
अक्सर सत्ता पक्ष में आंख मूंदकर उसके निर्णय ऊपर क्रियान्वयन करने वाला भारतीय लोकतंत्र का अहम स्तंभ कार्यपालिका का प्रमुख चेहरा आईएएस समाज है, इसलिए जब सत्ता पक्ष गुजरात सरकार में यह निर्णय लेता है की बिलकिस बानो प्रकरण में जघन्य बलात्कार प्रकरण में सजा प्राप्त दोषी व्यक्तियों को जब छोड़ा जाता है और छोड़ने के बाद उन्हें माला पहनाकर स्वागत किया जाता है तब लोकतंत्र का यह आईएएस समाज प्रश्नचिन्ह क्यों खड़ा नहीं करता…? बता दें कि बिलकिस बानो के साथ यह अपराध 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुआ था. सांप्रदायिक हमले के दौरान उनके साथ गैंगरेप किया गया और उनकी तीन साल की बेटी सहित परिवार के 14 सदस्यों को की हत्या की गई थी. बिलकिस इस मामले में एक मात्र जीवित पीड़िता है
_____________( त्रिलोकीनाथ )________________
गोपालगंज के तत्कालीन डीएम की हत्या के दोषी आनंद मोहन सिंह की जेल से रिहाई के फैसले के मामले में आईएएस एसोसिएशन ने कड़ी प्रतिक्रिया पर की है आइए उस पर एक नजर डालें सेंट्रल आईएएस एसोसिएशन गोपालगंज के पूर्व जिलाधिकारी स्वर्गीय श्री जी कृष्णैया की नृशंस हत्या के दोषियों को कैदियों के वर्गीकरण नियमों में बदलाव कर रिहा करने के बिहार सरकार के फैसले पर गहरी निराशा व्यक्त करता है।आईएएस समाज ने कुछ इस प्रकार का पत्र जारी किया है
इंडियन सिविल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (सेंट्रल) एसोसिएशन
नयी दिल्ली
सेंट्रल आईएएस एसोसिएशन इस फैसले पर गहरी निराशा व्यक्त करता है
बिहार राज्य सरकार की ओर से इस क्रूर हत्याकांड के दोषियों को रिहा करने के लिए स्वर्गीय श्री जी कृष्णैया, आईएएस, पूर्व जिला मजिस्ट्रेट की हत्या गोपालगंज में बंदियों के वर्गीकरण के नियमों में बदलाव किया गया है. दोषी का ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या के आरोप को पुनर्वर्गीकृत नहीं किया जा सकता एक कम जघन्य श्रेणी के लिए। मौजूदा वर्गीकरण में संशोधन जो एक लोक सेवक के सजायाफ्ता हत्यारे की रिहाई की ओर ले जाता है कर्तव्य न्याय से वंचित करने के समान है। इस तरह के कमजोर पड़ने से नपुंसकता होती है,
लोक सेवकों के मनोबल में क्षरण, सार्वजनिक व्यवस्था को कमजोर करता है और बनाता है न्याय प्रशासन का उपहास।
हम दृढ़ता से राज्य सरकार से अनुरोध करते हैं। बिहार सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करे , जल्द से जल्द।
नयी दिल्ली
दिनांक: 25 अप्रैल, 2023
एसोसिएशन (Association) ने कहा कि ऐसे फैसले से ही लोक सेवकों के मनोबल में गिरावट आती है. हम राज्य सरकार से अनुरोध करते हैं कि बिहार सरकार जल्द से जल्द अपने फैसले पर पुनर्विचार करे. बता दें कि तेलंगाना (Telangana) में जन्मे आईएएस अधिकारी कृष्णैया अनुसुचित जाति से थे. वह बिहार में गोपालगंज के जिलाधिकारी थे और 1994 में जब मुजफ्फरपुर जिले से गुजर रहे थे तभी भीड़ ने पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी थी.हत्या की घटना के वक्त आनंद मोहन मौके पर मौजूद थे, जहां वह दुर्दांत गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा में शामिल हो रहे थे. शुक्ला की मुजफ्फरपुर शहर में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. इसी हत्याकांड में आनंद मोहन को सजा हुई है.
क्या वह सिर्फ एक लोकतंत्र में जाति बनकर रह गया है, जब उसकी जाति के ऊपर कोई बड़ा फैसला होता है या फिर कमजोर सत्तापक्ष जब कोई फैसला लेता है तब वह समाज आईएएस अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है…? और जब कोई भारतीय नागरिक बिलकिस बानो के साथ सत्तापक्ष गुजरात राज्य सरकार जब अन्याय पूर्ण फैसला लेती है तब वह चुपचाप रहकर लोकतंत्र की नैतिकता के अपराध बोध को बढ़ावा देता रहा है…? अब अगर वहीं सत्तापक्ष बिहार सरकार के रूप में जब आनंद मोहन सिंह जैसे हत्यारों की सजा को माफ करती है तो सिर्फ इसलिए कि उसने एक आईएएस अधिकारी की हत्या में आरोपी रहा है, सजायाफ्ता है.. और इसके लिए उसे लगातार जेल में रहना चाहिए..? अपनी अपराधको बुलंद करती है. आखिर यह बुलंदकी की इस प्रकार के फैसलों से नपुंसकता होती है उसने गुजरात सरकार के मामले में बिलकिस बानो के फैसले के मामले में क्यों बुलंद नहीं की…?
