मामला निर्वाचन आयोग का हो या मोहन राम मंदिर का; न्यायालय में दाखिल शपथ में हमेशा सच होता है..? ( त्रिलोकी नाथ)

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न्यायपालिका की स्वतन्त्रता | भारतीय धरोहर  करीब एक महीने से सक्रिय घमासान निर्वाचन प्रक्रिया के तथाकथित भ्रष्टाचार को लेकर चल रहा है मामला राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया इसके बावजूद भी रोमांच कारी आश्वासन मिलता नहीं दिखाई देता क्योंकि निर्वाचन आयोग कल जो सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर अपनी बात रखी है उसमें उन्होंने  चालाकी से दावा किया है कि उन्होंने कोई हेरा फेरी नहीं की और कानून का पालन किया है।शहडोल में एक मामले में एक परिवार के तीन वोट जो पारदर्शी रूप से कांग्रेस के लिए कमिटेड थे विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची से उसे वक्त गायब मिले जब परिवार वोट डालने गया, हो हंगामा के बाद तत्कालीन निर्वाचन अधिकारी वंदना बैद्द  ने जांच करने का आश्वासन दिया जांच भी हुई और पाया गया कि भाजपा के एक नेता के झूठ के आधार पर तीनों वोट संबंधित बीएलओ ने काट दिया और फिर बाद में इस स्थान पर जोड़ दिया पूरी ईमानदारी के साथ, कोई दंडित नहीं हुआ। बस कांग्रेस के तीन वोट कांग्रेस को नहीं मिले और चुनाव हो गया।सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग इसी प्रकार की ईमानदारी का शपथ तैयार किया है।, तो अंजामे गुलिस्ता क्या होगा…? न्यायपालिका के इस मुकदमे के फल पकने और उसके टूट के गिर जाने का इंतजार करिए….

                                                                ( त्रिलोकी नाथ)

शहडोल का एक और चर्चित मोहन राम मंदिर ट्रस्ट मामला इसी ईमानदारी के साथ सामने आया है। जहां चोरी और सीना  पूरी पारदर्शिता के साथ उच्च न्यायालय में नचनिया की तरह नाच कर रही है। मनोरंजन है, हो रहा है….थोड़ी सी इस घटना का प्रकाश भी जानना जरूरी है हाईकोर्ट के प्रकरण एफ ए-177 / 12 मोहन राम मंदिर मामले में पूर्व ट्रस्टी श्रवण गुप्ता वगैरा बनाम तत्कालीन ट्रस्टी रोहिणी प्रपन्नाचार्य वगैरह को अपदस्त करते हुए श्री रघुनाथ जी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर ट्रस्ट शहडोल का संपूर्ण प्रभार 28-11-12 में उच्च न्यायालय ने एसडीएम सोहागपुर के द्वारा बनाई गई स्वतंत्र कमेटी को प्रबंधन के लिए देने का आदेश पारित किया, जब तक हाईकोर्ट के प्रकरण का निराकरण नहीं हो जाता तब तक मंदिर ट्रस्ट की प्रबंधन की संपूर्ण जिम्मेदारी अद्यतन स्वतंत्र कमेटी के सदस्य में वर्तमान में रमेश त्रिपाठी अधिवक्ता, राजेश्वर उदानियां, समाजसेवी,तहसीलदार सोहागपुर, राजस्व निरीक्षक सोहागपुर, और और प्रभारी जिला संग्रहालय शहडोल के पास होना चाहिए। ताकि मोहन राम मंदिर ट्रस्ट का व्यवस्थित संचालन तब तक होता रहे जब तक हाई कोर्ट के मामले का निर्णय नहीं आ जाता।
एसडीएम सोहागपुर ने कमेटी तो गठित कर दी किंतु 2012 से आज तक 2026 तक मोहन राम मंदिर ट्रस्ट प्रबंधन का प्रभार जो रोहिणी प्रपन्नाचार्य, लवकुश शास्त्री वगैरा के पास रहा उन्होंने हाई कोर्ट का पालन नहीं किया और प्रभार नहीं दिया, बार-बार एसडीएम और उच्च अधिकारी प्रभार दिलाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाते रहे किंतु भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की राजनीति के दबाव में हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया इस 14 वर्ष के हाईकोर्ट के आदेश के पालन की यात्रा में मंदिर की दस्तावेजों में प्रदर्शित उसकी संपत्ति को रोहिणी प्रपन्नाचार्यऔर लवकुश शास्त्री तथा उनके समर्थक न्यासियों की मदद से खुर्द -बुर्द कर दी गई जिसमें करोड़ों रुपए की रघुराज ग्राउंड के बगल स्थित खसरा नंबर 38 कि वह 33 डिसमिल जमीन भी है जिस पर विवाद आने में न्यायालय तहसीलदार ने स्थगन तो दिया बाद में यह फाइल भी कैसे गायब हो गई आज तक रहस्यमय है..?
अन्य कई भ्रष्टाचार जैसे मरे हुए व्यक्ति किराएदार के द्वारा तीन मंजिला भवन ठीक मंदिर के बगल में लवकुश के सामने खड़ा किया गया अन्य कई संपत्ति भी खुर्द-बुर्द होकर भ्रष्टाचार के लिए बलिदान हुई। शासन ने जिस तालाब को लाखों रुपए लगाकर ठीक किया वह फिर भ्रष्टाचार की आगोश में और प्रदूषण का केंद्र बन गया..मंदिर-मर्ममत के नाम पर लाखों की हेराफेरी हुई क्योंकि रोहिणी प्रपन्नाचार्य-लवकुश वगैरा ट्रस्टी ने हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उसका प्रभाव उसे स्वतंत्र कमेटी को नहीं सौंपा जिसे मोहन राम मंदिर के प्रबंधन को देखना था और काम करना था.
इस बीच जब तत्कालीन कलेक्टर वंदना वैद्य ने 2023 में एसडीएम को निर्देशित कर हाईकोर्ट के आदेश के पालन के लिए दबाव बनाया तो अबतक पारदर्शी भ्रष्टाचार का पोषक बन चुका चित्रकूट का निवासी लवकुश पांडे के द्वारा हाईकोर्ट में एक न्यायालयीन अवमानना की कार्यवाही उल्टा कलेक्टर वंदना वैद्य के खिलाफ कर दिया और पूरी ईमानदारी के साथ शपथ पत्र भी दिया होगा कि उससे प्रभार देने का दबाव बनाया जा रहा है यह न्यायालय की आदेश की अवमानना है।

