
पत्रकार उत्सवों में उपमुख्यमंत्री का उपस्थित होना लाभदाई होता है बसर्ते..?
अमरकंटक में पत्रकारों के संगठन का ऐसा ही बड़ा कार्यक्रम तब हुआ था और महत्वपूर्ण नेता भी वहां आए थे, ऐसे कार्यक्रम को पत्रकार उत्सव के रूप में कह सकते हैं जैसा आज शहडोल में श्रमजीवी पत्रकार संगठन के बैनर के तले प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला की उपस्थिति में होना है। ऐसे कार्यक्रम से पत्रकार समाज में उत्साह का संचार होता है इसमें कोई शक नहीं किंतु पत्रकारिता सामान्य सामाजिक संगठन नहीं है लोकतंत्र का विशिष्ट दायित्व संभालने वाला चौथा स्तंभ का दंभ भरने वाला संगठन होता है। यह अलग बात है कि ज्यादातर श्रम के जरिए पत्रकारिता में काम करने वाले तमाम कर्मचारियों का यह संघ, जिसे श्रम संघ के तहत रजिस्टर्ड होकर भारत के प्रति कर्तव्य निष्ठ होना चाहिए। देश की आजादी में पत्रकारिता की जो भूमिका रही आजादी के बाद वह भूमिका अप्रत्यक्ष रूप में तीन स्तंभों ने पूंजी पतियों के हवाले कर दी गयी। उसे स्वतंत्र रहने का अधिकार धीरे-धीरे खत्म होता चला गया वर्तमान मोदी सरकार के कार्यकाल में अब यह पारदर्शी तरीके से दिखने लगा है… कि पत्रकारिता श्रम संघ की तरह कार्य करने की बजाय सामाजिक संगठन जिस गैर सरकारी संगठन भी कहा जाता है जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सैकड़ोसंख्या में बना रखे हैं उसमें से कुछ रजिस्टर्ड हैं और बाकी जय श्री राम के भरोसे चल रहे हैं। गैर पंजीकृत सामाजिक संगठन होने का दंभ भरने वाली राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ पर हाल में कर्नाटक के गृहमंत्री ने इसे पंजीकृत होने का दवाब बनाया है वह कितने सफल होते हैं यह भविष्य बताएगा।
हम बात कर रहे थे पत्रकारिता की स्थिति की जो श्रम संघ में रजिस्टर्ड ना होकर सोसाइटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड होते हैं और उसका कानूनी दायित्व सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सलाह के रूप में भलाई हो कानून के रूप में लगभग शून्य है। मुझे नहीं मालूम की श्रमजीवी पत्रकार संगठन किसके तहत पंजीकृत है। किंतु जब मैं पहली बार 90 के दशक में सदस्य बनकर उत्साहित हुआ था तब हमारे नेता सलभ भदौरिया एमएलए रेस्ट हाउस भोपाल के बगल में स्थित पत्रकार भवन में दखल रखते थे। फिर भाजपा सत्ता में आई और पत्रकार भवन टुकड़े टुकड़े हो गया। अब कुछ चल रहा है इडिया-मीडिया जैसी चीज, किंतु उसका लाभ तीन दशक होने को आए हमारे समाज में कुछ नहीं आया. पत्रकारों की हितों को सुनिश्चितता होती नहीं देखी गई। परिणाम स्वरूप आज भी सरकारी चपरासी के बराबर की वेतन पाने के लिए पत्रकार मोहताज है। कुछ लोगों को मिलता था, अब आउटसोर्स का जमाना आ गया है इसलिए भलाई किसी बड़े बैनर में कोई पत्रकार काम करता हो किंतु दर असल वह एक नए प्रकार की बंधुआ मजदूरी के रूप में आउटसोर्स होता है। यह तो हो गई पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति की एक झलक …
जिस संदर्भ में लेख रहा था वह भटक न जाऊं इसलिए अमरकंटक में जब कई पत्रकार साथी सम्मानित होकर खुश हो रहे थे तब मैं दिल्ली में था लौट कर आया अपने लोगो को बधाई वगैरा भी दिया किंतु उनसे एक प्रश्न जरूर मैंने किया की इतना बड़ा उत्सव पत्रकारों का हुआ क्या उन्होंने उस उत्सव में भारत के महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने अतिथि जिम्मेदार राजनेताओं से प्रश्न किया…? उस समय जो सबसे बड़ा मुद्दा होता था उसमें लद्दाख में चल रहे सोनम वांगचुक के आमरण अनशन विध्वंस तरीके से खत्म करने के लिए उनके ही चार समर्थकों कि वहां की पुलिस ने हत्या कर दी थी, जिसे हिंसा