
“निर्वाचन आयोग का रस-महोत्सव: जहाँ भारत रत्न भी गिड़गिड़ाएँ तो भी ज्ञान हँसता रहे”
वह मंजर कितना अच्छा या खराब होता जैसे जंतर -मंतर में हमारे प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और तमाम शीर्षास्त्र विधायक व ब्यूरोक्रेट्स ,न्यायपालिका के नाक के नीचे बच्चों को मारा जा रहा था बालिकाओं को अपमानित किया जा रहा था बस वह नहीं किया जा रहा था जो मणिपुर में महिलाओं को जुलूस बनाकर किया जा रहा था.. कुछ ऐसा ही वीभत्स और खतरनाक घृणा के रस का आस्वादन हम मनुष्यों को देखने को मिलता जब भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी स्वयं अपनी बूढ़ी और थकी हुई आंखों से जर्जर शरीर की जीवित लाश को लिए कुछ कागजों और दस्तावेज को संभाले हुए यह बताने के लिए किसी बीएलओ य निर्वाचन कर्मचारी के पास जाते और गिड़गिड़ाते कि मैं भारत का उप प्रधानमंत्री रह चुका हूं मुझे लौह पुरुष की उपमा दी जाती थी मैं पाकिस्तान से आया जरूर हूं लेकिन पाकिस्तान नहीं हूं, मैं पाकिस्तान के उस प्रांत का हिस्सा नहीं हूं जहां बांग्लादेश बन गया है मैं रोहिंग्या ,पाकिस्तान सिंधी भी नहीं हूं और निर्वाचन आयोग का ज्ञानेश ठहाका मारकर अपने ज्ञान को प्रकट कर कहता की चुपचाप खड़े रहो जब तुम्हारा नंबर आएगा तो देखेंगे…
(त्रिलोकी नाथ)
कभी-कभी लगता है कि भारतीय लोकतंत्र अब केवल वोट की नहीं, बल्कि “रस” की भी लोकतंत्र है। प्राचीन आचार्यों ने नौ रसों की सूची बनाई थी—श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत। लेकिन हमारे वर्तमान महान निर्वाचन आयोग ने सिद्ध कर दिया है कि दसवाँ रस भी होता है—“वीआईपी-रस”। इसमें स्थायी भाव है—“हमारे लोग तो स्वतः जुड़ जाएँगे, बाकी खड़े रहो।”
कल्पना कीजिए वह मंजर। जंतर-मंतर पर नहीं, बल्कि किसी ब्लॉक लेवल ऑफिसर के छोटे से कमरे में। भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी जी अपने जर्जर शरीर और थकी आँखों के साथ कुछ पुराने दस्तावेज़ संभाले खड़े हैं। सामने ज्ञानेश कुमार जी का ज्ञान हँस रहा है—“चुपचाप नंबर का इंतज़ार करो। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है जाँच होगी।” बगल में पूर्व उपराष्ट्रपति, पूर्व सेना प्रमुख, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और तमाम एक-वोट वाले महान जीव गिड़गिड़ा रहे हैं—“हम पाकिस्तान से नहीं आए, रोहिंग्या नहीं हैं, सिंधी भी नहीं… हमें मतदाता सूची में डाल दो!” और पूरी दुनिया टीवी पर देख रही है। 140 करोड़ लोग एक साथ करुण, वीभत्स, हास्य और रौद्र रस का आनंद ले रहे हैं। यह वर्ल्ड रिकॉर्ड बनता। लेकिन नहीं बना। क्यों? क्योंकि अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को प्राथमिकता से वापस सूची में डालने की प्रक्रिया “स्वतः” चालू हो गई। कंप्यूटर सिस्टम ने रेखा गुप्ता जी का नाम खुद जोड़ लिया। पश्चिम बंगाल के लाखों लोगों के आवेदन विशेष ट्रिब्यूनल में पड़े सड़ रहे हैं—उनके लिए सिस्टम की कृपा नहीं उतरी।
यही तो पारदर्शिता है न! नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री जी की माँ ने दो हज़ार रुपये के लिए बैंक के सामने लाइन लगाई थी। वह आम नागरिक की तरह नागरिकता सिद्ध कर रही थीं। क्या वह स्क्रिप्टेड फिल्म थी? अगर थी, तो आज के महान कलाकारों—आडवाणी जी, धनखड़ जी, रेखा जी—को भी उसी लाइन में खड़ा करके क्यों नहीं दिखाया गया? कम से कम जनता को “करुण रस” का पूरा स्वाद तो मिल जाता। लेकिन नहीं। शाह साहब ने जो तय कर लिया, ज्ञानेश साहब ने जो सुनिश्चित कर लिया—वही सफलता की गारंटी है। प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्। सब दिख रहा है।
आयोग कहता है—“नागरिकता सिद्ध करो।” ठीक है। लेकिन सिद्ध करने का तरीका अलग-अलग है। आम आदमी के लिए ट्रिब्यूनल, नोटिस, जाँच, अस्वीकृति। वीआईपी के लिए “सिस्टम ने स्वतः जोड़ लिया।” दिल्ली की मुख्यमंत्री को नागरिकता सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं पड़ी, लेकिन बंगाल के उन लाखों लोगों को पड़ी। आश्चर्य नहीं कि भाजपा इसे “पारदर्शी सफलता” मानती है और अन्य पार्टियों की तरह विरोध नहीं करती। विरोध करना तो नकारात्मक रस है। आयोग तो हमें सकारात्मक रस खिला रहा है—मुफ़्त में, पाँच किलो राशन के साथ।
देश की 80 करोड़ जनता राशन के साथ-साथ ये सभी रस एक साथ महसूस कर रही है। हास्य जब वीआईपी सूची में वापस आ जाते हैं। करुण जब आम आदमी लाइन में खड़ा रहता है। वीभत्स जब याद आता है कि मणिपुर जैसी घटनाओं के बीच भी सिस्टम चुपचाप काम करता रहता है। और शांत रस तब, जब हमें समझाया जाता है—“अगली बार वोट दे देना। इस बार नहीं तो क्या फर्क पड़ता है?”सवाल यह नहीं कि आडवाणी जी का एक वोट कितना कीमती है। सवाल यह है कि अगर एक वोट का अधिकार सबके लिए समान है, तो तकलीफ़ भी समान क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर प्रधानमंत्री की माँ लाइन में लग सकती हैं, तो भारत रत्न क्यों नहीं लग सकते? या फिर यह मान लिया जाए कि कुछ लोग “सिस्टम” से ऊपर हैं और कुछ लोग सिस्टम के नीचे।
फिलहाल तो यही लगता है कि हम वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने से चूक गए। आम आदमी के आँसू और वीआईपी के स्वतः-समावेश का यह महाकाव्य अधूरा रह गया। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। अगली बार जब SIR फिर आएगा, तब शायद कोई और भारत रत्न गिड़गिड़ाएगा। तब तक जनता रसों का आनंद लेती रहे—मुफ़्त में, पाँच किलो के साथ। और हाँ, न्यायपालिका पर भरोसा रखो। वह न्याय देगा। कब? जब नंबर आएगा।

