
क्या एसआईटी की रिपोर्ट में विश्वास किया जाए…?
————– (त्रिलोकीनाथ )—————–
शहडोल
नकाब उठकर अरमान जगाने वाली राजनीति शहडोल जैसे आदिवासी क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की लूट का बड़ा माध्यम बन गई है और अब यह लूट खसोट का परिणाम के रूप में शहडोल की खदानों से लाशों का निकलना आम बात हो गया है | इस प्रक्रिया में संबंधित चाहे वह कालरी प्रशासन हो उसका सुरक्षा प्रहरी हो या फिर पुलिस प्रशासन अथवा खनिज विभाग ,खान सुरक्षा का सबका नकाब उतर गया है| क्योंकि धनपुरी शहडोल क्षेत्र की तमाम खदानों में आम युवा को रोजगार के नाम पर यह पकोड़ा तलने का रोजगार में पहले युवाओं को नशा कराया जाता है और बाद में यह रोजगार दिया जाता है इसे खत्म करना कर्तव्यनिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि राजनीति से उन्हें आशा नहीं करनी चाहिए |अभी तक राजनीतिक जैसे इस सिस्टम के दबाव में मुंह सिले से लगते हैं क्योंकि एक भी राजनेता चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का इस पर खुलकर बोलता नहीं दिख रहा है
किंतु उस वक्त तो हद ही हो गई जब शहडोल में सफलता के साथ रेत की माफिया गिरी करने वाला तथाकथित ठेकेदार और उसके गुर्गे को दबाने के लिए 11 रात के सपना देख कर सुबह पुलिस और प्रशासन ने छापा मारकर करीब 55-56 गाड़ियां पकड़ ली| कैसे सब कुछ सिस्टमैटिक प्रायोजित तरीके से थम गया हो, इसके बाद राजा हरिश्चंद्र खनिज अधिकारी का अवतार हो गया| हालांकि इसके पूर्व की खनिज अधिकारी वह भी महिला शक्ति उमरिया में जाकर माफिया गिरी मैं अपनी हिस्सेदारी को पारदर्शी तरीके से चला रही थी, क्योंकि तब पकड़ी गई गाड़ियों में बहुत सी गाड़ियां सोन नदी की दोनों तरफ खड़ी सोन के सोना यानी रेत को लूटकर स्मगलिंग करते रहे और शहडोल में ज्यादा संख्या में गाड़ियां पकड़ी गई |यह दिखाने के लिए उमरिया की गाड़ियों को लाकर जब्ती बनाई गई.. |
पकड़ी गई गाड़ियों के मालिक का कहना है|,क्योंकि सब कुछ एक सिस्टम था डंपर लोन पर लिए गए थे, उन्हें काम चाहिए था, रेत ठेकेदार को स्मगलिंग करना था उसने इन नंबरों का गारंटी देकर की गाड़ियों को कुछ नहीं होगा सब कुछ सिस्टम में है रेत की स्मगलिंग करवाता था लेकिन ऊपर से दबाव आया और फॉर्मेलिटी पूरी करते हुए संबंधित ठेकेदार को सिस्टम में लाने के लिए गाड़ियां पकड़वा दी गई| इसके बाद सबकुछ सिस्टमैटिक चलने लगा| यह एक सिस्टम है और बहुत पारदर्शी है ……|
यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री चौहान कहते रहते हैं कि कलंक नहीं लगना चाहिए तो सवाल यह है कि जब किसी भी प्रकार की दुर्घटनाओं से स्मगलर्स ताकतवर होते दिखते हैं तो क्या उन्हें दिखना नहीं चाहिए… यह संदेश होता है अथवा कलंक की परिभाषा को नए नजरिए से देखना चाहिए सब कुछ सिस्टम चलता रहे किंतु कलंक नहीं लगना चाहिए….? और इस बार जो कलंक 35 साल पहले मंजा खोल के मर जाने से लगा था वह चार कोल आदिवासी और तीन अन्य नागरिकों के मारे जाने से लग ही गया है तो सवाल उठता है कि इन्हें रोजगार नहीं मिला होगा….?
