शहडोल में सीवर लाइन निर्माण: ट्रेलर दिखा, फिल्म बाकी… ( त्रिलोकीनाथ )

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शहडोल में सीवर लाइन निर्माण: ट्रेलर दिखा, फिल्म बाकी
शहडोल, मध्य प्रदेश का एक संभागीय मुख्यालय, इन दिनों सीवर लाइन निर्माण के कारण सुर्खियों में है। यह परियोजना, जो शहर की आधारभूत संरचना को मजबूत करने का वादा करती है, बार-बार समय सीमा बढ़ने और हाल ही में हुई एक दुखद घटना के कारण विवादों में घिर गई है। सीवर लाइन की खुदाई के दौरान मिट्टी धंसने से दो मजदूरों के दबने की खबर ने न केवल स्थानीय प्रशासन को हिलाकर रख दिया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि इस परियोजना का वास्तविक नियोक्ता कौन है और इसके पीछे की जवाबदेही कहां तय की जाएगी?
                                                                                      ( त्रिलोकीनाथ )
हादसे की त्रासदी और प्रशासन की भूमिका17 जुलाई 2025 को, शहडोल के सोहागपुर थाना क्षेत्र के वार्ड नंबर 1, कोनी में सीवर लाइन के लिए गड्ढा खोदते समय मिट्टी धंसने से दो मजदूर दब गए। इस हादसे में एक मजदूर की मौत हो गई, जिसके शव को पांच घंटे की मशक्कत के बाद निकाला गया, जबकि देर रात दूसरे मजदूर का शव भी बरामद हुआ। इस घटना ने ठेकेदार की लापरवाही को उजागर किया, जिसके बारे में स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा हुई। प्रशासन, जिसमें कलेक्टर डॉ. केदार सिंह और पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव शामिल थे, तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे और राहत कार्य शुरू किए। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह त्वरित प्रतिक्रिया पर्याप्त थी, या यह केवल एक औपचारिकता थी?

नियोक्ता की गुमनामी और जवाबदेही का अभाव
  शहडोल की आम जनता के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि इस सीवर लाइन परियोजना का वास्तविक नियोक्ता कौन है। क्या यह कोई सरकारी निकाय है, या फिर निजी ठेकेदार? क्या गुजराती मूल के ठेकेदारों का इसमें कोई हाथ है, जैसा कि कुछ अफवाहों में कहा जा रहा है? आम जनता को इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। यह अपारदर्शिता परियोजना की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। ठेकेदार की लापरवाही का आरोप तो सामने आया है, लेकिन क्या पुलिस इस मामले में प्रकरण दर्ज करेगी, या यह भी अमलई में रिलायंस इंडस्ट्रीज के निर्माण कार्य के दौरान दो बच्चों की मौत की तरह दब जाएगा, जहां प्रकरण दर्ज होने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई?
सुरक्षा मानकों की अनदेखी
      सीवर लाइन निर्माण के दौरान होने वाली मौतें कोई नई बात नहीं हैं। पहले भी कई बार मजदूरों के दम घुटने या मिट्टी धंसने से मरने की खबरें सामने आ चुकी हैं। शहडोल का यह हादसा भी सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी का परिणाम प्रतीत होता है। मजदूरों को न तो पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया था, न ही सुरक्षा उपकरण। यह स्थिति न केवल शहडोल में, बल्कि पूरे देश में सीवर लाइन और अन्य निर्माण परियोजनाओं में व्याप्त है। उदाहरण के लिए, पानीपत में 2022 में एक मजदूर की सीवर लाइन में दम घुटने से मौत हो गई थी, और नरसिंहपुर में भी इसी तरह की घटना में दो मजदूरों की जान गई थी।

सामाजिक और राजनीतिक आयाम
इस हादसे ने सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े किए हैं। दलित नेता उदित राज ने अंतरिक्ष यात्री सुभांशु शुक्ला के मिशन के बाद यह मांग उठाई थी कि एससी/एसटी समुदाय को ऐसे मौकों पर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं उठाया कि सीवर लाइन जैसे खतरनाक कार्यों में कितने एससी/एसटी/ओबीसी इंजीनियर या ठेकेदार शामिल हैं। अगर इन समुदायों का प्रतिनिधित्व ठेकेदारी और इंजीनियरिंग स्तर पर होता, तो शायद शहडोल में मजदूरों की जान इस तरह खतरे में न पड़ती। यह सवाल भी उठता है कि क्या चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नेता, जो संसद में इस तरह के मुद्दों को उठाते हैं, अब केवल पेशेवर राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं?
बदबू का साम्राज्य: शहडोल की नियति?
शहडोल में सीवर लाइन निर्माण की यह त्रासदी केवल एक हादसा नहीं, बल्कि एक बड़े संकट का ट्रेलर है। शहर पहले से ही ओरिएंट पेपर मिल के कास्टिक सोडा की बदबू से जूझ रहा है, जो 50 किलोमीटर के दायरे में अपनी सड़ांध फैलाए हुए है। अब अगर सीवर लाइन परियोजना भी इसी तरह अव्यवस्थित और लापरवाही से चलती रही, तो शहर बदबू और अव्यवस्था के दलदल में और गहरे डूब जाएगा। यह परियोजना, जिसे जनता के लिए सुविधा का वादा करके शुरू किया गया था, अब तक केवल असुरक्षा और मौत का पर्याय बनती दिख रही है।
 जवाबदेही और जनसहभागिता की जरूरत
शहडोल का यह हादसा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि बिना जनसुनवाई और जनसहभागिता के शुरू की गई परियोजनाएं कितनी घातक हो सकती हैं। अगर स्थानीय लोगों को परियोजना की योजना, ठेकेदारों की जानकारी और सुरक्षा मानकों के बारे में पारदर्शी तरीके से बताया जाता, तो शायद यह त्रासदी टल सकती थी। मजदूरों की जान की कीमत पर बनने वाली यह सीवर लाइन क्या वाकई शहर के लिए वरदान साबित होगी, या यह केवल एक और बदबू फैलाने वाला बोझ बनेगी?प्रशासन और ठेकेदारों को अब जवाबदेही तय करनी होगी। पुलिस को चाहिए कि वह इस मामले में निष्पक्ष जांच करे और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। साथ ही, भविष्य में ऐसी परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया जाए और जनता को इसके हर पहलू से अवगत कराया जाए। नहीं तो, जैसा कि कहा गया है, यह केवल ट्रेलर है—पूरी फिल्म अभी बाकी है, और यह शहर को बदबू और त्रासदी के गर्त में धकेल सकती है।


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