नगर पालिका परिषद में अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल द्वारा सीवर लाइन बिछाने के मामले में ठेकेदार के कार्य पर रोक लगाए जाने से नगरपालिका के क्षेत्र के निवासियों मैं हित संरक्षण को प्राथमिकता मिलती है क्योंकि किसी भी प्रकार से कोई भी सरकारी फंड से ठेके में ठेकेदार बन कर आ जाता है और आदिवासी विशेष क्षेत्र को अपनी मनमानी पर ढंग से काम करने लगता है यहां के नागरिक को यहां के पार्षदों और नेताओं को चुने हुए प्रतिनिधियों को उसे यह बताने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है कि आखिर इसकी कार्यप्रणाली का हिस्सा क्या है… और किस तरह अपने कार्य को अंजाम देगा.. प्रायोगिक तौर पर भी सीवर लाइन के तौर-तरीकों को देखा जाए तो वह बेहद असंवेदनशील तरीके से निर्माण कार्य को अंजाम दे रही थी.. अभी तो यह भी पारदर्शी नहीं है कि वह किस प्रकार से लगभग मर चुकी मुड़ना नदी सीवर लाइन के कचरे को डालेगी और अगर इसी अंदाज में वह अपने कार्यप्रणाली को अंजाम देती है तो नदी और नाले तथा तालाबों के संरक्षण एक बदबूदार हालात को जन्म देंगी .
जैसा कि हम बड़े शहरों में ट्रेन से गुजरते हुए बदबूदार वातावरण का एहसास करते हैं तो क्या गुजरात इंडिया कंपनी की प्रतिनिधि ठेकेदार उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे और वह बिना किसी संकोच केस्थानीय नागरिकों के हितों की हत्या करते हुए उन्हें प्रताड़ना का कारण दे रही थी….? कुछ भी पारदर्शी नहीं था… इसलिए जरूरी है कि नगर पालिका के जनप्रतिनिधि इस पर अपनी निर्णय को जनता को बताते जो घनश्याम जायसवाल अध्यक्ष नगर पालिका ने बताने का प्रयास किया है..
चाहे यह सांकेतिक ही क्यों ना हो किंतु बहुत अच्छा संदेश जाता है कि आप इस प्रकार से मनमानी नहीं कर सकते… कल ही हमने न्यूयॉर्क शहर में आपातकाल से संबंधित एक घटना का उल्लेख किया था, यह अधिकार नगर पालिका परिषद को स्वाभाविक होना चाहिए… क्यों अपने शहर को कैसे बचा सके .हमने देखा है कि शहर की संसाधन उसकी सीमित प्राकृतिक वातावरण उसके तालाब और नदी नाले लगभग-लगभग उनकी हत्या करके नगर पालिका परिषद के भ्रष्टाचार के बाद में सब कुछ शहडोल शहर में बर्बाद हो रहा है..
.तो इसे कौन संभालेगा, इस पर निर्णय लेने का अधिकार किसे है… शहडोल क्षमता और योग्यता क्या उसकी भीड़ के अनुरूप है.. और अगर नहीं है तो इसे नियंत्रण करने का क्या तरीका है…? रही उद्योगपतियों और वाणिज्यिक सोच के साथ काम करने वाले लोगों की तो हमने देखा है कि रीवा अमरकंटक सड़क मार्ग आज भी अनुबंध को जिससे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने एक प्राइवेट कंपनी को सड़क निर्माण के दौरान दिया था वह 15 साल टोल टैक्स वसूली और 10 साल प्रबंधन के साथ सुनिश्चित होता था, बावजूद इसके कार्य-अवधि पूरी नहीं हुई और पुनः इस सड़क पर काम चलने लगा…. पैसा कमाने की इंडस्ट्रीज के लिए प्राकृतिक संसाधनों हमारे सड़क, हमारे तालाब, हमारे नाले, हमारे नागरिक स्थिति का प्रयोग होने लगा है…. इसमें मानवीय संवेदनाओं की जगह खत्म होती जा रही है.. और इसलिए नगर पालिका अध्यक्ष का यह निर्णय स्वागत योग्य है… आखिर नागरिकों की स्वतंत्रता का अधिकार का संरक्षण उसका अध्यक्ष ही तो करेगा यह बात साबित होती है.