और हमारी राजनीति कितनी लाचार व अव्यवस्थित है कि वह इन्हें ही विशिष्ट सेवा मानकर उच्चाधिकारियों को पदक देने में गर्व महसूस करती हैं… यह ठीक है कि दिए हुए पदक को वापस लेने की प्रथा नहीं है जब तक कि पदक वापस लौटा न दिए जाएं सबसे पहले साहित्य अकादमी का पदक पुरस्कार सीतापुर के उपन्यासकार उदय प्रकाश सिंह ने वापस लौटए थे लेकिन अब इन चीजों से फर्क नहीं पड़ता है… क्योंकि सिस्टम जब भी पदक देता है तो यह मानना चाहिए की उसके अच्छे कार्यों के लिए नहीं दिया गया है…
क्योंकि फर्जी मुकदमे गडकर किसी को भी फंसा देना शहडोल पुलिस प्रशासन की योग्यता बन गई है और यदि पुलिस प्रशासन के संज्ञान में यह बात लाई जाती है तो सोचती है यह उनके कार्य में हस्तक्षेप है क्योंकि टारगेट पूरा करना होता है और जिन प्रकरणों में यानी फर्जी प्रकरणों में भ्रष्टाचार के भरपूर अवसर हूं तो उन्हें बनाने में विकास ही तो होता है… यह आम के आम गुठलियों के दाम कुछ इस अंदाज में हमारी क्षेत्र में सफल माफिया गिरी जिसमें कबाड़ी-रेत माफिया और उद्योग माफिया भी सफलता के साथ काम कर रहे होते हैं|
अन्यथा कोई कारण नहीं है कि अक्सर रिलायंस इंडस्ट्रीज के तमाम अधिकारी शहडोल की प्रशासनिक अधिकारियों के निजी सेवक की तरह हमेशा उपस्थित दिखाई देते हैं| ऐसे में यदि मंजा कोल की तरह 4 और कोल मर गए हैं तो यह कोई नई बात नहीं है.. यह आदिवासी क्षेत्र के आदिवासियों की मौत का एक परंपरा है| एसआईटी गठित हो जाएगी और एक भी दोषी पुलिस अधिकारी इसमें नहीं आएगा जैसे कि अक्सर होता रहा है ..
और यह भी सिस्टम है,चपरासी से लेकर राष्ट्रपति तक शहडोल की धरती में आकर इस बात का लगातार आश्वासन देते रहेंगे के लोकतंत्र यहां स्थापित है…. और उसका यही चेहरा है…. और इसी में हमें खुश रहना चाहिए….
तो पुनः कुछ आदिवासियों के कोल समाज के लोग मर गए हैं यह नई बात नहीं है यह सोच कर हमें दुखी होने की जरूरत नहीं है…. क्योंकि यही क्षेत्र के विकास का सच्चा स्वरूप है और यह पारदर्शिता भी है कि सब कुछ पारदर्शी है …यही लोकतंत्र की उद्देशिका भी संविधान में था | इसलिए अब मनोरंजन के लिए गठित एसआईटी की रिपोर्ट का इंतजार कीजिए..
अन्यथा अगर राष्ट्रपति जी ने कहा है कि पेसा एक्ट लागू हो गया है 4 आदिवासियों को उसके परिवार को किस प्रकार से पैसा एक्ट में लाभ मिल रहा है हमें दिखना भी चाहिए… अगर यह पेशा एक्ट के दायरे में नहीं आता है तो भी यह दिखना चाहिए, क्योंकि पिछले 4 दिनों से 26 जनवरी के इर्द-गिर्द पेसा एक्ट के लिए ग्राम सभा की बैठकें हो रही हैं उन बैठकों में 4 परिवारों का इन आदिवासी परिवारों को किस प्रकार से संरक्षण मिल रहा है यह भी देखना चाहिए…?
