सोहागपुर से निकली चौथी रथ-यात्रा …क्या धर्म का धंधा बन रहा है शहडोल में रथ-यात्रा…? ( त्रिलोकी नाथ)

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          भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल मुख्यालय में इस बार चौथी रथ यात्रा प्रारंभ हुई सोहागपुर में… शहडोल में सबसे पहले रथ यात्रा का आयोजन स्व. मोहन राम पांडे के द्वारा मोहन राम मंदिर से निकालने की परंपरा प्रारंभ हुई थी और फिर वह की पहचान बनती गई पूरे क्षेत्र में लोगों की धार्मिक आस्था आध्यात्मिक जागरण का उत्सव जो पूरी के जगन्नाथ रथ यात्रा में होता था उसे इस ग्रामीण अंचल मनाया जाने लगा बात कोई 100 साल पहले की है। शहडोल का विकास हुआ, जिला मुख्यालय बना रेलवे स्टेशन आया रेलवे स्टेशन में उड़िया समाज के लोग ज्यादा रहते थे उन्होंने अपना जगन्नाथ मंदिर भी बनाया और वहां पर रथ यात्रा का आयोजन करना प्रारंभ किया दूसरी रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ हुई। चार-पांच साल से अंतर्राष्ट्रीय कृष्णा भावना अमृत संघ इस्कॉन ने किराए की मकान में अपनी सांकेतिक मंदिर बने और हरे कृष्णा हरे राम के महामंत्र के प्रचार-प्रसार के लिए बतौर संगठन रथ यात्रा प्रारंभ किया।        ( त्रिलोकी नाथ)
इस बार 2026 में खबर मिल रही है की हजार साल पुराना सोहागपुर गांव जो कभी सोहागपुर स्टेट का मुख्यालय हुआ करता था वर्तमान में शहडोल नगर का हिस्सा है वहां की राम जानकी मंदिर से एक रथ यात्रा प्रारंभ की गई है जो शहडोल नगर की चौथी रथ यात्रा होगी।
मेरे मौसिया जी जो विजयराघवगढ़ क्षेत्र के आध्यात्मिक गुरु हैं वह कहते थे कि हम नहीं जानते की रथ यात्रा जगन्नाथ जी की ही क्यों होती है तो जानने की जरूरत भी नहीं है बस रस्सी पकड़ो और खींचे जाओ.. यही परंपरा है यही रथ यात्रा है.. जो सिर्फ भगवान जगन्नाथ जी के मामले में होती चली आई है पुरी में. लोगों ने अपनी पहुंच के हिसाब से उसे नजदीक किया…
        किंतु राम मंदिर आंदोलन के पहले से ही रथ यात्राओं का दुरुपयोग होने लगा लालकृष्ण आडवाणी निकली तो लग्जरी वाहन में थे और उसका नाम रथ यात्रा दिया यह उनका धंधा था धार्मिक रथ यात्रा की भावनाओं का अंत अयोध्या में एक विध्वंसक परिणाम में सामने आया। परिणीति राम मंदिर निर्माण के रूप में हुई और निष्कर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े व्यक्तियों ने जो राम मंदिर की धार्मिक पहचान का उपयोग करके अपने एजेंट उनके समर्पित पवित्र कार्य कर्ताओं, एजेंट (प्रतिनिधि) वहां की अरबो रुपए की मंदिर में कब्जा करके बैठा दिया और रुपए पूरी पारदर्शिता के साथ भ्रष्टाचार बेईमानी को अंजाम दे रहे हैं क्योंकि वे संत नहीं है जो भी संत उससे जुड़े हैं उनका इस राम मंदिर में नकाब की तरह उपयोग हो रहा है। कुछ तो गोविंद गिरी जैसे भगवाधारी लोग हैं जो कोषाध्यक्ष तो हैं किंतु पारदर्शी तरीके से कहते हैं मेरा कोष पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था और मैं बेईमान नहीं…? परिणाम स्वरूप अभी एक दसक भी नहीं हुआ सब चोर साबित हो रहे हैं प्रधानमंत्री कार्यालय में मुख्य अधिकारी रहे राम मंदिर के वर्तमान न्यासी नृपेंद्र मिश्रा ने तो राम मंदिर चंदा चढ़ावा चोरी को डकैती की संज्ञा दी है, तो क्या यह एजेंट डकैत थे…? पता नहीं इसका खुलासा होगा या नहीं, यह भविष्य की बात है।
