
“आदिवासी अधिकारों पर गैरकानूनी अतिक्रमण: अनुविभागीय अधिकारी सोहागपुर का न्यायालयीन आदेश
शहडोल में पेसा एक्ट की ताकत: बैगा समुदाय को मिला उनका हक शहडोल जिले के सोहागपुर में एसडीओ अरविंद साह ने एक्ट के तहत एक ऐतिहासिक फैसला लिया है, जिसने बैगा समुदाय की जमीन को पूंजीपतियों के कब्जे से मुक्त बनाया । एक कार शोरूम मालिक द्वारा आदिवासियों की जमीन पर अवैध रूप से शोरूम बनाया गया था, जिसे अब बैगा समाज को वापस लौटा दिया गया है। इस फैसले ने शहडोल संभाग में पेसा एक्ट की ताकत को उजागर किया है,
जो आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है।यह कदम दर्शाता है कि यदि अधिकारी कानून को लागू करने के लिए दृढ़संकल्प हों, तो अति पिछड़े वर्गों को उनके अधिकार सहजता से मिल सकते हैं। यह गांधी के उस सपने को साकार करता है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय मिले। हालांकि, शहडोल संभाग मुख्यालय के प्राचीन बूढी माता मंदिर देवी मंदिर के आसपास भी बैगा समुदाय की जमीन पर भू-माफियाओं और पूंजीपतियों का कब्जा बना हुआ है, जिसने कई आदिवासियों को बेघर कर दिया है। एसडीओ अरविंद साह का यह फैसला एक उम्मीद की किरण है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या शहडोल क्षेत्र में व्याप्त इस समस्या का व्यापक समाधान हो पाएगा। पेसा एक्ट के प्रभावी कार्यान्वयन से ही आदिवासी समुदाय अपने हक को पूरी तरह हासिल कर सकता है।
शहडोल जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट संदीप तिवारी का कहना है आवश्यकता है कि: प्रशासनिक आदेशों का सख्ती से पालन कराया जाए। आदिवासी स्वामित्व की भूमि पर अवैध कब्जे को समाप्त कर विधिक वारिसों को तत्काल राहत दी जाए, दोषियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही हो। इस प्रकरण को आदिवासी अधिकारों के संरक्षण की नजीर बनाया जाए।
एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील प्रकरण में, ग्राम जमुआ तहसील सोहागपुर निवासी श्री सोहन बैग पिता स्व. भोला बैगा द्वारा मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 170(ख) के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर अपने पुश्तैनी अधिकारों की रक्षा की गुहार लगाई गई है, आवेदक ने यह आरोप लगाया है कि ग्राम जमुआ स्थित आराजी खसरा नंबर 193 (पुराना ख. 83/1) एवं खसरा नंबर 183 (पुराना ख. 83/11) की भूमि उनके पूर्वज स्व. चैती बैगा के नाम वर्ष 1954-55 से चली आ रही है, जिसे अनावेदक राजेश गुप्ता पिता स्व. दयानिधान गुप्ता (निवासी शहडोल) ने षड्यंत्रपूर्वक अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर अपने नाम फर्जी तरीके से नामांतरण करवा लिया और उस पर एक प्राइवेट कंपनी का शोरूम स्थापित कर लिया है।
आवेदक द्वारा इसकी शिकायत दिनांक 4.10.2022 को जनसुनवाई, कमिश्नर, कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक एवं मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में की गई थी, मामले की जांच में यह तथ्य सामने आया कि खसरा नंबर 193 रकबा 0.858 हेक्टेयर और ख.नं. 183 रकबा 0.154 हेक्टेयर भूमि वर्तमान में अनावेदक राजेश कुमार गुप्ता के नाम दर्ज है, जिसे उन्होंने वर्ष 2005 में शरद कुमार सुहाने से पंजीकृत विक्रय पत्र क्रमांक 667, दिनांक 27.06.2005 के माध्यम से क्रय करना बताया है।
जांच में चौंकाने वाले तथ्य:
राजस्व अभिलेखों के अनुसार, खसरा नंबर 83/1 (अब 193) की कुल भूमि 2.12 एकड़ में से केवल 0.38 एकड़ भूमि वर्ष 1958-59 में काशी पिता विश्वनाथ ढीमर के नाम दर्ज थी, शेष 1.74 एकड़ भूमि उस समय आदिवासी वर्ग के नाम दर्ज थी।उक्त भूमि को शरद सुहाने द्वारा गैरकानूनी रूप से क्रय कर अनावेदक राजेश गुप्ता को विक्रय किया गया, जो कि म.प्र. भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) एवं धारा 165(6) का स्पष्ट उल्लंघन है, ये धाराएं आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासी को हस्तांतरण को प्रतिबंधित करती हैं जब तक कि कलेक्टर से विधिवत अनुमति न ली गई हो।
जांच प्रतिवेदन के आधार पर अनुविभागीय अधिकारी सुहागपुर ने दिनांकित आदेश में स्पष्ट किया कि 1.74 एकड़ भूमि आदिवासी स्वामित्व की है, जिसे गलत तरीके से हड़प लिया गया है।
न्यायालयीन आदेश:
राजस्व प्रकरण क्रमांक 001/अ-23/2022-23 में, अनुविभागीय अधिकारी सोहागपुर ने आदेशित किया है कि शेष 1.74 एकड़ भूमि आदिवासी वर्ग के नाम दर्ज की जाए,साथ ही तहसीलदार सोहागपुर को यह निर्देशित किया गया है कि वे आदिवासी वर्ग के विधिक वारिसों का नाम राजस्व अभिलेखों में इंद्राज करें तथा अनावेदक से कब्जा हटाकर वैधानिक कब्जा दिलाएं।
क्या आदेश का होगा पालन?
यह मामला न केवल एक आदिवासी परिवार की पुश्तैनी जमीन की लड़ाई का है, बल्कि मध्यप्रदेश शासन द्वारा लागू किए गए पेसा कानून की वास्तविक प्रभावशीलता की भी परीक्षा है, शहडोल संभाग में राष्ट्रपति महोदय की उपस्थिति में पेसा कानून का भव्य समारोह आयोजित कर उसका क्रियान्वयन घोषित किया गया था — पर क्या इस कानून का उद्देश्य वास्तव में आदिवासियों के हक़ की रक्षा कर पाएगा?क्या प्रशासनिक अमला इन आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू करेगा?
क्या राजस्व अधिकारियों के संज्ञान में रहते हुए भी आदिवासी भूमि पर वर्षों तक हुआ कब्जा एक संस्थागत विफलता नहीं दर्शाता?
संवैधानिक प्रावधानों एवं विभागीय निष्कर्षों के अनुसार यह स्पष्ट है कि–
यह एक गंभीर आदिवासी वर्ग की भूमि हड़पने का मामला है,इसमें फर्जी नामांतरण, गैरकानूनी विक्रय पत्र, तथा प्रशासन की निष्क्रियता के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।पेसा कानून, अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा, एवं राजस्व संहिता के अनुपालन की वास्तविकता को यह प्रकरण कठघरे में खड़ा करता है। शहडोल में सैकड़ों प्रकरण है जिनका खुलासा होना अभी बाकी है

