
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर मे क्षमता से बाहर आबादी आने लगी तो उन्होंने आपातकाल लगा दिया है क्योंकि वहां का लोकतंत्र पर्यावरण संरक्षण और मानवीय आवश्यकताएं से प्रकृति का तालमेल करके चलता है हमारे यहां ऐसा नहीं है यह हो सकता है वहां के लोग लोकतंत्र मूर्ख हो…? और हमारे लोकतंत्र परिवार बुद्धिमान हो.. लोकतंत्र को लेकर जागरूक हो या फिर वहां का सिस्टम फेलियर है अथवा यह हम सीख नहीं पाए और यह हम..?तो क्या कार्यपालिका का यह सिस्टमैटिक फेलियर है…? और जो हमें सोचने के बाध्य करता है कि यह कहां आ गए हम….? तो चलिए इसे अन्य दृष्टांत में भी देखें… ( त्रिलोकीनाथ )
बात बीसवीं सदी के अंतिम दशक की है तब शहडोल कलेक्टर पंकज अग्रवाल हुआ करते थे, संजय दुबे नए-नए आईएएस जिला पंचायत में मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनकर आए थे.. दौर था तालाबों की रक्षा करें. प्रदेश में और कांग्रेस के शासन में प्रभारी मंत्री राहुल सिंह शहडोल आए हुए थे. संप्रेक्षण गृह का शिलान्यास जेल भवन शहडोल के बगल में स्थित तालाब के अंदर होना था. हमने सुनिश्चित किया कि इसे पत्रकारिता के सहारे अंतिम में संज्ञान में लाएंगे और जैसे ही पत्रकार वार्ता खत्म हुई मैंने अजय सिंह को पत्र देकर कहा कि, प्रदेश में तालाबों के संरक्षण के लिए काम करने ही जा रहे हैं तो क्या बेहतर नहीं होता किस संदेश शहडोल से ही दें… कि जिस संप्रेक्षण गृह को आप शिलान्यास करने जा रहे हैं और अगर वह तालाब के अंदर बन रहा है तो उसे आपने रोक दिया है… और इस तरह तालाबों को संरक्षित किया जाएगा. किसी भी कीमत में तालाब नष्ट नहीं किए जाएंगे. राहुल सिंह ने बात को समझा और फिर कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी से कहा; यह क्या है..?
आईएएस , प्रेस से ताकतवर था उन्होंने कन्वेंस किया जेल बिल्डिंग के पास वाला तालाब के मेड में संप्रेषण गृह बनाने जा रहे हैं तालाब के अंदर नहीं… मैं भी प्रेस का हिस्सा था इसे मैंने चुनौती के रूप में लिया……
तो जब प्रभारी मंत्री राहुल सिंह बदल गए और उसी सीधी जिला के इंद्रजीत पटेल शहडोल के प्रभारी मंत्री बने तथा पर्यावरण भी मंत्री थे फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुआ… मैंने इस बात को पुनः उठाया. कलेक्टर पंकज अग्रवाल इंद्रजीत पटेल ने कलेक्टर से चर्चा की और अंततः कहा कि देखिए अब तो सिद्ध हो गया कि वहां पर तालाब है.. तो आप बताइए कि उसका गहरीकरण कब कर रहे हैं….. और इस तरह जेल बिल्डिंग के बगल वाले तालाब को बचा पाने में मैं सफल रहा. क्योंकि तालाब का गहरीकरण हो गया .
तब भी मुझे नहीं मालूम था कि प्रशासन ने पूरे तालाब को पैक करके उस पर प्लाटिंग का काम भी कर दिया है रिकॉर्ड में .मैं प्रेस तक का हिस्सा रहा.. मुझे खुशी हुई कि मैं जीत गया. 21वीं सदी में आते आते इस तालाब में प्रधानमंत्री आवास बन गया और तालाब नष्ट करने की फिर से प्रयास होने लगे.
