
शहडोल के आदिवासी क्षेत्र में पेसा एक्ट: घोषणाओं से आगे जमीनी हकीकत
शहडोल (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम-1996 (पेसा एक्ट) के क्रियान्वयन को लेकर सरकारी घोषणाओं की भरमार है लेकिन जमीनी स्तर पर यह कानून आदिवासियों को सुरक्षा का ढाल बन पाने में असफल साबित हो रहा है। स्थापित होने के बावजूद यहां भूमाफिया सूदखोरी और प्रशासनिक उदासीनता के कारण कोल, गोंड, बैगा आदि जैसी जनजातियां अपनी पुश्तैनी जमीनों से वंचित हो रही हैं। विशेषज्ञों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का मानना है कि पेसा एक्ट अब टाइम पास की तरह हो गया है जहां ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने का वादा कागजों तक सीमित रह गया है।
———– (त्रिलोकी नाथ)———-
पेसा एक्ट का उद्देश्य और सरकारी प्रयास
पेसा एक्ट जो 1996 में आदिवासी हितों की रक्षा के लिए पारित हुआ पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को भूमि जल जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्रदान करता है। मध्य प्रदेश में इसका औपचारिक क्रियान्वयन 2022 में शुरू हुआ जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शहडोल के लालपुर में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर मैनुअल जारी किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि यह कानून आदिवासियों को भूमि हड़पने से बचाएगा और ग्राम सभाओं को शराबबंदी बाजार नियंत्रण जैसे अधिकार देगा। 2021 में ही चौहान ने इंदौर में तांत्या भील शहादत दिवस पर अधिनियम को तत्काल लागू करने की अधिसूचना जारी की थी।हाल ही में 24 जुलाई 2025 को भोपाल में पंचायती राज मंत्रालय मध्य प्रदेश सरकार और अमरकंटक स्थित अंतरराष्ट्रीय इंदिरा गांधी जनजाति विश्वविद्यालय के बीच एक विशेष समझौता साइन हुआ। इसका उद्देश्य पेसा एक्ट के सफल क्रियान्वयन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करना है जो आदिवासी उत्कृष्टता को बढ़ावा देगा।मध्यप्रदेश स्थापित विश्वविद्यालय को सरकार ने कुलगुरु की संज्ञा दी है। विश्वविद्यालय का फोकस जनजातीय ज्ञान संरक्षण और पेसा जैसे कानूनों पर है लेकिन विश्वविद्यालय कुलपतियों की कार्य प्रणाली इन्हें गुरुघंटाल ज्यादा बनाई दिखाई देती है।
जमीनी सच्चाई: घोषणाओं के बीच उपेक्षा
शहडोल क्षेत्र जैसे पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पेसा एक्ट के तीन साल बाद भी कोई ठोस प्रायोगिक उदाहरण नहीं दिखता। कुलपतियों को आदिवासी क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई लेकिन विश्वविद्यालय के छात्रों ने एक भी गांव में पेसा-संबंधी प्रयोग नहीं किया।
एक दर्दनाक उदाहरण है पाली एसडीएम क्षेत्र के धौरई गांव का। यहां कोल जनजाति के दुर्गा कोल की मौत भूमाफियाओं की प्रताड़ना से हुई। उनका परिवार पुश्तैनी जमीन छोड़कर गैर-आदिवासी अग्रवाल को सौंपने को मजबूर हो गया। तहसीलदार ने कथित तौर पर नोटिस पर नोटिस का दुरुपयोग किया जबकि परिवार को कानूनी जागरूकता की कमी थी। जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में यह मामला दर्ज है लेकिन पेसा के तहत ग्राम सभा ने हस्तक्षेप नहीं किया।इसी तरह नरोजाबाद के केवल सिंह आदिवासी गोंड सूदखोरी के शिकार हुए। महामारी जैसी फैली इस समस्या में उनकी 17 लाख रुपये की कमाई सूदखोरों ने हड़प ली।केवल सिंहने अनुसूचित जनजाति आयोग तक शिकायत की जहां वे पूर्व मंत्री ज्ञान सिंह और विधायक मीना सिंह के रिश्तेदार होने का दावा किया। लेकिन न्याय न मिला।
