विकास का पैमाना तो बदल नहीं जाएगा…फिर वोट क्यों देना चाहिए..?? (-त्रिलोकी नाथ-)

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3:00 दोपहर तक शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में लोकसभा संसदीय क्षेत्र की कुल मतदान प्रतिशत तो उपलब्ध नहीं हो पाया लेकिन शहडोल जिले का जो मतदान प्रतिशत सामने आया है उसमें करीब 50% मतदान होने की खबर है विस्तृत चार्ट इस प्रकार से है:-

हलां कि शहडोल में कोई मणिपुर जैसे हालात नहीं है जहां मतदान नहीं करने का संदेश प्रसारित किया गयाहो, हालात लद्दाख जैसे भी नहीं है जो छठवीं अनुसूची लागू नहीं किए जाने के कारण तथा स्थानीय स्वतंत्रता नहीं होने और चीन के बढ़ते अतिक्रमण से रुष्ट होकर गांधीवादी आंदोलन के तहत कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो… शहडोल में स्वयं आदिवासी वर्ग से आने वाली राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू शहडोल में आकर शहडोल को दोबारा पेसा एक्ट लागू करके यह बताने का प्रयास की कि यहां के आदिवासियों को मालूम होना चाहिए कि वह आदिवासी क्षेत्र के लोग हैं और उनका विशेषाधिकार है या नहीं। संविधान में अधिकार प्राप्त छठवीं अनुसूची तो नहीं लेकिन पांचवी अनुसूची शहडोल क्षेत्र में लागू है बावजूद इसके बीते 75 साल में शहडोल का विकास क्रम इस लोकतंत्र में इस प्रकार से किया यह भयानक शोषण का शिकार हो गया और शहडोल कलेक्टर को पिछले दो-तीन साल से लगातार यह बताना पड़ रहा है की शहडोल गर्मी के सीजन में “जल अभाव ग्रस्त क्षेत्र” हो गया है इसलिए पानी की उपयोग सिर्फ पीने के लिए आरक्षित किया जाता है और अनेक अनेक प्रकार की समस्याएं यहां पर लोकतंत्र के लागू होने के परिणाम स्वरूप विकास के नाम पर परोस दी गई है।

———————त्रिलोकी नाथ———————
शहडोल क्षेत्र का अपराध यह था कि यह विरासत में प्रकृति दत्त प्राकृतिक संसाधन का विशाल वैभव का संपन्न क्षेत्र रहा और जितने भी जनप्रतिनिधि चुनकर गए उन्होंने शहडोल को परिणाम लाया की शहडोल क्षेत्र में पीने के पानी की समस्या विकराल होती चली जा रही है। प्रतिवर्ष बकायदे कलेक्टर इसकी घोषणा भी करते हैं। अभी यह गर्मी के मौसम में है ।

