सर्वाइवल होना सीख ले।यह भी एक ज्ञानहै शहडोल जिला चिकित्सालय में यह आम बात है। स्वच्छ पानी की गारंटी विशेष बात है इसमें कोई शक नहीं…

