
लोकसभा में महिला आरक्षण पर ‘चोली के पीछे क्या है’ से ‘जादूगर’ तक: मनोरंजन भरा हंगामे के बादले विधेयक गिरा धड़ाम से –
17 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को लोकसभा का विशेष सत्र महिला आरक्षण विधेयक (2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम) और उससे जुड़े परिसीमन प्रस्तावों पर चर्चा के लिए बुलाया गया था। तीन विधेयक पेश किए गए – संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और संघ क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक 2026। इनका मकसद लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 815-850 करने, 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने और 33% महिला आरक्षण लागू करने का था। लेकिन विपक्ष ने इसे “महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन का छिपा एजेंडा” बताया। सदन में जो हंगामा हुआ, वह मनोरंजन से भरपूर था, लेकिन लोकतंत्र की गरिमा पर सवाल खड़े कर गया। अंत में विधेयक दो-तिहाई बहुमत न मिलने से गिर गया (एक रिपोर्ट के अनुसार जनसत्ता के अनुसार 528 सांसदों के मतों में 298 पक्ष में, 230 विपक्ष में मत पड़े)
(त्रिलोकी नाथ)
टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय का विवादास्पद सवाल
तृणमूल कांग्रेस की सांसद शताब्दी रॉय ने चर्चा के दौरान माधुरी दीक्षित के प्रसिद्ध गाने ‘चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है’ का जिक्र करते हुए पूछा – “महिला आरक्षण बिल तो 2023 में ही पास हो चुका था, इसके पीछे असली मकसद परिसीमन क्या है?” उन्होंने कहा कि सरकार विपक्ष को महिला-विरोधी बताना चाहती है, जबकि विपक्ष 2023 में भी समर्थन दे चुका है। यह बयान सदन में तीखी बहस का केंद्र बन गया।
राहुल गांधी का ‘फंस गए जादूगर के असफल जादू की कहानी ‘ वाला भाषण
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बचपन की जादूगर की कहानी सुनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “जादूगर पकड़ा गया है – बालाकोट का जादूगर, नोटबंदी का जादूगर, सिंदूर का जादूगर।” उन्होंने दावा किया कि यह बिल महिलाओं को सशक्त बनाने के बजाय चुनावी नक्शा बदलने की “घबराहट भरी प्रतिक्रिया” है। राहुल ने हल्का-फुल्का मजाक भी किया – “मेरा और पीएम मोदी दोनों का वाइफ इश्यू नहीं है।” लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कई बार टोका और कहा कि यह संसद की गरिमा के खिलाफ है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल से माफी मांगने की मांग की, लेकिन राहुल ने कहानी पूरी कर दी। सदन हंसते-हंसते गड़गड़ा उठा।
प्रियंका गांधी का तीखा हमला
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि वे “अंतरराष्ट्रीय दबाव” में सरकार चला रहे हैं। उन्होंने कहा, “बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं अच्छी तरह पहचान लेती हैं।” उन्होंने 2023 के बिल को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इसे परिसीमन से जोड़कर महिलाओं के नाम पर सत्ता बचाने की कोशिश की जा रही है।
टीएमसी के कल्याण बनर्जी और पूरे विपक्ष का योगदानटीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी भी बहस में शामिल हुए। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर बिल का विरोध किया। प्रधानमंत्री सदन में मौजूद थे, लेकिन अंदर बैठकर सब देख रहे थे। एनडीए की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नेतृत्व संभाला।
आंकड़ों में महिला आरक्षण की सच्चाई
वर्तमान स्थिति: 18वीं लोकसभा (2024) में कुल 543 सीटों पर केवल 74 महिला सांसद हैं – यानी मात्र 13.6-14%। (पहली लोकसभा में 5%, 17वीं में 14.3%)। वैश्विक औसत 27% है।
प्रस्तावित बदलाव: बिल पास होने पर लोकसभा की सीटें 815-850 तक बढ़ने वाली थीं। 33% आरक्षण से करीब 272-280 महिला सांसद चुनी जातीं। किसी राज्य या पुरुष सांसद की सीट नहीं घटती।
2023 कानून: नारी शक्ति वंदन अधिनियम पहले ही पास हो चुका है, लेकिन 2026 के बाद की जनगणना और परिसीमन के बाद 2029 चुनावों से लागू होता। नया बिल इसे पहले लागू करने का प्रयास था।
संसद की ‘मनोरंजन भरी महफिल’ की लागत
प्रति मिनट संसद चलाने का खर्च करीब ₹2.5 लाख है (एक घंटे में ₹1.5 करोड़, पूरे दिन ₹9 करोड़)। शुक्रवार का हंगामा भरा सत्र कितना महंगा पड़ा, यह तो टैक्सपेयर ही जानें।
लोकतंत्र की दुर्गति या लोकतांत्रिक जीत?
विपक्ष ने इसे “महिलाओं के नाम पर परिसीमन का खेल” बताया और बिल को गिरा दिया। सत्तापक्ष इसे महिलाओं को सशक्त बनाने का कदम बताता रहा। चाहे जो भी हो, यह दिन संसद की बहस को नया रूप देने वाला रहा – जहां गाने, कहानियां और तीखे आरोपों के बीच देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व एक बार फिर राजनीतिक शतरंज का मोहरा बन गया। अब सवाल यह है कि 2029 तक क्या महिलाओं को 33% आरक्षण मिल पाएगा या फिर यह सिर्फ एक ‘जादू’ ही रह जाएगा? (Sahayata grok)