आने वाले समय में यह एक स्थाई समस्या के रूप में परिवर्तित हो जाएगी क्योंकि शहडोल क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा कोयला रेत पत्थर जंगल और वर्तमान में सीवीएम गैस अमानवीय तरीके से निकाले जा रहे हैं। और उसका परिणाम यह है की शहडोल का पर्यावरण और पारिस्थितिकी बहुत बुरी तरीके से बर्बाद हो रही है।
शहडोल नगर को ही देख ले जो मुट्ठी भर कोई पांच वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है यहां पर स्थापित विरासत के सैकड़ो तालाबों को बचाकर रख पाने में शहडोल का प्रशासन और पालिका प्रशासन बुरी तरह से असफल रहे हैं। कभी भी एक जनप्रतिनिधि इसे बचाने का परिणाम स्वरुप कोई प्रयास करता दिखाई नहीं दिया। उदाहरण के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सी.एफ. बंगले के पास जिस तालाब को गहरीकरण अपने हाथों से श्रमदान करके किया, लाखों रुपए लगाने के बाद उसे तालाब के कुछ हिस्से को पाठ कर वहां पर चौपाटी बना दिया गया अब उसका पूरा कचरा उसे तालाब में पाटने के काम में आ रहा है।
पास के नदी और नाले वर्तमान में प्रदूषण के मनोरंजन के साधन बन गए हैं जो प्रदूषण निवारण मंडल के भ्रष्टाचार के लिए आजीविका का साधन है।
ऐसा नहीं है कि यहां के लोगों को इसका आभास नहीं है या हम ही भर इसके बारे में सोच रहे हैं सब के सब जानते हैं ब्यूरोक्रेट्स के उन लोगों के अलावा जो आते हैं और चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वह भी जानते हैं की विकास का पूरा पैमाना लूट और शोषण की कानूनी दस्तावेज है । इसके बाद भी स्वयं को उच्च शिक्षित समझने वाला बौद्धिक नागरिक भी इस तरह से प्राकृतिक संपदाओं की लूट का गवाह बना हुआ है। जैसे कि यहां के  आदिवासी वर्ग के लोग इसे बर्दाश्त कर रहे हैं. इसीलिए मैं यह सोचता हूं और अक्सर कहता हूं कि मैं एक आदिवासी पत्रकार हूं। ऐसे जी कर इस बात का संतोष होता है कि मैं भी इस शोषण का हकदार हूं। जैसे आम लोगों को माफिया गिरी की विकास पूर्ण रफ्तार में विनाश के रास्ते में चलना पड़ रहा है।
बीते 75 साल में लोकतंत्र में शहडोल को अर्ध विकसित विकास का पैमाना दिखाए जो शहडोल की विकास का अर्ध सत्य है अब यहां पर माफियाओं का साम्राज्य है अलग-अलग तरीके से छोटे से लेकर बड़े स्तर का माफिया लोकतंत्र की पहचान बनता जा रहा है तो क्या हम जो वोट देते हैं मुफ्त में… क्योंकि संविधान ने इसे “मत का दान” कहकर चिन्हित किया था।
यह अलग बात है की जो वोट संख्या से राजनीतिक बल दल वोट जीतती हैं वह शराब और अन्य प्रलोभन के जरिए मतपेटी तक लाता है जिसे हम विकसित भाषा में ईवीएम मशीन बोलने लगे हैं । यह भी अलग बात है उसमें ढेर सारे संदेह हैं और उस पर उच्चतम न्यायालय का फैसला आने वाला है। इन हालातो में यह विचार स्वाभाविक है कि हमारे मत की कीमत शून्य है..? जबकि जिसे मत लूटना है मतदान के नाम पर उनके मत की कीमत निश्चित है । ऐसे में पूरा पृष्ठभूमि यह मनोबल तय करता है की क्या हमें वोट देने जाना चाहिए था और क्यों वोट देने जाएं…? यह बार-बार मन में प्रश्न उठता रहा और समय बीतता चला गया, यदि एक वोट हमारा पड़ ही जाता तो वोट लूटने वालों या लूटाने वाला सिस्टम विजेता के वोट संख्या में एक संख्या और बढ़ता इससे ज्यादा क्या होगा…? विकास का पैमाना तो बदल नहीं जाएगा…।
शोषणकारी व्यवस्था शहडोल को फिर से हरा भरा कर देगी यह भी संभव नहीं है हमारे तालाब हमको वापस मिल जाएंगे ,हमारे जंगल हमारी खदाने सुरक्षित हो जाएंगे ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है तो फिर वोट क्यों देना चाहिए..? और इस प्रकार समय बीत गया हम इस निराशा भरे वातावरण में वोट नहीं दे पाए, बावजूद इसके कि ना तो हम मणिपुर हैं जहां फौजी की स्त्री को भी, स्त्रियों को निर्वस्त्र कर जुलूस मनाए जाने का उत्सव किया जाता है, हत्या आगजनी और हिंसा तो आम बात है;,ना हम लद्दाख हैं, हां कुछ लोगों ने अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर वोट न देने की पहले घोषणा कर दी थी जिसमें शहडोल क्षेत्र के एक दो गांव पहले से सूचना दे दिए थे। वहां का वोटिंग रेशों क्या रहा यह ईश्वर जाने..?
बहरहाल इस बात का संतोष है कि इस बार जनप्रतिनिधि हमने नहीं चुना है.. अगर शहडोल लगातार नष्ट होता ही जा रहा है.. तो हमारा दोष नहीं है, जैसे वोट देने पर हम दोषी होने का आभास करते हैं उसे मुक्त हो गए.. उस चरित्र पक्षी की तरह जो पैर  ऊपर करके यह सोचती है कि आकाश उसने ही टिका रखा है..।

