
वैसे हम कोई भविष्यवक्ता नहीं है लेकिन अप्रैल के प्रथम हफ्ते में जब राहुल गांधी शहडोल बाणगंगा में चुनाव प्रचार के लिए आए थे उसे समय के हालात में एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने ही हमें बता दिया था कि शहडोल लोकसभा क्षेत्र करीब चार लाख वोट से कांग्रेस चुनाव हारेगी। इसे संयोग कहना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी करीब 4 लाख वोट(397340) से शहडोल लोकसभा चुनाव क्षेत्र हार गई है ।
यानी बिना चुनाव लड़े ही चुनाव की घोषणा अप्रैल में इस प्रकार से कर दी गई थी जिस प्रकार से गुजरात में सूरत के भाजपा प्रत्याशी दलाल चुनाव जीत गए थे। वह निर्विरोध हो गए थे क्योंकि सभी प्रत्याशियों ने अपना पर्चा वापस ले लिया था। कमोबेश मध्य प्रदेश के इंदौर में भी कुछ ऐसा ही हुआ था जहां प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के सभी दावेदारों ने अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया और शंकर लालवानी अब 1080077 लाख वोटो से अन्य लोगों से जीते हैं। शहडोल में सिर्फ इतना हुआ था कि कांग्रेस प्रत्याशी ने अपना पर्चा वापस नहीं लिया था ।
तो लगभग जब ऐसा हो गया यानी घोषणा उस वक्त हो गई थी कि कांग्रेस चुनाव हार रही है अब जब चुनाव हार गई है तो क्या कांग्रेस के सभी पदाधिकारी अपनी-अपनी जिम्मेवारी लेते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे देंगे..…? फिलहाल यह मुमकिन होता नहीं दिखाई देता क्योंकि अगर भारतीय जनता पार्टी में देश का प्रधानमंत्री अथवा जिम्मेदार लोग यह नहीं मानते कि वह चुनाव 400 पार बोल बोल करके अल्पमत की सरकार बनाकर चुनाव हारे हैं। और नैतिक रूप से इस्तीफा देकर इसलिए किसी अन्य को प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाया जाना चाहिए। तो फिर शहडोल लोकसभा क्षेत्र में वैसे भी आदिवासी विशेष क्षेत्र के कांग्रेसियों के पास ढेर सारे बहाने हैं, पैसा नहीं आया सबसे बड़ा बहाना है।
चलिए कुछ भी हो चुनाव के पहले वरिष्ठ कांग्रेसियों ने चुनाव की हार की गारंटी चार लाख वोटो से शहडोल लोकसभा में ली थी जो पूरी हो गई। इसका मतलब यह भी की सब कुछ आकलन में आ गया था। वह अच्छा भी हो सकता था अगर अच्छा करने की सोच कांग्रेसियों की होती तो वह…। बहरहाल इस बात का संतोष है भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस की ही राजनीतिक उपज है कुछ तो कांग्रेस के प्रति और कांग्रेसियों के लिए उनके मस्तिष्क में हमदर्दी होगी ही और शायद गद्दार कांग्रेसियों के कारण वह निराश और हताशा में बल्कि मजबूरी में भाजपा चली गई थी वह उन्हें शुभ साबित हो रहा है।