केवल सिंह लंबी बीमारी से जूझे उनकी पत्नी आर्थिक तंगी में चल बसीं। आयोग कलेक्टर एसपी या कमिश्नर किसी ने राहत नहीं दी। नागेश के जीवित होने की पुष्टि नहीं हो सकी।शहडोल जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष संदीप तिवारी कहते हैं “कानून कितने भी बन जाएं गुरुघंटालों के बिना कुछ नहीं। मुख्यमंत्री हों या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पेसा एक्ट सिर्फ मूंगफली की तरह टाइम पास है। तिवारी का यह बयान जमीनी हकीकत को प्रमाणित करता है जहां ग्राम सभाओं को फंडिंग की कमी और प्रशासनिक हस्तक्षेप से कमजोर किया जा रहा है।
राजनीतिक घोषणाएं: वोट बैंक की राजनीति
राष्ट्रपति मुर्मू का 2022 का शहडोल दौरा गुजरात चुनाव से पहले आदिवासी वोट बैंक मजबूत करने का प्रयास जसा था। उन्होंने पेसा लागू करने की दूसरी बार घोषणा की। इससे एक बार पहले चौहान ने भी वादा किया था। लेकिन 2025 के बावजूद शहडोल संभाग में अमरकंटक विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं राहत दिलाने में नाकाम रही हैं।
स्थानीय पेसा मोबिलाइजरों के अनुसार तेंदूपत्ता संग्रहण जैसी गतिविधियां ठप हैं और ग्राम सभाओं को अर्थदंड वसूली के अधिकार नहीं मिले।
लद्दाख से सबक: संवैधानिक सुरक्षा की चुनौती
यह मुद्दा सिर्फ शहडोल तक सीमित नहीं। लद्दाख में जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को छठी अनुसूची की मांग पर 5 साल के धरने के बाद देशद्रोही ठहराया गया। 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। उनके चार सहयोगियों पर गोली चला हत्या कर दि गई। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने राष्ट्रपति मुर्मू को पत्र लिखा लेकिन कोई राहत नहीं। यह घटना दर्शाती है कि संवैधानिक सुरक्षा भी राजनीतिक दबाव में कमजोर पड़ रही है।
आगेआदिवासी अब इंतजार नहीं न्याय की मांग कर रहे हैं।
शहडोल के गुरु घंटाल या कार्यपालिका संस्थाएं क्या राहत दिला पा रही हैं पेसा एक्ट के तह नई ग्राम सभाओं का गठन हुआ है और एनसीआर प्रकरण हल हुए हैं लेकिन ये जमीनी पीड़ा को कम नहीं करते। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि ग्राम सभा कोष में फंडिंग बढ़े और जैसे संस्थानों को जवाबदेह बनाया जाए।संविधान की गारंटी जिंदा है लेकिन क्रियान्वयन में कमी।अक्सर देखा रह जाता है कि आदिवासियों से संबंधित मुकदमें महिनों सालों निराकृत नहीं होते और उनसे संबंधित उनकी जमीन में कब्जा कराने के लिए एसडीएम, तहसीलदार पाली घंटे दर घंटे नोटिस देकर कब्जा करना चाहता है बावजूद शहडोल का आदिवासी सांसद विधायकों मंत्रियों की चुप्पी लद्दाख के शोषण से से कमजोर नजर नहीं आती
आईजीएनटीयू अमरकंटक;पेसा एक्ट
पंचायती राज मंत्रालय ने सरकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू) अमरकंटक के सहयोग से भोपाल में पेसा एक्ट से संबंधित एक उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित करने हेतु एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। यह पहल जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ बनाने और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा एक्ट) के प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन की दिशा में एक कदम है। आईजीएनटीयू अमरकंटक स्थित यह उत्कृष्टता केन्द्र जनजातीय सशक्तिकरण और अनुसंधान क्षमता एक समर्पित मंच के रूप में कार्य करेगा। किंतु वास्तव में ऐसा होता नहीं दिख रहा है क्योंकि यह सिर्फ एक भ्रष्टाचार के अनुसंधान का अवसर बन गया दिखता है यही कारण है कि शहडोल के आदिवासी को आईजीएनटीयू का कोई लाभ नहीं मिल रहा है यहां पर गुरु घंटालों की फौज आती है और जाती है