आखिर अपनी मातृभूमि शहडोल के पिछले विकास की रफ्तार और “बिन पानी सब सून..” की सफलता प्राप्त करने के लक्ष्य वाले लोकतंत्र को वोट न देकर हम अपनी-अपने “स्व-तंत्र” की स्वतंत्रता की क्या रक्षा नहीं कर सकते..? इसका भी एक सुख क्यों नहीं होना चाहिए….? इसलिए भी की इस बार शहडोल संसदीय क्षेत्र में चुनाव, चुनाव के अंदाज पर तो हुआ नहीं, वन-वे-ट्रैफिक चलती चली गई और चुनाव सिर्फ खानापूर्ति के लिए कराए जा रहे थे. कांग्रेस चुनाव लड़ती दिखाई दे नहीं रही थी।
शायद इसी प्रकार से मणिपुर और लद्दाख के आम नागरिक सोचते होंगे और वोट न देने का फैसला करते होंगे, और उसमें संतुष्ट भी होते होंगे.. आज उसी प्रकार की संतुष्टि का भ्रम हम भी जी रहे हैं.. हो सकता है जैसे अन्य विपक्षी पार्टियों का भी आरोप रहा की, यह अंतिम चुनाव है इसके बाद चुनाव नहीं होंगे… क्योंकि कि अगर 400 पार आया भाजपा का तो संविधान बदल दिया जाएगा…?
तो अगर संविधान बच गया, हमारे एक वोट न देने से तो हमें खुशी होगी… और अगर बदल दिया गया तो हमें डबल खुशी होगी.. की अच्छा हुआ मैंने वोट नहीं दिया था और संविधान बदले जाने का दोषी में नहीं हूं…| क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “मोदी की गारंटी” में कहा है कि अगर बाबा साहब आ भी जाएं और संविधान बदलना भी चाहे तो नहीं बदल सकते हैं..? यानी उनके मन में संविधान परिवर्तन की कुछ चेष्टा तो मूल रूप से चल ही रही है…| वैसे संविधान बदलने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि कानून बनाकर जब अपराध किया जा सकता है, “इलेक्टोरल बांड” बनाकर हमारा पूरा भारतीय संसद उसमें 160 अरब रुपए घोषित तौर पर ब्लैकमेल करके या सद्भावना से या फिर दबाव से या फिर धंधा देने के नाम पर इकट्ठा कर सकता है । यानी कानून बनाकर अपराध कर सकता है तो संविधान बदलने की जरूरत क्या है…? यही तो वरदान है ऐसे ही कानून बनाकर देश को आगे चलाया जा सकता है। और हो सकता है जिस तरह निर्वाचन आयोग की नियुक्ति के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के विपरीत जाकर निर्णय लिए गए और मनमानी नियुक्ति की गई इस तरह से इलेक्टोरल बांड को सभी पार्टियों जो भी उसे वक्त बची होगी, उन्हें एनी-हाउ “अपने साथ मिलाकर” वैध करार कर दिया जाए। और इतना सुविधाजनक संविधान को क्यों बदल जाएगा…?इसलिए भी वोट न देकर मुझे संतुष्टता होने का गर्व होगा।

रही बात न्यायपालिका की, तो नजदीक में हम पिछले 12 वर्ष से शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में हाई कोर्ट के आदेश की “लगातार तेरही” होते देख ही रहे हैं… की 2012 का आदेश आज तक उसका पालन कर पाने में शहडोल जिला प्रशासन पूरी तरह से फेल रहा है.. और नतीजा इसका एक तालाब मरने की कगार पर है। बाकी जो हो रहा है वह तो राम राज्य है.. यानी “लूट सके तो लूट, अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट..”
तो क्या इसी प्रकार के लोकतंत्र के लिए हम अपना मत मुफ्त में जनप्रतिनिधियों को दान करते हैं…? इससे बेहतर है कि हम विशेष पिछड़ी जनजाति का होने का गर्व करें कि हमने वोट नहीं डाला क्योंकि अनुभव में अभी तक हमें कीमत नहीं मिली और कोई बात नहीं है।यह फ्रस्ट्रेशन भी नहीं है बल्कि कड़वी सच्चाई है कल तक संसदीय क्षेत्र के मतदान का प्रतिशत भी आ जाएगा वह भी मनोरंजन हम कल करेंगे….।


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