
औरसंविधान संपन्न होने के बावजूद भी आर्थिक रूप से मजबूत वेतन पाने वाला कार्यपालिका का जिम्मेदार समाज आजाद भारत की हत्या करने वाले इस विधायिका की षड्यंत्रकार को खत्म करने में स्वयं को असफल पा रहे हैं.. जो लोग इसका विरोध करते भी हैं उसमें उन्हें अपने ही वरिष्ठ भ्रष्टाचार के पीठाधीशों से मुकाबला करना पड़ता है.. क्योंकि उन्हें भी यह डर होता है कि अगर इमानदार कार्यपालिका का कोई वायरस एक्टिव हो जाएगा तो जो कार्यपालिका भ्रष्टाचार के सहारे सिस्टम को दीमक की तरह खा रही है वह उसे भी नष्ट कर देगा… भलाई इसमें भारत की आजादी खतरे में पड़ जाए भ्रष्ट कार्यपालिका इसकी परवाह नहीं करता… क्योंकि वही मूर्खता, उसकी योग्यता होती है… और वह उसे ही अपना राष्ट्रवाद समझता है. पीठासीन मसीह ऐसे भ्रष्ट कार्यपालिका समाज का प्रमाणित चेहरा है। इसलिए देश की आजादी में पत्रकारता और मीडिया को आर्थिक और संवैधानिक वैधानिक रूप से कमजोर करके उसे पथभ्रष्ट कर देने वाला अधिकार प्राप्त तीन तंत्र विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में सिर्फ न्यायपालिका से ही आशा बची रह गई है कि वह किसी शोषण के बाद के बाद क्रांति के खूनी हालात पैदा नहीं होने दे. ————————( त्रिलोकी नाथ )—————————
संभवत पूरे मध्य प्रदेश की तरह कल शहडोल में भी जय स्तंभ चौक में उत्कृष्ट निर्वाचन कार्यो के लिए वार्षिक राज्य पुरस्कार 2023 के तहत मतदाताओं जनता प्रेस प्रशासन और पुलिस को समर्पित एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। निश्चित तौर पर कार्यपालिका के द्वारा किया गया यह कार्य चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी दिखाने का प्रदर्शन है। तो इसका दूसरा पहलू भी हम समझ लेते हैं इसमें प्रेस को भी यानी पत्रकारिता को भी कार्यपालिका ने अपने साथ लपेटने का प्रयास किया है कि जो भी हो रहा है या जिस प्रकार की निर्वाचन प्रक्रिया चुपचाप शांतिपूर्ण व्यवस्था से संपन्न हो रही है तो उसमें पत्रकारिता की भी पूर्ण सहभागिता है।
यह अलग बात है की पत्रकारिता का बहुत लेना-देना निर्वाचन प्रणाली में रहता नहीं है वह एक गुलाम की तरह है निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा होता है और निर्वाचन के मतगणना स्थल में उसे एक बंद कमरे में विधायिका और कार्यपालिका मिलकर के बांध देते हैं। उसकी सीमा बता दी जाती है। कुछ खाने-पीने को सानी-भूसा आदि की तरह भोजन भी दे दिया जाता है।
क्योंकि यदि पत्रकारिता ने अपनी जिम्मेदारी चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में अपनायी होती तो कार्यपालिका से निकला वह शातिर पीठासीन अधिकारी मसीह पारदर्शी तरीके से चुनावी भ्रष्टाचार करते हुए सीसीटीवी में रंगे हाथों पकड़ा नहीं जाता। और यदि कार्यपालिका का एक बड़ा हिस्सा जो निर्वाचन आयोग में बैठता है वह अपना काम कर रहा होता तो चंडीगढ़ के लोगों को उच्चतम न्यायालय की सीड़ी नही चड़नी पड़ती, जहां उच्चतम न्यायालय ने ने चंडीगढ़ मेयर चुनाव में पीठासीन के अधिकारी के कृत्य को लोकतंत्र की हत्या निरूपित करते हुए अधिकारी पर मुकदमा चलाए जाने का प्रश्न उठाया है ।
अब शहडोल को समझ लें शहडोल संभाग में भी उमरिया जिले में जिला पंचायत के अध्यक्ष के चुनाव में पीठासीन अधिकारी ने खुला पक्षपात किया था जिसका विवाद पुलिस थाने तक पहुंचा था यह एहसान पुलिस उमरिया ने जरूर किया कि उसने अंततः पीठासीन अधिकारी के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने का काम किया, ऐसा बताया जाता है। मामला हाई शकोर्ट में भी गया तो बात चाहे चंडीगढ़ की हो अथवा शहडोल संभाग के उमरिया जिले के पीठासीन अधिकारी की हो दोनों ही एक जैसा काम कर रहे थे ।