स्वाभाविक है जब हाईकोर्ट ने ही कहा है कि प्रभार स्वतंत्र कमेटी को दे दे यानी पूरा प्रबंध का काम स्वतंत्र कमेटी देखेगी तब तक विवादित पक्षकार इस काम को नहीं देखेंगे, फिर क्यों रोहिणी प्रपन्नाचार्य, लवकुश शास्त्री वगैरा को ऐसा लगा कि उससे प्रभार मांगा जा रहा है। जबकि एसडीएम के समक्ष इसे ही संबंधित एक बैठक में मुझे भी बुलाया गया था जिसमें यह बात निकल कर आई की स्थाई तौर परअपदस्त किए लवकुश और उसके साथी यह दावा कर रहे थे की चुकी 12 साल हो गया है हाईकोर्ट के आदेश को और ऐसे में कोई एनजीओ का आदेश का क्रियांवन नहीं हो सकता आदि आदि बातें सामने आई और आरोप प्रत्यारोप भी, किंतु एसडीएम प्रगति वर्मा यह कहकर प्रभार नहीं दिला पाई की आदेश अंग्रेजी में है इसलिए अधिवक्ता से समझ के बाद ही वह प्रभार दिलाएंगे…?
किंतु किसी बुद्धिमान ने  रोहिणी प्रपन्नाचार्य, लवकुश शास्त्री वगैरा और उनके साथी  को सलाह दिया कि वह यह जानते हुए भी की हाईकोर्ट का आदेश फर्स्ट अपील 177/ 12 भलाई यह आदेश करता है की संपूर्ण प्रभार प्रबंधन का स्वतंत्र कमेटी को दिया जाए किंतु रिपीटेशन 895/12 जिसमें मंदिर में स्थापित विग्रह की पूजा करने का अधिकार रोहिणी प्रपन्नाचार्य को मिला है। उसकी बहना लेकर हाईकोर्ट में अपने लोगों को मिलाकर न्यायालय को भ्रमित करते हुए कोई ऐसा आदेश लाया जाए जिससे कलेक्टर दोबारा हिम्मत ना कर सके। और क्योंकि भ्रष्टाचारियों का दिमाग मे बचने के रास्ते निकालने के लिए यह जरूरी था उनके साथी सदस्यों ने भी इसमें हां में हां मिलाई और रोहणी प्रपन्नाचार्य ने कलेक्टर वंदना वैद्य को धमकाने के उद्देश्य से प्रकरण 895 / 12 के आदेश के अवमानना का याचिका दाखिल कर दिया।
मामला वर्तमान में लंबित है इतना पर्याप्त है शहडोल प्रशासन की धमकी के लिए कि वह अराजक और भ्रष्टाचारी लवकुश और उसके साथियों से मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के से आदेश का पालन नहीं करावें…? जो फर्स्ट अपील 177 / 12 में आदेश किया गया था। और इस तरह हाई कोर्ट का आदेश दम तोड़ दिया… और लूटपाट तथा भ्रष्टाचार मोहन राम मंदिर के नियति बन गई…
सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयुक्त की ईमानदारी पूर्ण दाखिल शपथपत्र की घटना से मुझे याद आ गया लोगों को जानना चाहिए न्यायपालिका कैसे काम करती है.. और इससे क्या आश्वासन मिलता है फिलहाल हम भी फल पकाने के इंतजार में है लोकतंत्र के न्यायपालिका का…
बाकी सब कुछ पारदर्शी है निर्वाचन आयोग का शपथ पत्र सुप्रीम कोर्ट में दाखिल है और मोहन राम मंदिर शहडोल को लूटने वाले लोगों की वह याचिका भी जो जबलपुर हाईकोर्ट में दाखिल है।  सोचता हूं अगर गलत जानकारी  है तो  भी और अवमानना की याचिका उस हरिश्चंद्र को लगाना चाहिए जो धर्म के नाम पर अराजकता का कारण बना हुआ है.. इंतजार रहेगा… कोई नोटिस मिले, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का ताकि  माननीय न्यायमूर्ति को बता सकूं की धंधा क्या हो रहा है…? न्यायपालिका के आदेशों के मनसा के खिलाफ जमीन पर कैसे नंगा नाच हो रहा है….?


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