
जब देश मे एक नई कॉकरोच जनता पार्टी का उदय हो रहा है, मजाक में ही सही, गंभीरता से इसके सदस्यों की संख्या बढ़ती जा रही है इसके मुद्दे, उन मुद्दों की जड़ हैं जो वर्तमान भारतीय सिस्टम में पैदा कर रखा है.. इससे इसकी लोकप्रियता भी बढ़ती जा रही है. यह वह दौर भी है जब भारत में करीब 2200 करोड रुपए का घूंस भारतीय उच्च अधिकारियों को ऊर्जा सप्लाई के मामले में बांटने के आरोप में अमेरिका के पूंजी निवेश कर्ताओं के द्वारा भारत के अघोषित तथाकथित राष्ट्रीय उद्योगपति गौतम अडानी और उसके भतीजे सागर अडानी पर अपराधी मुकदमा चल रहा हो और वह इस प्रस्तावित शर्त पर भी की सहमति पर सभी मुकदमों से बरी हो जाता है कि वह अमेरिका में 90000 करोड रुपए का पूंजी निवेश करेगा कि वह 15000 नौकरियां अमेरिका वालों के लिए सुनिश्चित करेगा आदि-आदि शर्तों की सहमति पर सिग्नेचर करके अमेरिका में उसे आरोपी से मुक्ति दे दी जाती है. एक प्रकार का समझौता होता है. ( त्रिलोकीनाथ )
तो क्या यह आर्थिक साम्राज्यवाद के उपनिवेश भारत को बनाए जाने की घोषणा नहीं है इस दौर में क्यों ना ऐसे उद्योगपतियों के अपराधों को इस सहमति के आधार पर की जो सहमति पर अमेरिका में 15000 नौकरियों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है यानी गारंटी दी गई है और लाखों करोड़ों रुपए कहीं से भी लूट कर अमेरिका में निवेश करने पर भी सहमति दी गई है… ऐसी सहमतियां भारत में इन फर्जी उद्योगपतियों से क्यों नहीं कराया जा सकता…. कुछ इसी प्रकार की सहमतियों के साथ भारत को अमेरिकी लोकतंत्र की तरह ही आर्थिक उपनिवेशवाद घोषित कर दिया जाए ताकि भारत के हित और युवाओं के रोजगार के हित सुनिश्चित हो सके.
अगर यही लोकतंत्र है तो अगर यौन अपराधी मृत हो चुके जैफ्री एपिस्टन की फाइल के जरिए ब्लैकमेल करके नेताओं को कुछ भारतीय हित हो सकते हैं तो क्यों नहीं किए जाने चाहिए…. ऐसे आखिर अमेरिका भी तो लोकतंत्र है और हम उधार के लोकतंत्र में जी रहे हैं ..हमारा लोकतंत्र 2014 में मरा तो नहीं, किंतु उसे खारिज कर दिया गया..तब जाकर 2014 में नए भारत की आजादी की घोषणा अप्रत्यक्ष रूप से कर दी गई है और इस आजादी में बोला तो कुछ जाता है और करा उसके ठीक विपरीत जाता है… इस प्रकार की आजादी में जब हम जी रहे हैं ऐसे में नागरिक अशांति इतनी ज्यादा है कि अगर कोई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बन जाए और वह सूर्यकांत शर्मा उस कुर्सी में बैठकर कुछ भी टिप्पणी कर दे.. आम नागरिकों के लिए और संघर्षरत समाज के लिए और परिणाम यह हो की मजाक में ही सही कोई “कॉकरोच जनता पार्टी” के जन्म हो जाए और वह गंभीर होते दिशा में चल पड़े तो क्या प्रश्न नहीं खड़े होते….?
