
शहडोल सीवरेज परियोजना में भ्रष्टाचार और लापरवाही: दो श्रमिकों की मौत ने खोला घोटाले का पिटारा
शहडोल, मध्य प्रदेश,–
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में 172.61 करोड़ रुपये की सीवरेज परियोजना में भ्रष्टाचार, अनुबंध उल्लंघन और घोर लापरवाही के आरोपों ने हंगामा मचा दिया है। 17 जुलाई 2025 को वार्ड नंबर 1 (कोनी क्षेत्र) में गहरी खुदाई के दौरान मिट्टी धंसने से दो बैगा जनजाति श्रमिकों – महिपाल बैगा और मुकेश बैगा – की दर्दनाक मौत हो गई। सुरक्षा उपकरणों की कमी, बैरिकेडिंग का अभाव और राहत कार्य में देरी ने इस हादसे को और भी जघन्य बना दिया। स्थानीय अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता संदीप कुमार तिवारी ने एक प्रेस नोट जारी कर उच्च स्तरीय जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है, जो इस परियोजना में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें उजागर करता है।
हादसे में लापरवाही की चरम सीमा
शहडोल नगर पालिका के अधीन चल रही इस परियोजना में ठेका कंपनी पी.सी. स्नेहल कंस्ट्रक्शन प्रा. लि. (अहमदाबाद) द्वारा काम कराया जा रहा था। घटना स्थल पर 13 फीट गहरे गड्ढे में काम कर रहे श्रमिकों के ऊपर अचानक मिट्टी धंस गई। स्थानीय निवासियों ने मजदूरों की चीखें सुनकर मदद की कोशिश की, लेकिन लगातार धंसती मिट्टी और भारी बारिश के कारण रेस्क्यू में देरी हुई। एसडीआरएफ की टीम को बुलाया गया, लेकिन तब तक दोनों श्रमिक दब चुके थे.एक रिपोर्ट के अनुसार, घटनास्थल पर हेलमेट, रस्सी या मिट्टी रोकने वाली जाली जैसा कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं था। बताया गया कि बारिश के बीच भी काम जारी रखना और जेसीबी की अनुपस्थिति ने हादसे को आमंत्रित किया।
परियोजना का इतिहास: देरी, उल्लंघन और मिलीभगत
यह परियोजना एमपीयूडीसी भोपाल और पी.सी. स्नेहल कंस्ट्रक्शन के बीच 30 नवंबर 2021 को हस्ताक्षरित हुई थी। त्रिपक्षीय अनुबंध (नगरीय विकास विभाग, एमपीयूडीसी और नगर पालिका शहडोल) 7 जनवरी 2022 को लागू हुआ। कार्य 14 दिसंबर 2021 से शुरू होकर मूल रूप से 13 दिसंबर 2023 तक पूरा होना था, किंतु भ्रष्टाचार का सही बंदर बांटना हो सपना के कारण और गुजरात की कंपनी होने के राजनीतिक दबाव के कारण भी इसे 31 जुलाई 2025 तक बढ़ा दिया गया है।बताया जाता है कि 14 अगस्त 2025 की समीक्षा रिपोर्ट में भौतिक प्रगति 62% और वित्तीय प्रगति मात्र 43.41% दर्ज की गई।
निगरानी एजेंसी शाह टेक्निकल एवं लेक्सेस जे.व्ही. की भूमिका भी संदिग्ध
29 मई 2025 की साइट विजिट रिपोर्ट में पंपिंग स्टेशन में बीम का ऑफसेट, सीसीटी भवन में एग्जॉस्ट फैन की कमी, श्रमिकों की भारी कमी, धीमी प्रगति और गहरी खुदाई में सुरक्षा उपायों का पूर्ण अभाव दर्ज किया गया, लेकिन इन्हें अनदेखा कर दिया गया। यह मिलीभगत का स्पष्ट प्रमाण है।
हादसे के बाद का ‘भ्रष्टाचार का खेल’
हादसे के तुरंत बाद 21 जुलाई 2025 को सुरक्षा चूक पर ठेका कंपनी को नोटिस जारी हुआ और 30 जुलाई को उसे 3 वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। लेकिन मात्र 54 दिनों में यह आदेश पलट दिया गया और कंपनी को पुनः कार्य करने की अनुमति मिल गई। इसी दौरान एमपीयूडीसी शहडोल के प्रोजेक्ट मैनेजर विजय सिंह ने इस्तीफा दे दिया, जो संयोग मात्र नहीं लगता।
पुलिस ने बनाया सीमित आरोपी : 22 जुलाई 2025 को सोहागपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 के तहत मात्र 5 व्यक्तियों पर मुकदमा दर्ज हुआ। ठेका कंपनी का प्रबंधन, एमपीयूडीसी प्रोजेक्ट मैनेजर, मुख्य नगर पालिका अधिकारी शहडोल और निगरानी एजेंसी अब तक जांच के दायरे से बाहर हैं।
संदीप कुमार तिवारी ने छह प्रमुख मांगें रखी हैं:
मुआवजा: मृतक श्रमिकों के परिवारों को 30-30 लाख रुपये का तत्काल मुआवजा।
आपराधिक मुकदमे: ठेका कंपनी, निगरानी एजेंसी, प्रोजेक्ट मैनेजर और मुख्य नगर पालिका अधिकारी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता एवं श्रम कानूनों के तहत एफआईआर।
स्थायी ब्लैकलिस्ट: ठेका कंपनी को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट कर परियोजना से हटाना।
उच्च स्तरीय जांच: सीबीआई या लोकपाल द्वारा अनुबंध अवधि बढ़ाने, ब्लैकलिस्ट आदेश पलटने और समग्र भ्रष्टाचार की जांच।
विभागीय कार्रवाई: सभी जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल निलंबन और जांच।
ऑडिट और नीतिगत बदलाव: परियोजना की पूर्ण ऑडिट और सुरक्षा मानकों के सख्त अनुपालन के लिए नई नीतियां।
तिवारी ने कहा, “यह घटना सरकारी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार, निगरानी विफलता और मानव जीवन की उपेक्षा का भयावह उदाहरण है। यदि दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पीड़ित परिवारों और संवैधानिक मूल्यों के साथ अन्याय होगा।” उन्होंने राष्ट्रपति, मध्य प्रदेश सरकार और संबंधित एजेंसियों से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की।यह हादसा मध्य प्रदेश और देशभर में श्रमिक सुरक्षा की कमी का हिस्सा है। हाल ही में दिल्ली में सीवर सफाई के दौरान कई मौतें हुईं, जहां 90% श्रमिकों को सुरक्षा उपकरण नहीं मिले।शहडोल में ही अवैध कोयला खदान धंसकने से पति-पत्नी की मौत हुई थी, जो खनन माफिया की लापरवाही को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं में निजी ठेकेदारों की मनमानी और सरकारी निगरानी की कमी जानलेवा साबित हो रही है।

