
शहडोल
क्षेत्र में खुलेआम चल रहे रेत स्मगलिंग के कारोबार में जिस पाठक को गोली मारी गई है उसके इलाज के लिए ना तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के शासन ने और ना ही विपक्षी कांग्रेस ने राहत की बात कही है, तो वह अपने भरोसे और भगवान भरोसे अपना इलाज करा रहा है.. अगर वह आदिवासी होता और माफिया गिरी में धनपुरी के बंद कोयले की खदान में जहरीली गैस के कारण मर जाता तो उसके परिवार को राहत की राशि दी जाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती क्योंकि आदिवासियों की वोट बैंक को लूटने के लिए भी एक माफिया काम करता है..
………..(त्रिलोकीनाथ)……………
हमें समय समय में देखने को मिलता है कहीं स्थानीय नागरिकों के साथ मारपीट की जाती है उन्हें बंधुआ मजदूर बनाने के लिए कि वह उनके लिए काम करें यह गोहपारू थाना क्षेत्र की बात है| तो पौड़ी गांव के पुल पर कोई यात्री एक्सीडेंट में मर जाता है क्योंकि की माफिया गिरी के कारण वहां पर बालू रहता है अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ जगह जनप्रतिनिधियों को इस कदर धमकाया जाता है कि जिला पंचायत सदस्य वहां एसडीएम और तहसील ऑफिस में बिहारी में रेत माफिया गिरी के खिलाफ धरना देते हैं प्रशासन के कान खड़े नहीं होते ,व्यक्ति को गोली मार दी गई है तो यह कोई नई बात नहीं है इसके लिए पुलिस प्रशासन को जरा भी शर्म से सिर झुकाने की जरूरत नहीं है क्योंकि जोरेत ठेकेदार है विधायक की कंपनी है और विधायक भारतीय जनता पार्टी कभी हुआ करता था ,अब कांग्रेस पार्टी का है |
तो कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान शहडोल में पारदर्शी रूप से बिकी हुई है ऐसा मानना चाहिए या फिर वह भी सिस्टम में लाभ उठा रहे हैं और इन माफियाओं के लिए मौन व्रत रखते हैं…?
किंतु वह भाजपा के लिए काम करता है यह भी पारदर्शी नूरा कुश्ती का सबसे बड़ा उदाहरण है |इसके बदले उसके गुर्गों को शहडोल की सोन नदी अथवा अन्य क्षेत्र नदी नालों से रेत निकालने की खुली छूट है, यही सिस्टम है| इसी के लिए खनिज अधिकारी प्रमोद शर्मा दिन रात मेहनत करते हैं, क्योंकि सब पारदर्शी है… जानने वाला भी जान रहा है कि यह माफिया गिरी है और बोलने वाला भी जिम्मेदार प्रशासन भी मान रहा है कि यह माफिया गिरी है… तो इस पारदर्शी प्रक्रिया में किसी को गोली मार दी जाए किसी का परिवार मर जाए, स्थानी टूटपूंजी जनप्रतिनिधि धरना देते रहे इससे क्या फर्क पड़ता है…?, कोई फर्क नहीं पड़ता है |
क्योंकि यही सिस्टम है, इस सिस्टम को लोकतंत्र में बचाए रखने के लिए हमारी कर्तव्यनिष्ठ कार्यपालिका विधायिका और हम उसमें पत्रकार को भी जोड़ दें अपने भूमिका अदा करती है| न्यायपालिका बात तो तब आती है उसके टेबल में यह समस्या जाती है| 56 गाड़ियों के रेट स्मगलिंग का मामला धीरे-धीरे सब सेटल होता चला गया याने गाड़ियां छूट दी गई| जो चिन्हित माफिया हैं वह आज भी शहडोल में पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों के संपर्क में माफिया गिरी के लिए काम कर रहे हैं और खुलेआम बंदूक और पिस्तौल लेकर महंगी महंगी गाड़ियों में कलेक्ट्रेट में घूमते रहते हैं |क्योंकि वह मैनेजर है इनको पुलिस रिकॉर्ड में चिन्हित भी नहीं किया गया जबकि यह अपराधी हैं, स्मगलिंग के; फिर भी वह मैनेजर भी हैं | जबकि होना यह चाहिए कि अगर स्मगलर चिन्हित हो गया है उसके गिरोह का मुखिया चिन्हित हो गया है तो कम से कम उसे पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों के इर्द-गिर्द दिखना भी नहीं चाहिए | किंतु शहडोल में ऐसा नहीं होता उसका महिमामंडन जिला खनिज अधिकारी अपने ऑफिस में बैठा कर उससे चाय पीता है और पिलाता है यह चाय वालों की प्रगति की कहानी भी है|यही व्यवस्था है बोलते हैं |