उन लोगों से जिन लोगों ने भारत को “पत्रकारिता मुक्त भारत” बनाने के लिए कई दशकों तक का संघर्ष किया और पत्रकारिता के खांचे में अपने भांट बैठाए जो उनका गुणगान करते रहे क्योंकि वर्तमान भारत में पत्रकारिता का गोदी स्वरूप या गुलाम स्वरूप कुछ इसी प्रकार का है और यदि जो कोई पत्रकारिता कर भी रहा है जो तंत्र स्वतंत्रता के लिए काम भी कर रहा है उसे खारिज कर दिया जाए या उपहास किया जाए और परिस्थितियों इतनी खतरनाक बन जाए की बात तो “वैसधव कुटुंबकम” की हो किंतु वास्तव में जब भारत का प्रधानमंत्री नार्वे में जाए तो वहां भी वह चाहे कि जिस प्रकार से पत्रकारिता का गुलाम प्रेस उसने पैदा किया है वैसा ही उसे नार्वे में मिले और कोई मात्र 26 साल की लड़की पत्रकार सिर्फ एक चलते-चलते प्रश्न पर उत्तर चाहे… प्रधानमंत्री से और प्रधानमंत्री उत्तर ना दे इसके बावजूद पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों को उत्तर मिल जाए… तब तो प्रश्न उठता ही है कि इसका समाधान कहां है …?
आखिर उत्तर, प्रश्न क्यों खोज रहा है, और प्रश्न , उत्तर को प्रमाणित कर रहा है… वह उत्तर क्यों नहीं मिल रहा है इस दौर में “पत्रकारिता मुक्त भारत” के कल्पनाकारों मैं एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखिया मोहन भागवत जब शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में प्रवास में हो तब उनसे यह उत्तर अपेक्षित होना ही चाहिए लेकिन उनके जीवन शैली में पत्रकारिता का कोई स्थान नहीं है इसलिए उनसे प्रश्न कौन पूछने जाए या कहें कि बिल्ली की गले में घंटी बांधने कौन जाए या फिर वह दिखावे का ही सही अपने अभ्यास वर्ग में पत्रकारों को बुलाते हैं उस पर ही यह धोखे से कोई प्रश्न कर दे तो क्या उनसे उत्तर की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए..?
यह प्रश्न भी बनता है कि भारत के प्रधानमंत्री इतने कमजोर क्यों हैं, की एक 26 साल की युवा पत्रकार के प्रश्न से भागते और छुपते देखे गए हैं और दुनिया में हो रही है उस चर्चा को छुपाने के लिए इटली के राष्ट्रपति जॉर्जिया मेलोडी के साथ किसी युवा तुर्क की तरह चॉकलेट देते हुए जो ठिठोली कर रहे हैं क्या वह आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है भारत के साथ अपमानजनक नहीं है..? या यह क्या संदेश देता है इसका प्रश्न भी मोहन भागवत से क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए….? यह अलग बात है कि मोहन भागवत कृपा करके यह भागवत ज्ञान देंगे या नहीं वैसे भी आदिवासी क्षेत्र लूट और डकैती का अड्डा है इसलिए ऐसे प्रश्न खड़े तो जरूर होते हैं किंतु जवाब जरुरी नहीं है
अन्यथा मोहन भागवत की डिक्शनरी में इन प्रश्नों को कोई जगह भी है… सहज रूप से स्वीकार नहीं है… बहरहाल प्रश्न तो एक और भी है जो मोहन भागवत सिर्फ यही दे सकते हैं क्योंकि वह यहां पर जिंदा भी हैं और अनुभव भी कर सकते हैं कि क्या वास्तव में भारत में हिंदू मंदिरों के साथ उनकी विचारधारा हिंदुओं के हित में है…? या फिर नहीं…? क्योंकि शहडोल का मोहन राम मंदिर,मोहन राम पांडे के द्वारा निर्मित निजी मंदिर है जिसे समिति को सोपा गया था और वह बाद में ट्रस्ट के रूप में गठित हो गई जो आगे चलकर रघुनाथ जी राम जानकी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर ट्रस्ट