
प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम
पुष्पा की अभिलाषा

रात 9:00 बजे करीब जब न्यूज़ नेशन चैनल टीवी पर देख रहा था तो राम रहीम बाबा को पैरोल पर छोड़े जाने का महिमामंडन हो रहा था कि कैसे यह हत्या और बलात्कार के प्रकरण के पहले महानता की ऊंचाइयों को छू रहा था और अब यह सजायाफ्ता होने के बाद बार-बार कोर्ट की पैरोल में छूट कर धर्म की नई ऊंचाइयों को टेली कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पकड़ रहा है ।ऐसा लगा जैसे राम रहीम बाबा का महिमामंडन तमाम टीवी चैनल एक नए वातावरण में कर रहा है और जैसे बलात्कारी और हत्यारे राम रहीम का महिमामंडन समाप्त होता है तो टीवी चैनल न्यूज़ नेशन का सत्यमेव जयते कार्यक्रम का लोगो सामने आता है।
ऐसा लगता है जैसे यही सत्यमेव है और इसी का जय गान हो रहा है । पिछले कुछ दिनों से हमारी बिरादरी के धीरेंद्र गर्ग उर्फ बागेश्वर बाबा नवयुवक संत को लेकर टीवी चैनल लगा कि पर्दा फाड़ कर बाहर आ जाएंगे और हमारे कानों के पर्दे में घुसकर इस बात को मस्तिष्क में डाल देंगे कि यही लोकतंत्र है। राजनीति में शीत युद्ध चल ही रहा था कानून मंत्री उपराष्ट्रपति न्यायपालिका से तलवार भांज रहे थे इस वातावरण में अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे कि 21वीं सदी का एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी नए रूप में मेरे अंदर आ गई और मेरा मन गुनगुनाने लगा …
आज आधी के पहले के एक भारतीय आत्मा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की आजादी के पहले का पुष्प 21वीं सदी में अमृत महोत्सव काल में इतना परिपक्व हो गया कि वह पुष्पा बन गया
और फिर उसकी क्या अभिलाषा हुई ,मेरा मन गुनगुनाने लगा…..
चाह नहीं भारत माता के
चरणों में फेंका जाऊं,
चाह नहीं संविधान माला बन
सत्ता प्यारी को ललचाऊं ,
चाह नहीं किसानों ,जवानों के शव पर
हे राम …. डाला जाऊं..
चाह नहीं स्वाभिमान के सर चढ़
भाग्य पर इठलाऊं …
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक
नवधनाढ्य साधु महात्मा,
माफिया, कारपोरेट्स के चरणों पर
जिस पथ जाते नेता अनेक…
इस तरह मेरी आत्मा 21वीं सदी की अमृत महोत्सव काल की भारतीय आत्मा बनकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए समर्पित हो जाने के लिए उतावली हो रही थी ।मैं पूरी निर्भयता के साथ किसी भी लोकतांत्रिक स्तंभ को अपने पैरों के तले कुचलने को बेताब था। उसकी स्वतंत्रता की नई परिभाषा उसे गुलामी के रूप में रखने को मैं तन मन धन से समर्पित हो जाना चाहता था। क्योंकि भारत का गणतंत्र जब कभी गुलामी की सड़ांध से बाहर निकला रहा होगा वह भोला भाला रहा होगा, अब वह एक परिपक्व गणतंत्र बनकर अपने नई संभावनाओं को लक्ष्य को पा रहा है ।
पूर्ण गुलामी,संपूर्ण स्वतंत्रता यही हमारा गणतंत्र दिवस पर नया नारा होना चाहिए। यह सोच कर मन गौरवपूर्ण गरिमा से भर जाता था कि हम करीब 82 करोड़ लोगों को मुफ्त में खाना देने के लिए बड़े दानवीर हो गए हैं। यह अलग बात है उनसे ही उनका ही खून चूस कर यह दानवीरता हमें महाभारत का कर्ण बनने का अवसर दे रही थी ।उससे भी ज्यादा गर्व इस बात पर हो रहा था कि मेरा शिखंडी का यह अपना स्वाभिमान था कि उसके कारण ही भीष्म में मारे गया थे। अन्यथा ना राम मंदिर बन पाता और ना वृंदावन के बिहारी जी की गलियों में उन्हें ढूंढा जा सकता था। क्योंकि अब वृंदावन की बारी है जहां कॉर्पोरेट घराने को धर्म की इंडस्ट्री से पैसा पैदा करने की मशीन बनाई जाएगी। काशी विश्वनाथ के गर्भ से मन आसमानी ऊंचाइयों को छू रहा है। यह धर्म का वह ध्वजा है जो भारत के तिरंगे से भी ज्यादा प्यारा है।
मन इस सपने को लगातार देखने को बेताब था 26 जनवरी तक जब तक की गणतंत्र गिरता हुआ तंत्र के रूप में आसमान को छू न ले… मैं सपना देखना लगातार जारी रखा, अचानक मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जगा दिया। मानो पूरे राष्ट्रवाद की हत्या हो गई।
इस तरह,हां इसी तरह आत्मा से परमात्मा का प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम… का अनुभव मैंने किया और यही मेरा समाधि भाव होगा… जैसे रजनीश का संभोग से समाधि का भाव स्थापित हुआ था। किंतु गद्दारों ने सब मटिया मेट कर दिया।
3000 से ज्यादा किलोमीटर चलने के बाद सिर्फ यह कह दिया कि सर्जिकल स्ट्राइक का रहस्य अभी भी नहीं खुला ; यह भी प्रत्यक्ष॔ किम् प्रमाणम का भगवा रंग था, यह अलग बात है कि भगवा रंग में इतना चर्चित कर दिया पठान को कि उसका पठानी सूट 50 करोड़ में बिक गया। किसी 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसा… और कश्मीर फाइल के कश्मीरी पंडित आज भी टारगेट किलिंग के टारगेट बनकर रह गए हैं ।यही है आज का प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम.. हे गणतंत्र अगर तू जिंदा है तो अमृत महोत्सव काल में उसकी बहुत शुभकामनाएं… ( त्रिलोकीनाथ )

