
शहडोल अरबों खरबों रुपए मूल्य के प्राकृतिक संपदा व प्राकृतिक संसाधन से भरा हुआ आदिवासी विशेष क्षेत्र यानी भारत के संविधान में पांचवी अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्र है। जहां बहुतायत मात्रा में आदिवासी समाज रहता है और उन्हीं के संरक्षण के लिए संविधान में विशेष गारंटी उनके सुरक्षा और हितों को देखने के लिए बनाई गई है। बावजूद इसके शहडोल क्षेत्र जिसमें वर्तमान का अनूपपुर और उमरिया जिला भी है अक्सर गाहे बगाहे बेकारी और बेरोजगारी के कारण यहां के निवासियों का पलायन हुआ करता है सबको याद होगा की किस प्रकार से कोरोना के कार्यकाल में करीब 11 मजदूर औरंगाबाद के रेलवे लाइन में पटरी पर ट्रेन से कुचल दिए गए थे। क्योंकि उन्हें मालूम नहीं था की ट्रेन स्टार्ट हो गयी है और वह मजदूरी के कारण औरंगाबाद क्षेत्र में फंस गए थे। और वहां से पैदल पटरी पटरी होकर शहडोल आ रहे थे।दयालु और राम भक्त शिवराज की सरकार ने तब उन्हें अपनी तरफ से एक रुपए नहीं दिया बल्कि शहडोल जिले के खनिज न्यास के मद से मृत परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए दिया था।
—————( त्रिलोकी नाथ)——————–
वर्तमान में इन परिवारों की क्या हालात हैं इसकी जानकारी जिला प्रशासन भी कभी चाह कर भी नहीं देना चाहता क्योंकि कड़वी सच्चाई उजागर हो सकती है।बहरहाल फिर इस क्षेत्र में माफिया गिरी के चलते पैदा हुई बेकारी और बेरोजगारी के कारण खबर आई कि आई की धनपुरी के बंद कोयला खदानों में से कई युवाओं की लाशें बाहर निकली हैं। अक्सर माना जाता है की पुलिस और प्रशासन के संरक्षण में वहां का कबाड़ माफिया और कोयला माफिया इन युवाओं को नशे के जाल में फंसा कर बंद कोयला खदानों से कबाड़ और कोयला चोरी करवाने का काम करता रहा है जिस जो स्टॉक करके बाहर भेजा जाता रहा है। ऐसे कई लड़कों को जो बंद खदानों में अंदर गए परिस्थितियों के कारण अंदर ही दम घुटने के कारण मर गए।
अब एक नई खबर शहडोल क्षेत्र की बेरोजगारी को लेकर सामने आई है अमरउजाला में प्रकाशित खबरों के अनुसार 12 आदिवासी को शहडोल पुलिस प्रशासन ने बंधुआ मजदूरी के मकड़ जाल से आंध्र प्रदेश से वापस लाया है। इस प्रकार शहडोल क्षेत्र में जहां की प्राकृतिक संपदा में असीमित संभावना है ताकि स्थानीय लोग बेरोजगार और बेकार न रह सके उन्हें मजदूरी जैसे रोजगार के अवसर तलाश में के लिए अक्सर बाहर जाना पड़ता है। जहां वह अलग-अलग तरीकों से या तो बंधुआ मजदूर बना लिए जाते हैं या फिर किन्हीं कारण से उनकी लाशें वापस आती हैं।
सवाल यह है की मध्य प्रदेश का शासन शहडोल क्षेत्र में पूंजी पतियों और अलग-अलग प्रकार के माफिया को ठेकेदार का नकाब पहनकर पूरे प्राकृतिक संसाधनों में कब्जा कर रखा है, ऐसे रोजगार जिनमें कोई काम नहीं है मिट्टी खोदने का काम, गिट्टी तोड़ने का काम, अथवा रेत निकालने का काम बाहरी माफिया के हवाले है। जिन्हें ठेकेदार बना कर शहडोल क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों की खुली स्मगलिंग होती है हाल में शहडोल में ही दिवाली के दौर पर भी शहडोल वासियों को निर्माण एवं मरम्मत कार्य के लिए भी रेत-बालू नहीं मिला क्योंकि खनिज संसाधन जो ग्राम सभा की वस्तु है और विषय सामग्री है उसे पर राज्य सरकार ने अपने तंत्र को ठेकेदार के रूप में शहडोल के अंडर कब्जा करा रखा है, माइनिंग कॉरपोरेशन नाम की संस्था के हवाले शहडोल की पूरी रेत खदाने हो गई है। पहले यह खदाने जिनकी संख्या वर्तमान में करीब 