की परिणिति बताई गई थी और बाद में आतंकवाद से मिले होने के आरोप लगाकर को गैर कानूनी तरीके से आंदोलन के नेता पर्यावरण वैज्ञानिक सोनम वांग चुकको लद्दाख में गिरफ्तार कर हजार किलोमीटर दूर बिल्कुल विपरीत तापमान वाले राजस्थान के जेल में डाल दिया गया। जहां वह करीब 3 महीने रहे फिर सरकार ने शायद शर्म खाकर उन्हें छोड़ दिया। इसी तरह जातिगत हिंसक स्थिति में जल रहे मणिपुर का मुद्दा भी चर्चा युग था किंतु अमरकंटक में जब श्रमजीवी संगठन उत्सव मना रहा था उन्होंने इस पर कोई मंथन नहीं किया और ना ही कोई संदेश उस पत्रकार सम्मेलन से निकलने दिया। उसने बड़े नेता शामिल हुए थे शायद वह पत्रकार उत्सव ध्यान भटकाने के लिए एक सफल आयोजन था। पत्रकारों को उनसे पूछा जाना चाहिए की पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्र में जब आप पत्रकार उत्सव मना रहे हैं तो पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्र के आदिवासी क्षेत्र के वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को गैर कानूनी हिरासत में क्यों रखा गया…?
यह संयोग ही है फिर इस बार जब शहडोल में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला पत्रकार उत्सव में आ रहे हैं तो क्या पत्रकार जो स्वयं संविधान के पांचवी अनुसूची में अनुसूचित शहडोल जिले के पत्रकार हैं उनका इतना बड़ा संख्या बल यह पूछ पाएगा कि आखिर आदिवासी क्षेत्र के वैज्ञानिक सोनम वांगचुक जिन्हें आज 19 दिन बिना भोजन के 59 वर्ष की उम्र में आमरण अनशन करना पड़ रहा है उनकी जायज मांग के मामले में उपमुख्यमंत्री क्या सोचते हैं..? खुद छात्र नेता रहे राजेंद्र शुक्ला क्या शिक्षा को और परीक्षा को गंभीर विषय मानते हैं..? और अगर वह शिक्षा पर गंभीर हैं तो सबसे ज्यादा भारत में हो रही परीक्षाओं में पेपर लीक हो जाने के मामले में यदि सोनम वांगचुक के नेतृत्व में कोई सामाजिक संगठन आक्रोश के रूप में ही सही देश के शिक्षा मंत्री की कर्तव्य हीनता के लिए और उसके फेल हो जाने की स्थिति पर उसे इस्तीफा मांग रहा है तो उन्हें इस्तीफा क्यों नहीं देना चाहिए…? क्या भारतीय जनता पार्टी के अंदर एक भी ऐसा योग्य नेता नहीं है जो शिक्षा जैसे गंभीर विषय में मंत्री बनाया जा सके या फिर इस धूर्त धर्मेंद्र प्रधान को बचाना ही सरकार की नाक का सवाल हो गया है…? इसी तरह स्वयं सोनम वांगचुक का वह मुद्दा जो लंबित है जिसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में लद्दाख को पर्यावरण संरक्षण की दृष्टिकोण में संविधान की पांचवी अनुसूची से हटाकर छठवीं अनुसूची में विशेष आदिवासी प्रक्षेत्र बनाने में जो वादा किया था वह क्यों नहीं निभा रहे हैं..? क्या इसलिए की आदिवासी क्षेत्र के साथ प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट पूंजी पतियों के द्वारा अवरोधित हो जाएगी या पारदर्शी तरीके से उन्हें प्राकृतिक संसाधनों खनिज संसाधनों को निकलना होगा ऐसे कई गंभीर विषय है जिस पर शहडोल का श्रमजीवी पत्रकार संगठन के इस बड़े सम्मेलन में प्रश्न उठाए जा सकते हैं… और उत्तर जैसे वर्तमान में अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरों की जमात का मामला भी लिए जा सकते हैं।
कहां जा सकता है कि मैं यह काम क्यों नहीं कर सकता इसलिए भी कि मुझे इस संगठन के द्वारा कोई निमंत्रण नहीं मिला है.. और इसलिए भी कि अगर निमंत्रण मिला होता तो मैं विधायक शबनम मौसी की तरह वहां पर ताली बजाने के अलावा क्या कर लेता… वहां नहीं जा पाता क्योंकि पत्रकारिता की जमीर मुझे इसकी इजाजत नहीं देती. जहां मैं प्रश्न नहीं कर सकता वहां मुझे क्यों होना चाहिए..? और भी संगठन है उस भीड़ का हिस्सा क्यों नहीं हो सकता..?
