क्या निराश हुआ जाए”….?अवैध व्यवसाय शहडोल जिले में दशकों से चल रहा है और चलता रहेगा।

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“क्या निराश हुआ जाए” एक प्रेरणादायक निबंध है, जिसके लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं(जन्म: 19 अगस्त 1907, मृत्यु: 19 मई 1979) एक प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार, निबंधकार, आलोचक और विद्वान थे।उनका यह निबंध आधुनिक समाज में व्याप्त निराशा, भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती और हिंसा जैसी बुराइयों के बीच भी आशा और अच्छाई की उपस्थिति पर केंद्रित है।  स्वयं को कहते हैं कि समाचार पत्रों में नकारात्मक खबरों को पढ़कर मन बैठ जाता है, लेकिन वे निराशा को ठुकराते हुए कहते हैं कि “यह सबसे कठिन समय नहीं है”। वे प्राचीन भारतीय मूल्यों (जैसे आंतरिक भावों का महत्व, लोभ-मोह पर विजय) का स्मरण कराते हैं और दो व्यक्तिगत घटनाओं के माध्यम से अपनी बात को मजबूत करते हैं:

पहली घटना (रेलवे स्टेशन पर): लेखक रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते समय गलती से 10 रुपये के बजाय 100 रुपये का नोट दे देते हैं। वे जल्दी में ट्रेन में बैठ जाते हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि टिकट क्लर्क ने ईमानदारी से अतिरिक्त 90 रुपये लौटा दिए थे। यह घटना लेखक को विश्वास दिलाती है कि ईमानदार लोग अभी भी मौजूद हैं।
दूसरी घटना (बस यात्रा): लेखक अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ बस से यात्रा कर रहे होते हैं। रास्ते में बस खराब हो जाती है और रुक जाती है। रात के लगभग 10 बजे, सुनसान जगह पर सभी यात्री चिंतित हो जाते हैं। कंडक्टर साइकिल लेकर चला जाता है, लेकिन लौटकर न केवल बस की मरम्मत करवाता है, बल्कि लेखक के बच्चों के लिए दूध भी लाता है और एक नई बस की व्यवस्था करता है। यह घटना मानवता और सहयोग की मिसाल पेश करती है।

जब भाजपा अस्तित्व में नहीं थी उस समय शहडोल में कैलाश तिवारी तब की कॉलेज की राजनीति में आरएसएस से जुड़ी विचारधारा राजनीति के चमकते चेहरे के रूप में उभर कर आए थे आज भाजपा की वरिष्ठतम नेता है उनके लंबे राजनीतिक शहडोल के अनुभव के बाद जो लेख सामने आया है वह बेहद निराश करने वाला है व्यंगात्मक तो है ही, किंतु सच्चाई भी यही है जो वह कह रहे हैं. उनका  शासन से मांग की है कि जिले में व्यापक पैमाने पर की जा रही रेत एवं कोयला अवैध उत्खनन एवं परिवहन को देखते हुए इसको अवैध ना मानते हुए वैद्य माना जाए, रॉयल्टी मुक्त किया जाए। इस स्वरोजगार को प्रोत्साहन दिया जाए ।इसमें हजारों देशभक्त नागरिक लगे हुए हैं। जब-जब इसमें सख्ती की जाती है तो जिले में बेरोजगारी बढ़ जाती है। ऐसे में उसको वैध रूप दिया जाए।
कैलाश तिवारी ने कहा है कि इस अवैध व्यवसाय में 90% मामले तो पकड़ में आते नहीं है। केवल 10% परसेंट लोग पकड़े जाते हैं । हाईवा ट्रक वाले तो पकड़ में नहीं आते हैं। ट्रैक्टर ट्राली वाले पकड़ में आते हैं वह भी अगर मिली भगत करके काम करें तो बचा जा सकता है। ऐसे में प्रदेश शासन को चाहिए कि शहडोल जिले के लिए यह विशेष सुविधा प्रदान की जाए। कैलाश तिवारी ने कहा है कि जब 90% काम मिलीं भगत से हो रहा है तो 10% लोगों के लिए क्यों शासन परेशान हो रहा है। कैलाश तिवारी ने कहा है कि यह अवैध व्यवसाय शहडोल जिले में दशकों से चल रहा है और चलता रहेगा। इसको कोई भी शासन , प्रशासन रोक नहीं सकता है। इसलिए इसका एकमात्र उपाय है कि इसको मुक्त किया जाए।