इन हालातों में यदि किसी नागरिक पाठक को ,य जिला पंचायत सदस्य पटेल को ,स्थानीय नागरिकों को डराने धमकाने के लिए खुलेआम गोली मार दी गई है तो वह कोई अज्ञात लोग थे ऐसा एडिशनल पुलिस अधीक्षक वैश्य ने अपना बयान दिया है, बयान का क्या है धनपुरी के खदान में कोयला और कबाड़ की माफिया गिरी में याद आती, जिसमें बहुतायत आदिवासी समाज के लोग थे, जहरीली गैस के कारण मर गए… तो भी बयान आ गए थे बल्कि बयान तो मरने वाले को चोरी कर रहे थे उन्हें उनके परिवार को राहत देने की भी आ गए थे |ऐसे में रेत माफिया हो या कबाड़ माफिया हो यह सफलता के साथ अपना काम करता रहता है…… गोलीबारी या मरने की घटनाएं सिर्फ आम आदमियों को धमकाने के लिए अखबारों के जरिए प्रचार प्रसार और आतंक कायम है इसके लिए उपयोग होता है और कोई बात नहीं, ऐसा समझे….?
और ऐसा रेत माफिया इसलिए सिस्टमैटिक तरीके से कर पाता है क्योंकि वह हर महीना लोकतंत्र के हर खंभे को एक भारी रकम जिसकी जो औकात है उसके हिसाब से उसे पहुंचाता है अथवा अपने ऑफिस पर आकर के साइन करा कर के उसका भुगतान करता है और बाद में वह किसी भुगतान पत्र के जरिए ब्लैकमेल भी करता है कि उसके खिलाफ जब भी बोला जाएगा तो वह उन सब को उजागर कर देगा… ऐसा रेत स्मगलर का मैनेजर खुलेआम बोलता है; और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है जब स्वाभिमान का पानी मर जाए तो स्मगलर डंके की चोट में 56 इंच सीना तान कर हत्या भी करता है और पुलिस स्पष्ट रूप से बयान भी देती है कि वे अज्ञात लोग थे…. जबकि पूरे सिस्टम को मालूम है कि कौन-कौन लोग गोली मारकर भाग गए…. बहुत ज्यादा अगर राजनीतिक दबाव पड़ेगा ,तू ज्यादा से ज्यादा उन्हें पकड़ा दिया जाएगा…. जैसे कि कुछ दिन पहले जब सत्ता का दबाव पड़ा 1 दिन के लिए 56 गाड़ियां डंपर पकड़वा दी गई थी बाद में सब कुछ सैट हो गया और सिस्टमैटिक तरीके से अपराध करने की अघोषित छूट दे दी गई…. खनिज अधिकारी प्रमोद शर्मा राजा हरिश्चंद्र की तरह इस सब पर विश्वास करता है इसलिए वह स्मगलर को इस प्रकार का सम्मान देता है जैसे कि वह रेलवे स्टेशन में चाय बेचने वाला व्यक्ति कभी प्रधानमंत्री न बन जाए..?
यही भारतीय जनता पार्टी का रामराज्य है और यह सफलता से चलता रहेगा.. इसलिए शहडोल के तमाम प्रकार के माफियाओं से बच के चलना आम नागरिकों की जिम्मेदारी है अपराधी स्मगलर और माफिया यह सब लोकतांत्रिक सफलता में 56 इंच का सीना तान कर चलते हैं फिर यह माफिया की सफलता का महिमामंडन ही है आज भी चिन्हित होने के बाद भी अपने अपने बॉस के लिए काम कर रहे हैं| क्योंकि बॉस भोपाल अथवा जबलपुर में बैठता है और उसकी इच्छा से भाजपा की सरकार भी गिर सकती है इसलिए लोगों के मरने शहडोल में लोगों के मरने के लिए आंसू भी बहाने की जरूरत नहीं है विपक्षी पार्टी कांग्रेस का तो विधायक ही है तथाकथित रेत माफिया का जो बॉस है …. ( –भाग 3 जारी)