किंतु यह प्रश्न इस पत्रकार उत्सव में सैकड़ो की संख्या में पत्रकार जमात का नाम लेने वाले लोगों के लिए छोड़ता हूं कि वह उपमुख्यमंत्री और शहडोल के प्रभारी मंत्री से यह प्रश्न अवश्य करें की शहडोल संभाग मुख्यालय का सर्वाधिक बड़ा 300 वर्ष पुराना टांकी जो हमें देश की आजादी के वक्त विरासत में मिला था उसे पर भू माफिया कब्जा करके उसे नष्ट करने में क्यों आमादा है आखिर रीवा राज अधिनियम में ही जल स्रोतों पर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करने की बात कही गई है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव जल गंगा संवर्धन अभियान में जल संरक्षण को बढ़ाने के लिए कटिबद्ध हैं बावजूद उसके शहडोल से मुश्किल से 5 किलोमीटर के दूरी में स्थित करीब 200 एकड़ का यह सर्वाधिक बड़ा जल स्रोत टुकड़े-टुकड़े में भू माफियाओं के द्वारा खरीदा और बेचा जा रहा है हाल में उसके मेड तोड़ने का प्रयास का आरोप खुद भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष रहे कमल प्रताप के ऊपर लगा है।
अब जब स्थिति स्पष्ट हो रही है कि वह पारदर्शी तरीके से सोहागपुर थाना के पीछे स्थित वह बांध है तो क्या सोहागपुर थाना की पुलिस कि यह जिम्मेदारी नहीं है की बांध की रक्षा हो सके, उसे कोई तोड़ने ना पावे.. और जब सोहागपुर थाना की पूरी पुलिस उसकी रक्षा नहीं कर पाती है तो पुलिस उसमें शामिल दिखाई देती है। ऐसा क्यों न समझा जाए या फिर आखिर किसकी सह पर इस 300 साल पुराने सर्वाधिक बड़े जल स्रोत क्षेत्र की क्रय विक्रय रजिस्टर शहडोल में कर रहा है आखिर इसी प्रकार के बांधों के निर्माण के लिए सरकार को जमीन अधिग्रहण करना पड़ता है तो क्या इस जल क्षेत्र पर क्रय विक्रय पर में रोक लगाकर उप मुख्यमंत्री और शहडोल के प्रभारी मंत्री अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करेंगे…? यह प्रश्न क्या पत्रकारों की जमात में कोई उनसे कर सकता है..? यह पत्रकार उत्सव में हमें एक बड़ा संदेश दे सकता है. अन्यथा यह समझा जाएगा कि पत्रकारों के दिमाग को मुद्दों से भटकाने के लिए भी ऐसे पत्रकार संगठन का उपयोग हो रहा है जैसा कि अमरकंटक में अवसर चूक गया वर्तमान में उसे पर प्रायश्चित क्यों नहीं किया जाना चाहिए, और हम जब आदिवासी क्षेत्र के लोग आदिवासी वैज्ञानिक सोनम वांगचुक के आमरण अनशन पर इन उत्सवों से कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाते तो प्रश्न तो उठता ही है की फिर ऐसे भीड़ तंत्र में हमारी क्या उपयोगिता है…? बहरहाल पत्रकार उत्सव से हटकर जब उपमुख्यमंत्री जी अपने प्रभारी जिले में भाजपा के द्वारा बनाए गए समानांतर प्रशासनिक संगठन की बैठक लेंगे तो क्या स्वयं संज्ञान लेकर भी कम से कम शहडोल के जल स्रोतों की रक्षा की सुनिश्चित करने के लिए टांकी बांध की सुरक्षा सुनिश्चित कर उसके जल क्षेत्र में क्रय विक्रय पर रोक लगाने का आदेश पारित करेंगे…? या फिर जो उससे प्रभावित हैं उन्हें मुआवजा देकर जल स्रोत क्षेत्र बढ़ाने का काम करेंगे..। इसका भी हमें पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी या फिर कोई समानांतर प्रशासनिक संगठन के सदस्य टांकी बांध की रक्षा के लिए अपने मस्तिष्क और ज्ञान का उपयोग करेंगे उसे बैठक में जिसमें उपमुख्यमंत्री निर्णयात्मक कदम उठा सकते हैं प्रतीक्षा रहेगी…?