लेखक रवींद्रनाथ टैगोर के एक प्रार्थना गीत का उदाहरण देकर कहते हैं कि विपत्तियों में भी भगवान पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। वे जोर देते हैं कि बुराइयों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अच्छाइयों को उजागर करना चाहिए। समाचार पत्रों में भी सकारात्मक खबरें छापने की मांग करते हुए, वे निष्कर्ष निकालते हैं कि भारत में अच्छाई अभी समाप्त नहीं हुई है, इसलिए निराश होने का कोई कारण नहीं। यह  आशावाद, धैर्य और भारतीय संस्कृति के प्रति विश्वास का संदेश देता है। जो सैद्धांतिक रूप से और स्वस्थ समाज के लिए भी सही संदेश है भारत में स्वतंत्रता का सही मायने में अर्थ भी यही है लेकिन यह भी की कैलाश तिवारी के संदेश में एक सच्चाई है कि आखिर स्थानीय संसाधन जो प्राकृतिक रूप से भरपूर है उसका उपयोग स्थानीय निवासियों मूल आदिवासियों और अन्य लोगों के लिए उनकी आजीविका और रोजगार के लिए क्यों नहीं हो पा रहा है ऐसी नीतियां क्यों नहीं बनाई जा रही है जो प्राथमिक रूप से उन्हें अजीबका परक विकास में मदद कर सके।
क्या आदिवासी विशेष क्षेत्र होने के नाते भी उस पेसा एक्ट में इसके प्रचार प्रसार के लिए भारत के राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू शहडोल आई थी क्या एक राजनीतिक स्टंट था अन्यथा उसे पेसा एक्ट में इस बात के अवसर क्यों उपलब्ध नहीं है जो कैलाश तिवारी अपने आलेख में इशारा करते हैं इसका मतलब कि पेसा एक्ट सिर्फ एक ढपोल शंख है जिसे गैर आदिवासी समाज के लोग जोर-जोर से बजाते हैं और जमकर प्राकृतिक संसाधनों का लूटपाट कर रहे हैं. परिणाम स्वरूप स्थानीय प्राकृतिक संसाधन का कोई भी हितबद्ध सहभागिता आदिवासी विशेष क्षेत्र के लोगों के लिए सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। कलेक्टर चाहे तो प्रायोगिकी तौर पर स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का सर्वोच्च प्राथमिकता से उपयोग स्थानीय निवासियों के लिए आजीविका पार्क इस प्रकार से कर सकते हैं जिसमें लाखों लोगों को रोजगार की गारंटी मिल सकती है किंतु हमारी कार्यपालिका में क्या यह क्षमता मर चुकी है…?

वरिष्ठतम भाजपा नेता कैलाश तिवारी का इशारा शायद उसे तरफ भी है। किंतु उनकी इस चेतना के बाद कोई हलचल जीवित होने की संभावना हम अपने समाज में देखते हैं..? यह भी देखना होगा अन्यथा राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट के अंदाज में आदिवासी विशेष क्षेत्र लूट का अड्डा बना ही हुआ है इसमें कोई शक नहीं ……

जिला अधिवक्ता बार एसोसिएशन के अध्यक्ष संदीप तिवारी का कहना है आदिवासियों की जमीनों पर भ्रष्टाचार आम है सत्ताधारी दल के लोग भी इससे अछूते नहीं है लगता है नैतिकता का युग खत्म हो गया है .बेईमानी एक योग्यता बन गई है जरूरत है प्रशासन सख्त हो।

जिसका एक उदाहरण स्वयं कलेक्टर के उस नोटिस से प्रदर्शित होता है जिसमें एक आदिवासी की जमीन को षड्यंत्र करके गैर आदिवासियों के पक्ष में जो पावरफुल लोग हैं विक्रय कर दिया गया है कह सकते हैं पेसा एक्ट दिखाने का दांत है इसलिए भी यह संभव हो पाया ऐसी कमजोर व्यवस्था में कलेक्टर केदार सिंह का यह साहस कहां तक टिक पाएगा या वह भी कैलाश तिवारी की तरह क्या यह सोच रहे हैं कि “क्या निराश हुआ जाए…?”

—————————————————————————(त्रिलोकीनाथ )


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