क्या गुजरात की सरकार नपुंसक फैसला नहीं कर रही थी…? अथवा आईएएस समाज तब गुजरात सरकार की पुरुषार्थ भरे फैसले पर सहमत था…? और उसे लागू कराने में मोन सहमति दे रहा था..? तो अगर कोई दूसरी कमजोर सरकार ऐसे ही विवेकपूर्ण फैसले लेती है अब तो उसे तकलीफ क्यों हो रही है….? वह राज्य सरकार की पुरुषार्थ पर प्रश्नचिन्ह क्यों खड़ा करती है…? क्या सिर्फ इसलिए बिहार की राज्य सरकार जो एक कमजोर राज्य सरकार है उसने आईएएस जाति पर वोट बैंक की राजनीति का ध्रुवीकरण करने का काम किया है…? अथवा वह भी वर्तमान सत्ता की ध्रुवीकरण होती गुलामी का एक चेहरा बन रहा है..? या फिर उसे तकलीफ इस बात की है कि आखिर विधायिका की इतनी हिम्मत कैसे पड़ गई कि वह कार्यपालिका के किसी अहम पदाधिकारी की हत्यारे को पर अपने वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर रही है…? जबकि वह जानती है कि बिलकिस बानो के मामले में स्पष्ट तौर पर न सिर्फ सजा प्राप्त लोगों की सजा में छूट दी गई थी बल्कि उन्हें जेल से निकलने पर किसी विजय उत्सव की तरह वोट बैंक के ध्रुवीकरण के लिए माला पहनाकर स्वागत किया गया था…..?
तो क्या कार्यपालिका के लिए लोकतंत्र में यह बड़ा पड़ाव साबित होने वाला है की विधायिका को कार्यपालिका के आईएएस समाज पर हमला करने वालों को किसी कीमत पर नहीं बक्शना चाहिए…, यह संदेश विधायिका को स्पष्ट रूप से दिया जा रहा है और इसीलिए विधायिका के इस वोट बैंक की ध्रुवीकरण की राजनीति को नपुंसकता जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है.. लेकिन जैसे ही वह गुजरात में सेम प्रकरण पर लागू होता है यह नपुंसकता, पुरुषार्थ के रूप में कैसे बदल जाता है….?
इसका जवाब आईएएस समाज को देना चाहिए कि लोकतंत्र को जीवित रखने में उसने दोगला व्यवहार क्यों किया…? उसने आखिर गुजरात सरकार की इस पुरुषार्थ भरे कदम बिलकिस बानो बलात्कार प्रकरण में मौन सहमति क्यों देती रही…? आज जब ऐसे ही नपुंसकता भरे फैसले विधायिका, आईएएस समाज के व्यक्ति पर ले रही है तो उसे पीड़ा क्यों हो रही है…? आम नागरिक के मामले में उसकी पीड़ा क्यों खत्म हो गई थी…?
यह बड़े प्रश्न हैं जिसका आईना देख कर आईएएस समाज को, बल्कि कहना चाहिए कार्यपालिका को लोकतंत्र में जवाब देना चाहिए… और उसे यह समझना भी चाहिए की विधायिका की गुलामी का अनुगमन करने पर विधायिका आपके ऊपर भी उतनी पुरुषार्थ भरे फैसले ले सकती है.. जितना कि आप उनकी आपकी भाषा में उनकी नपुंसकता को प्रमाणित करते हैं… बेहतर होता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ कार्यपालिका निष्पक्ष होकर विधायिका के फैसलों पर अपनी खुली अभिव्यक्ति करता.. उससे ज्यादा यह भी कि उसने आज तक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारिता पर उसी प्रकार का मौन व्रत रखा जिस प्रकार की बिलकिस बानो मामले पर वह अपने पुरुषार्थ को व्यक्त नहीं कर पाया… और शायद इसीलिए भारतीय पत्रकारिता गुलामी के क्षेत्र में जीते जी चली गई है… आखिर यह किसका पुरुषार्थ रहा…..? यह भी सोचना चाहिए,कार्यपालिका को..?
अभी भी वक्त है कि वह विधायिका की गुलामी छोड़कर लोकतंत्र के सभी स्तंभों को पूर्ण स्वतंत्र और प्रखर बनाने के लिए स्वस्थ अभिव्यक्ति पर हमेशा प्रभावकारी विज्ञप्ति जारी करेगी.. हम भी बिहार सरकार के इस फैसले की निंदा करते हैं, किंतु गुजरात सरकार के बिलकिस बानो के मामले में कम निंदा नहीं कर रहे हैं, जहां पर आईएएस समाज मोनी-बाबा बने हुए हैं… यह हमेशा सोचना चाहिए ; अन्यथा आईएएस समाज का यह पुरुषार्थ भी सिर्फ राजनीतिक पक्षपात की गुलामी का संदेश देगा और कुछ नहीं..