यह सीसीटीवी का कमाल था चंडीगढ़ में कि उसने मतपत्र से छेड़खानी करते हुए पीठासीन अधिकारी मेयर को रंगे हाथ पकड़ लिया और मेयर के चुनाव की अगली बैठक निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा।तो सवाल यह भी है कि क्या हाई कोर्ट यह काम नहीं कर सकती थी…? या उसने इस प्रकरण को आम शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा समझकर पेंडेंसी में डाल दिया… जैसा की उमरिया जिले की पीठासीन अधिकारी के मामले में शायद मामला हाईकोर्ट में लंबित है…?ऐसे में कम से कम उमरिया जिले में पीठासीन अधिकारी कम कलेक्टर अथवा जो भी प्रभार में रहा हो उसे उत्कृष्ट निर्वाचन कार्यो के लिए वार्षिक राज्य पुरस्कार 2023 विधानसभा के मतदाताओं जनता, प्रेस ,प्रशासन और पुलिस को सादर समर्पित कार्यक्रम का हिस्सा क्यों बनना चाहिए…? यह भी एक बड़ा प्रश्न है।
लेकिन यह गंभीर प्रश्न है आदिवासी क्षेत्र के मतदाताओं और प्रेस के सर से ऊपर जाने वाला विषय है या अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसा कृत्य कहलाएगा।क्या ऐसे आयोजनों में हमारी लचर व्यवस्था निष्पक्षता के लिए आवश्यक रूप से सीसीटीवी लगाने जैसे कृत्य को अनुभव के आधार पर जैसा कि चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में सीसीटीवी ने रंगे हाथ पकड़ा, उसी प्रकार की व्यवस्था की बाध्यता सुनिश्चित की गई है। यह देखा जाना चाहिए ।किंतु शायद इन सब प्रकार के इत्यादि,विषयों पर हमारी कार्यपालिका पुरुषार्थ प्रकट नहीं कर पाती। क्योंकि वह विधायिका की गुलाम हो चली है ऐसा क्यों नहीं मानना चाहिए…?
मुझे अनुभव में आता है शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने 2012 में एक आदेश पारित किया जिसका क्रियान्वयन 2024 के जनवरी माह तक तो नहीं हो पाया। अंत-अंत में यह बात जब संज्ञान में लाई गई तब तत्कालीन एसडीएम सोहागपुर में यह कहकर पल्ला झाड़ा की हाई कोर्ट का आर्डर अंग्रेजी में है, और समझ से बाहर है। इसलिए वह हाईकोर्ट के अधिवक्ता से समझ कर इस पर कुछ कार्यवाही करेंगे।किंतु अगर 12 साल में हाईकोर्ट की आदेश को नहीं समझा जा सका है तो अगले 12 साल में आदिवासी क्षेत्र की कार्यपालिका हाई कोर्ट के आदेश को समझ पाएगी यह समझना बहुत मुश्किल है…?
क्योंकि “पानी को पप्पा…”बोलने अथवा समझने की प्रणाली ही जब कार्यपालिका का सिस्टम बन जाए तब उसका असर वही होता है जो उमरिया जिला पंचायत अध्यक्ष के मामले में अथवा चंडीगढ़ मेयर चुनाव के मामले में पीठासीन अधिकारी ने किया.ऐसे में लोकतंत्र में निर्वाचन में उत्कृष्ट कार्यो की सफलता का आयोजन सिर्फ शब्दों का मायाजाल और लोकतंत्र के साथ धोखा है…
इसमें पत्रकारिता को अलग ही रखना चाहिए क्योंकि वह एक ऐसा शेर है जो असमय ही बूढ़ा हो चला है किंतु अभी तक उसके नाखून नहीं आए हैं .. वह विकलांग, अधिकार विहीन, एक तथाकथित लोकतंत्र का स्तंभ है। यानी जो काम कभी शासन का जनसंपर्क विभाग जिसे हम प्रेस अटैची कहते हैं वह करता है वह अब पूरी शीर्ष पत्रकारिता करती दिखने लगी है। इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए।
ऐसे में जबकि मात्र चंडीगढ़ में मेयर चुनाव में कुल 36 मतपत्रों की गणना करने में महा घोटाला हो गया और पीठासीन अधिकारी ने पारदर्शी तरीके से भ्रष्टाचार का एक सिस्टम या एक मॉडल प्रस्तुत किया है कैसे संभव है की अप्रत्यक्ष रूप से होने वाले मतदान प्रक्रिया यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम )के जरिए होने वाला चुनाव निष्पक्ष होगा…? प्रथम दृष्टिया इसे निष्पक्ष नहीं माना जाना चाहिए…, ऐसा ही प्रश्न दिल्ली में विगत दिनों नागरिक समाज ने जिसे कई बुद्धिजीवी और बौद्धिक अनुभवी सेवानिवृत्त वर्ग ने जंतर मंतर में प्रदर्शन भी किया था कि इवीएम के अलावा भी मतदान प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए कार्यवाही करनी चाहिए ।,भोपाल में जैसे भी हैं कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने पत्रकार वार्ता कर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जारी होने वाले भ्रष्टाचार की संभावना को पारदर्शी तरीके से प्रकट किया। निर्वाचन आयोग के समक्ष भी इस प्रकार के आवेदन दिल्ली में लगे हुए हैं। किंतु निर्वाचन आयोग “एक बगुला भगत..” की तरह है वह लोकसभा चुनाव को करने के लिए आंख मूंद लिया दिखाई देता है।