कहलाया. शुरू से जनसंघ के लोग और अब भाजपा के लोग भी जो मूल रूप से स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से होना घोषित करते हैं उन्होंने मंदिर के अहित के लिए काम किया अब जबकि 2012 में हाईकोर्ट ने इसके निराकरण तक के लिए एक स्वतंत्र कमेटी का गठन किया है तो उसमें मोहन भागवत के आर एस रस और भारतीय जनता पार्टी या उसकी सत्ता के दबाव में मंदिर में हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कराया जा रहा है, हाईकोर्ट के आदेश को जूती में रौंदा जा रहा है तो क्या मोहन भागवत या आरएसएस इस मंदिर के अहित के लिए समर्पित है..? वह इस मोहन राम मंदिर को स्वतंत्र रूप से धार्मिक आस्था का केंद्र क्यों नहीं बनने देना चाहती…? या फिर उसकी नीयत इस मंदिर को लेकर खराब है कि वह इस पर कैसे कब्ज़ा करें …? इसका रास्ता उन्हें नहीं मिल रहा है, इसलिए वह इस मंदिर और उससे जुड़ी तमाम आरजी को या तो सिंधियों को या मुसलमान को देने के लिए तत्पर दिखाई देती है… क्योंकि जमीनी हकीकत यही बता रही है. तो क्या मोहन भागवत अपने प्रवास के दौरान इस मोहन राम मंदिर को बचाने और उसे स्वतंत्र रूप से धार्मिक होने के लिए और अपने संस्था के जीवित होने का संदेश देंगे…, यह करके की हाई कोर्ट के आदेश का 14 साल बाद पालन क्यों नहीं कराया जाता आखिर कौन इस मंदिर की आराजी को पाकिस्तान से आए सिंधियों को या मुसलमान को कब्ज करवाना चाहता है. क्या ..यह भी आर्थिक साम्राज्यवाद के विस्तार का धार्मिक संस्करण नहीं है…? की जो कुछ भी हो उसमें पूंजीवादी अपराधियों का कब्जा हो… इसलिए भी प्रश्न उठता है कि क्या मोहन भागवत अपने होने का एहसास शहडोल को कर पाएंगे या फिर अपने सुनिश्चित या फिर दिए गए टारगेट को पूरा करने के लिए शहडोल आदिवासी क्षेत्र में अपने अभ्यास वर्ग के लक्ष्य को सीमित रखेंगे. भारतीय समाज में हिंदुओं की दुर्दशा के लिए यदि इस प्रकार से आंख मूंदा जाएगा तो क्या हिंदुत्व एक “ट्रेडमार्क” है जिसके जरिए भारतीय ताना-बाना को तबाह किया जा रहा है… नहीं समझ जाना चाहिए…, क्या ऐसे प्रश्न का उत्तर मोहन भागवत शहडोल की जमीन पर देकर कोई संदेश देना चाहेंगे या फिर वह भी किसी अज्ञात टूल-किट की भांति शहडोल प्रवास स्थानीय हितों में निरर्थक साबित करेंगे …
हम पत्रकार हैं इसलिए प्रश्न करते हैं और प्रश्न करना हमारी जिम्मेदारी है यह जानते हुए कि आप प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे यह आपके डीएनए में नहीं है… हम प्रश्न करते रहेंगे… यही उस 26 साल की लड़की ने नार्वे में भारतीय प्रधानमंत्री को प्रश्न किया था. यही पत्रकारिता है. क्या शहडोल की पत्रकारिता मोहन भागवत को इस रूप में कुछ पूछेगी या फिर वह बेहतरीन गुलाम होने के लिए तत्पर है …यह भी एक प्रश्न है…? इसलिए हम प्रश्न ही करते हैं और प्रश्न ही पत्रकारिता है… ताकि लोकहित का निष्कर्ष निकलता रहे अगर मौका लगा तो मैं जरूर मोहन भागवत जी से इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहूंगा बावजूद इसके कि मैं जानता हूं की कोई तानाशाह है ऐसे प्रश्न का जवाब नहीं देता… किंतु मोहन भागवत हाफ पेंट से फुल पैंट तक आरएसएस को लेकर आए हैं इसलिए उनसे प्रश्न की अपेक्षा भी हमारी जिंदा है शायद स्वतंत्रता के नजरिया में बदलाव हो गया हो… वंदे मातरम।