किंतु अगर वह नगरी क्षेत्र के निवासी हैं तो उन्हें मर ही जाना चाहिए …क्योंकि एक्ट वहां लागू नहीं है| अब मरना किसी की गाड़ी चढ़ाने से मंजा कोल का हो या विकास की आंधी से बने कॉलरी के बंद खदानों में पैदा हुई कबाड़ गिरी और उससे बने जहर से पैदा हुई परिस्थिति हो… इससे क्या फर्क पड़ता है….?
जरूरी नहीं है कि एसआईटी जो रिपोर्ट दे, सही हो; पत्रकारों ने इस प्रश्न पर भी प्रश्न किया कि सिर्फ जिले की लोग एसआईटी में अगर शामिल हैं तो अगर जो इस माफिया गिरी में शामिल थे तो जांच रिपोर्ट कैसे आएगी…? दोषी पुलिस लोगों को तो बचाया ही जाएगा…. क्योंकि इसकी विश्वसनीयता खरी नहीं है अनुभव में तो यही आया है और यही कारण रहा कि खाड़ा में 13 वर्ष की लड़की के साथ बलात्कारी शिक्षक के मामले में सिर्फ एक व्यक्ति दोषी ठहराया गया और मृत ब्राह्मण लड़की की आत्मा को बुलाकर कहला गया कि वह बलात्कारी से प्रेम करती थी… यही तो रिपोर्ट थी |
तो इसकी विश्वसनीयता कितनी सही है अब गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का फोन आ गया तो शायद कुछ अपराधी और बन जाए…? शायद ब्राह्मण का मामला है तो नही बनाए जाएं…? और शायद बलात्कार से पीड़ित परिवार को कोई शासकीय राहत राशि भी नहीं दी गई, कॉलरी क्षेत्र में खदान में लाशों के मामले में पीड़ित परिवार को राहत राशि भी दी जाएगी ऐसी भी घोषणा की गई है…
किंतु कॉलरी क्षेत्र में आदिवासी का मामला है विशेष तौर पर और यह क्षेत्र महामहिम राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू की माने तो शहडोल में ही आकर कह गई हैं कि यहां पर आदिवासियों के लिए विशेष कानून पेसा एक्ट लागू किया जा रहा है तो क्या पैसा एक्ट में इतनी ताकत है कि वह इन मृत 4 आदिवासियों के परिवारों को गारंटी दे रहा है कि उनके बाकी बच्चे भी बंद कालरी खदानों में नशा करके माफिया के लिए वीर सिपाही की तरह बलिदान होने के लिए फिर से काम करने नहीं जाएंगे, यह भी देखना चाहिए …
क्या जिले की गठित पुलिस की एसआईटी इस पर कोई रिपोर्ट देगी…? शायद नहीं अन्यथा खनिज अधिकारी को प्रथम दृष्टया इन मृतकों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि खदाने सुरक्षित व संरक्षित तरीके से यह जिम्मेदारी खनिज अधिकारी की होती है..
तो मित्रो, सब कुछ सिस्टमैटिक है और लोकतंत्र ऐसे ही चलता है किसी को परेशानी है तो न्यायालय में जाए… जब तक न्यायपालिका में विधायिका का कब्जा नहीं हो नहीं हो जाता तब तक….| इसके बाद न्यायपालिका के दरवाजे भी बंद हो जाएंगे ऐसा मानकर च हम तो इसलिए लिख लेते हैं क्योंकि हमारी सुनी नहीं जाती जिस दिन सुनाई देने लगेगा यकीन मानिए हमारे लेख नहीं मिलेंगे…… क्योंकि तब तक हमारे खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही हो चुकी होगी|
तो सोचते रहिए कि आप किस प्रकार के विकास की रफ्तार में फंस गए हैं और क्या इससे निकलने का कोई रास्ता भी है विशेषकर इस माफिया गिरी के सिस्टम में हम कैसे बच सकते हैं यह सोचते रहिए…?