भला हो सीसीटीवी के जरिए पारदर्शी भ्रष्टाचार करने वाले चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में पीठासीन अधिकारी का कि उसने चुनाव प्रक्रिया में भ्रष्टाचार किस गुंडागर्दी कार्यपालिका द्वारा की जा शकती है इसका निष्पक्ष प्रदर्शन किया है। और इस महान भ्रष्टाचारि व्यक्तित्व को राष्ट्रवादी कर्तव्य निष्ठ कार्यपालिका अधिकारी के रूप में भारत के लिए आवश्यक पुरस्कृत करना चाहिए।
यह अलग बात है कि जब सुप्रीम कोर्ट इसे किस प्रकार का दंडित करेगा वह एक मनोरंजन होगा। क्योंकि उससे निर्वाचन आयोग को फर्क नहीं पड़ने वाला..? फिलहाल जो सिस्टम बन चुका है उससे यही प्रतीत होता है।
ऐसे में भारत के नागरिक होने के नाते क्या अधिकार संपन्न हो कुछ स्टार की सेवा और वेतन प्राप्त कार्यपालिका में कार्य कर रहे उत्कृष्ट बौद्धिक समाज अपने जमीर को जिंदा करके लोकतंत्र को बचाने की दिशा में थोड़ा सा प्रयास नहीं कर सकता…..?
आखिर वह 140 करोड़ की भीड़ भरी भेड़चाल में चलने वाली भारतीय जनता से लोकतंत्र को जिंदा रखने की आशा क्यों करता है…?
क्योंकि अगर जिस प्रकार से चुनाव होने के पहले जीतने की गारंटी, प्रधानमंत्री मोदी की गारंटी सरेआम प्रचारित और प्रकाशित होती दिखाई देती है तो फिर निर्वाचन कार्यप्रणाली का अऔचित्य खत्म हो जाता है। आखिर कोई कैसे दावा कर सकता है कि वह सिर्फ चुनाव जीतेगा नहीं बल्कि अबकी बार 400 पार का लक्ष्य लेकर आंकड़े भी सुनिश्चित करता है… क्या विधायिका के भ्रष्ट्र सिस्टम को यह पूरा भरोसा है की उसकी कार्यपालिका में उत्कृष्ट स्तर के गुलाम पैदा कर दिए गए हैं… और गुलाम अपना काम पूरी वफादारी और निष्ठा से निभाएगा….?
अन्यथा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के समक्ष एक पारदर्शी निर्वाचन प्रक्रिया को शामिल क्यों नहीं किया जा सकता…? यह बड़ा प्रश्न है।
सवाल यह है कि ऐसे प्रश्नों का वजूद आदिवासी क्षेत्र से क्यों उठाना चाहिए जहां उमरिया का पीठासीन अधिकारी सफलता के साथ जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में अपनी भूमिका के लिए चर्चित हो जाता है और हमारी हाईकोर्ट की व्यवस्था अध्यक्ष की सेवा अवधि तक उसे लंबित रखती है… क्योंकि हाईकोर्ट को भी मालूम है कि उनके आदेश का क्रियान्वयन कार्यपालिका तब तक नहीं करती जब तक की कोई याचिका कर्ता, उससे उसके अपने आदेश को पालन करने के लिए याचक की तरह भीख मांग कर गिड़गिड़ता हुआ उनके सामने प्रस्तुत नहीं होता।
यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक सिस्टम है और यह सफलता के साथ अगर चलता रहेगा तो लोकतंत्र आजाद भारत का सफल गुलाम लोकतंत्र अवश्य बन जाएगा जिसमें उत्कृष्ट कार्यो के लिए पुरस्कृत भी किया जाएगा और पुरस्कार विधायिका द्वारा कैसे-कैसे दिए जाते हैं हाल में पहले कर्पूरी ठाकुर को और बाद में लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न पुरस्कार देने से प्रमाणित हो चला है… यही वर्तमान का पारदर्शी प्रमाण है। यानी कार्यपालिका जिसकी जिम्मेदारी वेतन उठाकर परिवार पालते हुये लोकतंत्र को जिंदा रखने की है। वह खोखली होती जा रही है और उसका जमीर अगर पतित हो जाएगा… भ्रष्ट हो जाएगा…. तो वह सीसीटीवी की तरफ देख-देख कर पारदर्शी भ्रष्टाचार करता रहेगा इसमें कोई शक नहीं है…