40 है छोटे-छोटे ठेकेदारों को दी जाती थी जिसे रेत 500 से और 1000रूपये के बीच में प्रति ट्रैक्टर ट्राली मिल जाती थी अब यह असंभव हो गया है कोरोना के बाद अब यही रेट 8 से ₹10000 भी नहीं मिल पा रही है क्योंकि ठेकेदार नामक माफिया-तंत्र ने रेत की स्मगलिंग के लिए उन् खदानों को चालू किया है जो रेत की कमी बता कर के रेत का कीमत आसमान पर ले जा रही है। नतीजतन दिवाली के करीब 4 महीने बाद भी कानून तरीके से शहडोल जिले के लोगों को रेत उपलब्ध नहीं है। बेशर्म संबंधित विभाग यह कहने में हिचक नहीं रखता कि अनूपपुर से अथवा उमरिया जिले से रेत खरीदी जा सकती है। सब जानते हैं कि शहडोल में रेत की नदियां बहती हैं।
जिसमें अपार रोजगार की संभावनाएं हैं किंतु माना जाता है कि पहले विधायक रहे संजय शर्मा की कंपनी वंशिका ट्रेडर्स में जो नौकर नौकरी करते थे वह अब ठेकेदार का नकाब बदल करके शहडोल में पूरे काम पर कब्जा करें बैठे हैं, यानी 3 साल में ही तमाम नौकरों ने इतना पैसा अवैध रूप से पुलिस और प्रशासन तंत्र के सहयोग से मिलकर लूट लिया है कि वह ही अब अरबो रुपए की रेत की संपदा के ठेकेदार बनाकर बैठ गए हैं जबकि उसमें कई लोगों के नाम से पुलिस प्रकरण भी दर्ज है। ऐसे में यदि पुलिस और प्रशासन नीति बनाकर ही अपराधियों को और माफिया तंत्र को शहडोल की प्राकृतिक संपदाओं पर उदाहरण के लिए जैसे रेत खदान में कब्जा करा रखा है और लूटपाट का पारदर्शी तरीका निकाल रखा है यदि शहडोल के निवासी आदिवासी वर्ग बाहर जाकर के बंधुआ मजदूर बनाए जाते हैं या फिर मजदूरी के चक्कर में रेल में कट कर मर जाते हैं या फिर बंद खदानों से माफिया के लिए काम करते हुए मर जाते हैं तो यह सब संविधान की मन्सा के खिलाफ हो रहा गैर कानूनी अनुभव है।
जिन कार्यपालिका अथवा विधायिका के लोगों का जमीर जिंदा हो वही कुछ सोच सकते हैं क्योंकि न्यायपालिका जब तक याचिका नहीं आती तब तक वह सोच सकते की क्षमता भी नहीं रख सकती। कम से कम इन मामलों में संज्ञान लेती नहीं दिखाई दी है
तो क्यादेश की आजादी आदिवासी क्षेत्रों में माफिया गिरी और पारदर्शी लूटपाट और शोषण के लिए लाई गई थी कम से कम ऐसा सोचना भी क्षेत्र के प्रति गद्दारी होगी, फिर क्या कारण है की क्षेत्र के विधायक और सांसद प्राकृतिक संपदाओं पर उससे उत्पन्न होने वाले रोजगार पर स्थानीय आम युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिला पा रहे हैं…? यह कहना गलत होगा कि विधायक और सांसदों को अथवा मंत्रियों को माफियातंत्र ने खरीद रखा है किंतु यह सोचना सही होगा क्षेत्र के इन जनप्रतिनिधियों को उनके चटुकारो ने ऐसा घेर रखा है कि वह इस दिशा में की प्राकृतिक संपदा पर पहला हक स्थानीय निवासियों का हो… वह काम करते नहीं दिखाई देते हैं ।
और यही नपुंसकता शहडोल क्षेत्र के आदिवासियों विशेष के लिए के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है। और क्षेत्र की असीमित रोजगार की गारंटी देने वाली प्राकृतिक संपदाओं पर बाहरी माफिया तंत्र लूटपाट करने में लगा हुआ है। बस उसने कानून का नकाब पहन लिया है। जिसे उतार कर स्थानीय युवाओं को पहला हक सुनिश्चित करना चाहिए। और यह काम ग्राम सभा के जरिए वहां पर चिन्हित रोजगार के अवसरों के आधार पर प्राथमिकता से हो सकता है, फिर भी यह दुर्भाग्य शहडोल क्षेत्र के लिए और इस क्षेत्र के युवाओं के लिए बड़ा अभिशाप बना हुआ है। देखना होगा क्या जनप्रतिनिधियों की इस दिशा में सोचने की कोई चाह भी जिंदा है अथवा नहीं….?

