डोनाल्ड सत्यं, मोदी मिथ्या…? इससे होता क्या है…( त्रिलोकी नाथ )

डोनाल्ड सत्यं, मोदी मिथ्या…? इससे होता क्या है…
मौसम था ईमानदारी के आंदोलन के प्रतीक बने अन्ना हजारे के लोकपाल लाने की माहौल का। ईमानदारी के आंदोलन की व्यक्ति में प्रभावित जय स्तंभचौक शहडोल में धरना आंदोलन में शामिल है क्योंकि वास्तव में यह इमानदारी का आंदोलन, सत्ता परिवर्तन की नई बेईमानी कोस्थापित करने का एक नया तरीका था। उदाहरण के लिए जैसे सुप्रीमकोर्ट में आदेश कर ही दिया है “इलेक्टरल बॉन्ड” के जरिए अचानक सत्ता में आकर हजारों करोड़ों रुपए गरीब पार्टियों ने फंड इकट्ठा किया उसे बेईमानी कृत्य बता असमवैधानिक घोषित कर दिया गया दिया गया। यह भी एक अजूबा है कि इसके बाद भी हजारों करोड रुपए को जप्त नहीं किया गया। यह अलग बात है कि शहडोल में गैर कानूनी तरीके सेप्राकृतिक सीबीएम गैस निकलने वाली निकलने वाली कंपनी की किन सहयोगी लोगों ने उसमें कितना पैसा दिया…? देश में ईमानदारी तो आई नहीं.., हांअनुभव जरूर मिला। ( त्रिलोकी नाथ )
जब हम भाषण बाजी कर रहे थे धरना आंदोलन मंच में शहडोल में युवा तुर्क कहे जाने वाले पूर्व विधायक जुगल किशोर गुप्ता भी बैठे रहे. हमारा जब भाषण खत्म हुआ तो वह हमसे कह रहे थे “इस भाषण बाजी से होता क्या है…?.”यह बात हमें चुभी, जो मन में किसी कोने में बैठकर रह गई थी. तब इसका अर्थ हम निकालने का प्रयास कर रहे थे फिर छोड़ दिए, ईमानदारी के मौसम का समय गुजर गया क्योंकि वे हमारे आदर्श थे इसलिए किशोर गुप्ता जी की कहीं मन में यह बात टिकी रही अब उनके ना रहने के बाद यह बात लौटकर हमें समझ आ रही है इससे होता क्या है..
दरअसल हो यह रहा है की ताकतवर राष्ट्र अमेरिका का सनकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शायद 16वीं बार अब फिर से यह कहे हैं कि उन्होंने “पाकिस्तान और भारत के बीच संघर्ष विराम कराया है….।”इसलिए उन्हें जो शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए. इसराइल के मुखिया नेतन्यायूं ने ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने के पक्ष में वकालत की है. पाकिस्तान के नकली मुखिया मुनीर तो ट्रंप के खाने में व्हाइट हाउस चले गए तो पाकिस्तान भी अप्रत्यक्ष तौर पर शांति के नोबेल पुरस्कार का खिलौना ट्रंप को मिले इसमें कोई एतराज नहीं है. आखिर नमक का हक अदा करना ही चाहिए।
अब रही भारत की बात तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो एक मात्र भारत के मुखिया है उनकी बोली गई बातें नॉन-बायोलॉजिकल तरीके से पत्थर की लकीर होती है. क्योंकि भारत और पाकिस्तान के विवादों में तीसरे पक्ष की स्वीकृति नहीं होगी यह सिद्धांत स्थापित रहा इसलिए वह भी अपने मुंह से यह बात बोलने में पीछे हटते रहे हैं. पिछले दिनों पहलगाम के हमले में बात जो युद्ध जैसे हालात “ऑपरेशन सिंदूर” के जरिए पैदा हो गए थे उसमें संघर्ष विराम की घोषणा अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप के कहने के बाद जब भारत ने भी घोषणा की तब संघर्ष विराम दिखने लगा, बावजूद इसके कि ऑपरेशन सिंदूर घोषित तौर पर जारी है।