मुझे आश्चर्य लगा जिसमें शासन ने लाखों रुपए लगा दिए हैं प्रधानमंत्री आवास कैसे स्वीकृत हो जाएगा…? तो बाद में पता चला लाखों रुपए जिस तालाब में खर्च कर दिए गए हैं वह अभी भी नजूल प्लाट के रूप में प्रशासन ने स्वीकृत करके रखा है. तो तालाब, नजूल प्लाट के रूप में जिंदा है ..तालाब भी है, और प्लाट भी है.
यह चमत्कार कार्यपालिका ही कर सकता. यह चुनौती प्रेस के लिए चुनौती कम हो गई है क्योंकि राम-राज्य में प्रेस कॉन्फ्रेंस या तो होते नहीं या फिर वह लगभग प्रायोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस होते हैं.. जिसमें किसी कलाकार को बुलाकर प्रधानमंत्री यह प्रश्न करने की इजाजत देते हैं की “आम चूस कर खाते हैं या काट कर खाते हैं… और जो स्क्रिप्ट पहले से लिखी होती है उसके अनुसार प्रधानमंत्री उत्तर भी देते हैं…
तो ऐसे में अनुसूचित विशेष आदिवासी क्षेत्र शहडोल मैं प्रेस के जिंदा होने का बहुत उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. जेल भवन का तालाब यद्यपि अभी जिंदा है बावजूद इसके कि वह सरकारी रिकॉर्ड में प्लाटिंग के रूप में बदल गया है. वह संयोग मात्र है इसका इस देश की आजादी से कोई संबंध नहीं है. ऐसा मानकर चलना चाहिए.
इसके दूसरे और उदाहरण भी हैं चलिए प्रेस मर गया है इसे नए दृष्टिकोण में देखें… कल ही मुख्यमंत्री ने मध्य प्रदेश का 53 वा जिला, रीवा जिले को तोड़कर मऊगंज जिले की घोषणा की है. माना जाता है कि प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से लोकतंत्र को और विकास के रास्तों को ज्यादा मजबूती प्राप्त होती है और शायद इसी सिद्धांत में एक और नया जिला में एक नए आईएएस और आईपीएस के पदों का निर्माण होगा.
किंतु अगर शहडोल जिला विशेष आदिवासी क्षेत्र होने के बावजूद संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित होने के बावजूद 3 टुकड़े में कर दिया गया निश्चित तौर पर जहां मात्र 1-1 आईएएस और आईपीएस बैठते थे वहां पर कई आईएएस कई आईपीएस बैठने लगे.. लोकतंत्र की शैक्षणिक गुणवत्ता की पूरा समाज कार्यपालिका गुणवत्ता पूर्ण तरीके से वहां काम करने लगी.
और यह भी सही है कि भारत के तथाकथित 140 करोड़ आबादी के महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू पेसा एक्ट लागू करने के लिए स्थान चुनते हैं तो उन्हें शहडोल का लालपुर ही दिखाई देता है. तो कुछ बात तो है कि यह सोच कर लोकतंत्र का सिस्टम यह कार्य करता है उन्होंने इस स्थान को चयन किया होगा…. हम इसे या छोटे-छोटे जिले की बनने से उसकी बड़ी हुई ताकत को समझने का प्रयास करते हैं.
शहडोल
जिले का से टूटकर बने नरोजाबाद थाने के आदिवासी केवल सिंह के मामले पर प्रकाश डालना जरूरी होगा जब यह प्रकरण मेरे ध्यान में लाया गया की, आदिवासी सेवानिवृत्त कॉलरी कर्मचारी का करीब 17,00,000 रुपए बिहार से आकर वहां रहने वाले किसी सूदखोर ने उसे ठग लिया है. सिर्फ ₹30000 मूलधन देकर. तब मैंने यह बात अलग-अलग स्तर पर अनुसूचित जनजाति आयोग एडीजीपी से लेकर तक समझाने का प्रयास किया…….
( .जारी 3)

