
यह सही है की भारत के प्रधानमंत्री को “कुतर्क करने की गारंटी” भारत के संविधान में नहीं दी है लेकिन जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी जनमानस से संवाद करते नजर आ रहे हैं विशेष कर भारतीय जनता की धार्मिक पक्ष को उभर कर अपनी बात कहते हैं उसे कोई बड़ी बात नहीं है कि “कुतर्क करने की गारंटी का अधिकार” भी भारत के संसद में पारित कर दिया जाए । ताकि उसे अवैध नहीं कहा जा सके क्योंकि प्रधानमंत्री पद पर बैठे हुए कोई भी व्यक्ति गलत नहीं बोल सकते ऐसा माना जाना चाहिए और प्रधानमंत्री पद में बैठे हुए व्यक्ति की की बोली ही बातों को हमेशा वजन में रखा जा सके ।
—————-( त्रिलोकी नाथ )———–
हाल में साधु-संतों की श्रेणी वाले कांग्रेस के नेता रहे प्रमोद कृष्णन को पार्टी से निष्कासित किया गया, प्रमोद कृष्णन कांग्रेस पार्टी की विचारधारा से हटकर अपनी धार्मिक भावना को सामने रखते हुए अयोध्या के राष्ट्रवाद के राम मंदिर में न सिर्फ शामिल हुए बल्कि कांग्रेस को शामिल न होने पर आलोचना भी की थी और गाहे बगाहे पार्टी की विचारधारा के खिलाफ काम करते रहे। उन्हीं के कल्कि धाम में मंदिर की आधारशिला रखते वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को विपक्ष पर इशारों ही इशारों में हमला कर कहा, ‘आज के युग में अगर सुदामा श्रीकृष्ण को पोटली में चावल देते तो वीडियो निकालकर उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर दी जाती और फैसला आता आपने कुछ नहीं दिया, वरना आज जमाना बदल गया है, आज के युग में भगवान कृष्ण एक पोटली चावल देते। इसका भी वीडियो बना लिया जाता। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला दर्ज हो जाता और इस पर फैसला आता कि भगवान कृष्ण भ्रष्टाचार कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अच्छा है कि इस वक्त आपने केवल भावना प्रकट की और कुछ दिया नहीं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अब समय का चक्र बदल गया है..|
यह संयोग है की लोकतंत्र की हत्या करने के प्रश्न के घेरे में चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में सीसीटीवी के वीडियो से पकड़े गए निर्वाचन अधिकारी अनिल मसीह पर सुप्रीम कोर्ट जब कड़ी कार्यवाही कर रही है और अपना सख्त रुख अपनाती दिख रही है तब प्रधानमंत्री का वीडियो का संदर्भ लेते हुए सुदामा के चावल की पोटली कृष्ण को दिए जाने पर टिप्पणी की है हो सकता है यह कुतर्क को कानूनी तौर पर जल मानस में स्थापित करने का प्रयास हो की निर्वाचन अधिकारी का भ्रष्टाचार अगर भाजपा के पक्ष में हो रहा है तो वह सही है इस संदर्भ में इस संबंध में इतना पारदर्शी भ्रष्टाचार भारत की राजनीति में शायद ही कहीं देखने को मिला हो जिसका परिणाम भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार करते हुए उसे सहित ठहरने का सही प्रयास लगातार होते रहते हैं दैनिक जनसत्ता अपने संपादकीय पर लिखा है।
चंडीगढ़ मेयर चुनाव के बाद पीठासीन अधिकारी ने जो किया, उस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय
में चल रही है। मगर इस बीच वहाँ पार्षदों के पाला बदलने की खबरें आई हैं, उससे यही लगता है कि चुनावी प्रचार के बरक्स चुने गए प्रतिनिधियों का पक्ष एक गंभीर समस्या बन चुकी है। गौरतलब है कि मतगणना के दौरान उभरे विवाद के तूल एकड़ने पर भाजपा के महापौर बने मनोज सोनकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के तीन पार्षदों के भाजपा में शामिल होने की खबर आई। इस पक्ष बदलने की औपचारिक घोषणा होती है, तो निगम में अब भाजपा पार्षदों के कुल मतों की संख्या अठारह हो जाएगी, जो भाजपा को अपने महापौर, उपमहापौर और वरिष्ठ महापौर चुनने के लिए पर्याप्त है। मेयर चुनाव के नतीजों के दौरान जो विवाद उभरा था, वह अब सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर अदालत की सख्त टिप्पणियां आ चुकी हैं। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप के लिए पीठासीन अधिकारी पर मुकदमा चलाने की बात कही।…सवाल है कि मेयर चुनाव में भाग लेने वाले गैरभाजपा दलों की ओर से मतपत्रों के साथ छेड़छाड़ की जो शिकायत की गई थी, वह सही साबित होती भी है तो नतीजा क्या होगा !
तो सवाल यह है की क्या भारत में जी राम राज्य या कल्की धाम के धार्मिक संदर्भों पर राजनीतिक बातें स्थापित की जा रही हैं यही लोकतंत्र के विकास का प्रमाण पत्र होगा और अगर हां तो हमारे पूर्वजों ने लोकतंत्र में जो बलिदान किया है क्या वह इसलिए किया गया था की शोषण और भ्रष्टाचार की जो गाथा अंग्रेज और या अन्य आक्रमणकारी सरकारों ने किया अब हम उन हैं मापदंडों पर धर्म का नकाब ओढ़ कर उसे सहित ठहराने का काम कर रहे हैं कि हम जो कहें या हमारे लिए योग किया जाए वह कार्यपालिका का बलिदान देखा जाना चाहिए और यह बलिदान न्यायपालिका हमारे लिए नहीं कर रही है… (चित्र:साभार एबीपी टीवी)