फिर भी अनेक मांगो से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीसरे पक्ष की बात को ना तो मंजूर कर रहे हैं और ना ही ना मंजूर कर रहे हैं. समय बीतता चला जा रहा है यह एक भाषण का हिस्सा को चला है धीरे-धीरे अमेरिका की कही हुई बात इस तरह प्रमाणित होती जा रही है जैसे की 100 बार झूठ बोला जाए तो वह सच साबित हो जाती है. फिर यह तो अर्ध सत्य स्थापित है कि पहले अमेरिका ने कहा था भारत पाकिस्तान का युद्ध संघर्ष विराम की स्थिति में पहुंचा दिया गया है बाद में उसके परिणाम भी देखे गए।
डोनाल्ड ट्रंप लगातार अपनी बात पर अडग है कि उन्होंने मध्यस्थ की। बहुत अच्छा हुआ इस समय रहते नरेंद्र मोदी को विवेक आ गया और वह व्हाइट हाउस में बैठे डोनाल्ड ट्रंप के उस मैत्रीपूर्ण निमंत्रण को अस्वीकार कर दिए जिसमें पाकिस्तान का मुनीर खाने में बुलाया गया था, अन्यथा सनकी राष्ट्रपति का क्या.. वह नरेंद्र मोदी और मुनीर की फोटो एक साथ खाना खाते हुए ट्विटर में डाल देता, और कह देता कि देखो ;मैं कहता था ना कि मैं ही मध्यस्थता कराई है.. फिर कोई चारा नहीं होता की तीसरे पक्ष ने भारत-पाकिस्तान में कोई भूमिका अदा नहीं की है. स्वीकार ही करना पड़ता। जैसे अभी अस्वीकार करने का दबाव बना हुआ है… इसकी हवा निकल जाती है।
तब नरेंद्र मोदी जी का यह भाषण की भारत-पाकिस्तान में किसी ने मध्यस्थता नहीं की है सिर्फ एक जुमला साबित होता बस अमित शाह को यह घोषित करना पड़ता ….उसी तरह जैसे 2014 के चुनाव के बाद हर खाते में हर व्यक्ति को 15 लाख रुपए पहुंचेंगे एक जुमला साबित हुआ।
तो जो बार-बार बोला जा रहा है प्रधानमंत्री के द्वारा अन्य नेताओं के द्वारा, “तो उससे होता क्या है…?”इस शब्द की व्याख्या जो जुगल किशोर गुप्ता जी ने कही थी अब समझ में आ रहा है कि उसे होता क्या है… भाषण बाजी आप करते रहिए षड्यंत्रकारी अपने षडयंत्रों को अपने शब्दों को ब्लैकमेलिंग करके अदानी जैसे लोगों को अपने न्यायालय में फंसा करके बेईमानी को ईमानदारी का नकाब पहनकर देश में नई स्वतंत्रता करा कर अगर शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल कर लेते हैं.. डोनाल्ड ट्रंप. तो कोई बड़ी बात नहीं, बस हमारे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने डियर फ्रेंड डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस तरह जैसे कि इजरायल के नेतन्यायूं ने शांति का पुरस्कार देने के लिए प्रस्ताव दिया है एक अंगूठा लगा दे. तो डोनाल्ड ट्रंप शांति के महाद्वीप के रूप में स्थापित हो जाएंगे।
और इसमें बुराई क्या है अगर ट्रंप के तथाकथित व्यापारिक सौदा की डील अच्छी है… यह नया भारत है नए ढंग से सोचता है नये ढंग से चलता है हम लोग आदिवासी विशेष क्षेत्र के अज्ञानी लोग हैं हम किरण टॉकीज के पास प्राचीन बावड़ी को बचाने के लिए, खोदने के लिए 100 दिन तक धरना आंदोलन करते हैं और 3 महीने में मध्य प्रदेश सरकार जल गंगा अभियान चालू करके खत्म कर देती है.. यह कहते हुए की जल संरक्षण के लिए बावड़ी जैसे जल स्रोतों को बचाना उनकी प्राथमिकता है… यही नया भारत है इसको समझाना होगा “झूठ (असत्य)मेव जयते..”को स्वीकार करना होगा, “सत्यमेव जयते “बीते कल की बातें दकियानूसी सोच है.. इस सत्य को भी स्वीकारना होगा और इसी से सब कुछ होगा.. ऐसा लगने लगा है …साथी जुगुल किशोर गुप्ता ठीक कहते थे केवल भाषण बाजी से होता क्या है… शांति का पुरस्कार का सपना देखने वाला डोनाल्डट्रंप सत्य है या नरेंद्र मोदी असत्य…? इससे होता क्या है……..
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