
प्रतीत होता है कांग्रेस शासित नगर पालिका परिषद शहडोल में सब कुछ ठीक नहीं है कहने के लिए तो शहडोल नगर पालिका परिषद में कांग्रेस पार्टी का घनश्याम जायसवाल अध्यक्ष किंतु उन्हें के शासनकाल में नगर पालिका परिषद द्वारा बनाए गए प्रकरण में कथित तौर पर कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के ऊपर लगाए गए प्रकरण का निराकरण करा लिया गया है। जबकि इसी नगर पालिका परिषद में नया गांधी चौक स्थित नजूल भूमि पर अवैध रूप से तीन मंजिला निर्माण करने वाले चंद्रलोक वस्त्रालय के नेमचंद जैन जैसे अन्य पर नगरपालिका परिषद कोई निर्णय न्यायालय से नहीं करवा पाई है..
क्योंकि भाजपा कार्यकर्ताओं ने फाइलें दवा रखी हैं बल्कि नगर पालिका परिषद ने अवैध रूप से निर्मित भवन पर धारणाधिकार के तहत किए गए अवैध कब्जे की कब्जे की आधी आराजी पर पट्टा दिलाने का काम किया। यह अलग बात है की शेष भूमि पर आज भी अतिक्रमण व अवैध निर्माण बरकरार रख करके नगर पालिका परिषद ने अपनी कालाबाजारी को संरक्षित करने का काम किया है। जो वास्तव में नगर पालिका से जुड़े टैगोर पार्क का सीमा है।क्योंकि इसके अवैध निर्माण में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग इसे संरक्षण दे रहे थे बल्कि इस मामले में जब तहसीलदार सोहागपुर ने 90000 का जुर्माना लगाया और अवैध निर्माण को हटाने के लिए कार्यवाही की तब तत्कालीन कलेक्टर पर दबाव डालकर कार्यवाही रुकवा दी गई और आज तक अवैध निर्माण को हटाकर नजूल भूमि को मुक्त नहीं कराया गया है ….?
बताया जाता है कांग्रेस के सुभाष गुप्ता द्वारा तथा कथित ट्रस्ट के नाम से बुढार रोड स्थित गणेश मंदिर के पीछे अवैध निर्माण किया गया था| एक अन्य मामले में स्थानीय नगर पालिका द्वारा सुभाष गुप्ता के ऊपर धारा 187(8) नगर पालिका अधिनियम के तहत मुख्य न्यायाधीश मजिस्ट्रेट न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया था जहां सुभाष गुप्ता ने अपराध किया जाना स्वीकार है। समाचार सूत्र वेबाकशक्ति के अनुसार जिस पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती प्रीति साल्वे ने अभियुक्त सुभाष गुप्ता को धारा 187(8) नगर पालिका अधिनियम 1969 के आरोप में ₹1000(एक हजार रुपए)के अर्थ दंड से दंडित किया है साथ ही अभियुक्त द्वारा अर्थ दंड की राशि अदा न करने पर 15 दिवस का कारावास पृथक से भुगताए जाने की सजा सुनाई है। आश्चर्य की बात यह है कि तथाकथित ट्रस्ट को हाई कोर्ट जबलपुर के आदेश पर स्थानीय अनुविभागीय अधिकारी द्वारा भंग कर दिया गया था साथी ही प्रत्येक दिवस मंदिर की तात्कालिक व्यवस्था हेतु तहसीलदार सोहागपुर की अध्यक्षता में तथा अनुविभागीय अधिकारी लोक निर्माण विभाग, थाना प्रभारी कोतवाली, शहडोल राजस्व निरीक्षक सोहागपुर नंबर 1 सदस्यता में अस्थाई कार्यकारी समिति मंदिर की व्यवस्था हेतु गठित की गई थी ।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ गणेश मंदिर ट्रस्ट में ही अवैध निर्माण किए गए हो शहडोल की मोहन राम मंदिर ट्रस्ट में जिसके देख-रेख के लिए हाईकोर्ट के निर्देश पर स्वतंत्र समिति का गठन किया गया है और इस समिति में सरकारी पदाधिकारी तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक और संग्रहालय के अध्यक्ष भी सदस्य हैं इनके कार्यकाल में कई अवैध निर्माण लगातार हुए हैं और किया जा रहे हैं। बल्कि इसी मंदिर ट्रस्ट की खसरा नंबर 138 की 33 डिसमिल जमीन जो करोड़ों रुपए की रघुराज ग्राउंड के बगल में स्थित है उसे पर भी हेरा-फेरी कर दी गई हो वह अवैध निर्माण किया गया है जिन पर नगर पालिका परिषद कोई निर्णय करापाने में अक्षम रही है बल्कि नगर पालिका के कराए गए बोरिंग से उसे निर्माण हेतु पानी भी दिया गया। जिससे मोहन राम मंदिर के अंदर बैठा माफिया नगर पालिका परिषद के पदाधिकारी से अपने तालमेल बनाकर राम मंदिर ट्रस्ट की पूरी प्रॉपर्टी को खुर्द-बुर्द कर रहा है। और नगर पालिका परिषद उसके समस्त अवैध निर्माण को संरक्षित करने का काम करती चली आ रही है। इसके बावजूद भी नहीं देखा गया की पालिका परिषद अवैध निर्माण पर कोई आपराधिक दंड पर निर्णय कर सके…? फिर क्या कारण है की कांग्रेस के अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल के कार्यकाल में जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष गुप्ता पर नगर पालिका परिषद का प्रकरण न्यायालय में शीघ्र निराकरण करवा पाया….? जबकि अन्य अवैध निर्माण के मामलों में कई फायदे आज भी ठंडी बस्ती पर दबा कर रखी गई है जिनका संबंध भारतीय जनता पार्टी की संरक्षण वाले व्यक्तियों से तो क्या जो काम सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बूथ के कार्यकर्ताओं को भाजपा में गले में पट्टा डाल करके लाने की बात कर रहे हैं उसी तर्ज पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष और जमीनी कार्यकर्ताओं को चुनाव के पहले भाजपा में लाने का दबाव बनाए जाने का यह बड़ा उदाहरण है..? जिसके तहत कांग्रेस अध्यक्ष पर दांडिक कार्यवाही नगर पालिका परिषद करा पाई… अन्यथा नगर पालिका परिषद को पारदर्शी तरीके से प्रेस वार्ता जारी करके स्पष्ट करना चाहिए की कितने अवैध निर्माण के मामलों में उसने कार्य किया और कितने मामलों में न्यायालय में निराकरण करा पाई…?