किंतु धार्मिक प्रतीक और केंद्र कर राजनीतिक उपयोग धर्म को बदनाम करता है उसे पतित करता है क्योंकि धर्म आस्था मूल रूप से उसे विषय वस्तु की आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक होता है जिसमें वह सुख का अनुभव करता है किंतु व्यवहारिक विषय वस्तु और अध्यात्मिक विषय वस्तु में बहुत महीन लकीर होती है जिसे तलाश करने में करोड़ों में कोई एक सफल हो पता है ऐसा श्री कृष्णा ने गीता जी में उपदेश किया है। यह आध्यात्म और धर्म की महसूस करने की ताकत होती है।
इन्हीं धार्मिक केंद्र, प्रतीक शब्दों राजनीतिक दुरुपयोग होने लगता है तो वह एक खतरनाक परिणाम देती है यह हाल में हमने अयोध्या के राम मंदिर की परिणिति में देखा है जो निष्कर्ष के लिएअभी लंबा खींचेगा। क्योंकि अब यह विषय वस्तु “राक्षस के जान तोते में है…” के समान हो चला है।
तो हम चर्चा कर रहे थे शहडोल में चौथी जगन्नाथ स्वामी के रथ यात्रा की, पता नहीं और कितनी रथ यात्राएं कहां-कहां निकलेंगे और उससे उसकी आध्यात्मिक और धार्मिक स्थिति पर क्या परिणाम आएगा किंतु एक बैनर इन दोनों जोर से घूम रहा है जिसमें शहडोल के इस्कॉन मंदिर के लोगों ने जारी किया है जिसमें कोई 26 तारीख को रथ यात्रा जय स्तंभ से प्रारंभ होकर किसी पेट्रोल पंप तक जाएगी  इस बैनर में नरेंद्र मोदी और मोहन यादव की फोटो है इससे लगता है कि यह एक प्रायोजित रथ यात्रा है जिसका राजनीतिक हित में उपयोग होना है ताकि वास्तविक मुद्दे भटकते रहे मुद्दे क्या है स्थानीय मुद्दे क्या है इसकी चर्चा हम भविष्य करेंगे किंतु इतना समझना शायद पर्याप्त होगा अब रथ यात्राएं “धर्म का धंधा” हो गई है और आम आदमी को इस “धर्म के धंधे” से दूरी बनानी क्यों नहीं चाहिए…?
तब और क्यों नहीं जब इसे किसी कारपोरेट उद्योगपति या राजनीतिक उद्देश्य के लिए उपयोग किया जा रहा हो इससे हमारी अध्यात्मिक ऊर्जा का क्षरण और भटकाओ पैदा हो जाएगा। जबकि वास्तव में धर्म क्या है इस समय एकमात्र दिखने वाले दुनिया के संत वृंदावन के प्रेमानंद न सिर्फ बताते हैं बल्कि स्वतः प्रमाणित हैं। इसलिए जन्माष्टमी को सतर्क हो जाना चाहिए अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने आध्यात्मिक की रक्षा के लिए की कोई धर्म का धंधे बाज आपका अमंगल कर रहा है… रही रथ यात्राओं की बात इस समय रोज कोई ना कोई रथ यात्रा किसी ने किसी भगवान की या इंसान की निकलती रहती है और धीरे-धीरे”रथ यात्रा” शब्द अपनी आध्यात्मिक आस्था खोता जा रहा है…. इसमें कोई शक नहीं…
                                                                                ( त्रिलोकी नाथ )

 


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