वैसे तो शासन की प्रतिबद्धता के चलतेऔर संविधान की गारंटी के अनुरूप इस कार्यक्रम में पंचायती राज मंत्रालय के ,पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की प्रधान सचिव श्रीमती दीपाली रस्तोगी पंचायती राज मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती मुक्ता शेखर आईजीएनटीयू के कुलपति प्रोफेसर ब्योमकेश त्रिपाठी इस कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण पेसा इन एक्शन: स्टोरीज ऑफ स्ट्रेंथ एंड सेल्फ-गवर्नेंस” शीर्षक वाला पेसा एक्ट से संबंधित संग्रह का औपचारिक विमोचन था। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू) अमरकंटक को तीन वर्षों की अवधि के लिए एक रणनीतिक साझेदार के रूप में चुना गया यह एक ऐसा संकलित दस्तावेज है. जिसमें पेसा एक्ट को लागू करने वाले राज्यों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों केस स्टडीज़ कानूनी प्रावधानों और क्षेत्रीय नवाचारों को शामिल किया गया है। लेकिन जो जमीनी हकीकत है जैसा कि पाली और नरोजाबाद और पूरे पांचवी अनुसूची के क्षेत्र में देखने को मिलता है उसे तो यह लगता है कि यह भी एक पाखंड है क्योंकि जमीनी हकीकत काइन दस्तावेजों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं दिखाई देता है
क्योंकि जिस प्रकार से नरोजाबाद के नरेश अपने तमाम प्रयासों के बावजूद भी अपनी 17 लाख की राशि पुलिस और प्रशासन की मदद से वसूल नहीं पाए इसी तरह एसडीएम और तहसीलदार पाली खुद आदिवासी समाज के अधिकारी भी जल्दबाजी में दुर्गाकोल की जमीन का कब्जा गैर आदिवासी को दिलाने के लिए इस भ्रष्टाचार को अनदेखा कर अपने स्वार्थ के तथाकथित कर्तव्यनिष्ठा के सहारे गैर आदिवासी समाज को आदिवासियों की जमीन लुटवा रहे हैं वह भी अपने आप में शोषण की एक नई कहानी है कि शासन की मंसा कि पेसा एक्ट लागू हो.. वह सिर्फ एक ढोंग और पाखंड है. विश्वविद्यालय अमरकंटक को इस पर अध्ययन करना चाहिए किंतु वहां भी जो गुरुघंटाल बैठे हैं वही दूध के धुले नहीं है… इसलिए पैसा एक्ट राष्ट्रपति के स्वयं शहडोल में आकर लागू करने के बाद दम तोड़ता हुआ दिखाई देता है..
पेसा एक्ट और शहडोल : जनजातियों के अधिकार कहाँ हैं…शहडोल क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के अधिसूचित क्षेत्रों में आता है। यहाँ पेसा एक्ट, 1996 लागू है। यह कानून ग्रामसभा को भूमि जल और जंगल पर अंतिम अधिकार देता है लेकिन हकीकत क्या है जनजातीयों की जमीनों पर प्रभावशाली लोगों का अवैध कब्ज़ा।प्रशासन और सरकार की चुप्पी।
कानून क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट ने समता बनाम आंध्र प्रदेश में कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि गैर-जनजातियों को नहीं दी जा सकती।संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा एक्ट ग्रामसभा को निर्णायक शक्ति देते हैं।
समाधान:
सामाजिक कार्यकर्ता बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष संदीप तिवारी कहते हैं सरकार और प्रशासन को जनजातीयों की जमीनें अवैध कब्ज़ों से मुक्त करनी होंगी पेसा एक्ट को केवल कानून न समझें धरातल पर लागू करें।ग्रामसभा को उनका संवैधानिक अंतिम अधिकार लौटाएँ।जब संविधान और सुप्रीम कोर्ट दोनों जनजातियों के पक्ष में खड़े हैं तब भी चुप्पी और अवैध कब्ज़ा कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है समय है कि शहडोल में न्याय और पेसा एक्ट की सच्ची ताकत दिखाई जाए।
अंतरराष्ट्रीयहिंदू परिषद के विधिक प्रमुख रमेश त्रिपाठी का कहना है जब तक राज नेताओं के द्वारा या फिर उन्हें प्रशासन चिन्हित करके स्वेच्छा से आदिवासियों की जमीन में माफिया गिरी खत्म नहीं करी जाती तब तकयह बातें हवा ही है और पेसा एक्ट को चाहे राष्ट्रपति आ जाएं तो भी लागू नहीं कराया जा सकता.


