“प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्”.. क्या शहडोल में होगा जल-युद्ध…? ( त्रिलोकी नाथ )

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    तो पानी के लिए युद्ध की घोषणा अहिंसक आंदोलन के जरिए दिल्ली की मंत्री आतिशी ने प्रारंभ कर दिया है भविष्य में भारत का जो जल-युद्ध होने वाला है उसका मॉडल क्या दिल्ली मॉडल होगा अथवा यह है अहिंसा का आंदोलन जब जनमानस के दिल दिमाग में धीरे-धीरे युद्ध के प्रति आस्था दिमाग में कब्जा कर हिंसा में परिवर्तित हो जाएगा..? यह भविष्य की बात है।

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और इसमें कोई शंका नहीं करनी चाहिए की शोषण यदि किन्हीं भी कारणों से जन्म दिया गया हो उसका समापन क्रांति के जरिए सुनिश्चित होता है, यदि समय रहते हुए शोषण की समस्या को निराकृत नहीं कर दिया जाता। लेकिन यह दिए असमान आरक्षण के तरह योग्यता का दमन का प्रमाण पत्र बन जाता है और जो आरक्षण तब पिछड़ी जाति वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए अपनाया गया हो वह वोट बैंक की राजनीति का अहम हिस्सा बन जाता है। यदि ठीक इसी प्रकार से वोट बैंक की राजनीति के लिए जल की समस्या विकरालता के कगार पर आ जाती है तो यह राजनीति की समस्या नहीं बल्कि आम जनता की जिंदगी से जुड़ी हुई समस्या का हिस्सा बन जाता है और जब जनता पागल हो जाती है तो वही होता है जो अनजाने खुदा होता है।

क्या इसी दिशा में दिल्ली की जेल में बंद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मंत्रालय की प्रमुख जल मंत्री अनशन में बैठकर जल की समस्या का निपटारा कर पाएंगे या यही भविष्य का जल-युद्ध का मॉडल होगा.. हमें इंतजार करना होगा इस भयानक सपना के सच होने का… क्योंकि हमने कोविड में निराकरण के रास्ते नहीं अपने बल्कि ताली और थाली बजाकर मोबाइल की लाइट जलाकर राजनीति का तमाशा देखते रहने वाले तमाशाइ नागरिक भी है। यह अलग बात है कि लाखों लोग भारतीय नागरिक इस तमाशा मे बलिदान हो गए। यह तो भला हो लोकतंत्र की महत्वपूर्ण स्तंभ सुप्रीम कोर्ट का कि उसने चिन्हित किया किजो मर गए हैं उन्हें मुआवजा दिया जाए या कोविद महामारी में चिन्हित किया जाए बावजूद इसके कई लोगों को कोविड में करने का सर्टिफिकेट भी हमारे सिस्टम ने नहीं दिया। क्योंकि उन्हें अपने सांख्यिकी आंकड़ों को कम करना था ।और अपनी बची-खुची योग्यता खास तौर से कार्यपालिका की इसमें सिद्ध करना था कि उन्होंने आंकड़े कमकर अपने सच्चे गुलाम होने का प्रदर्शन किए हैं।

तो क्या भविष्य में जो जल युद्ध दिल्ली मॉडल से पैदा किया जा रहा है उसे भी इसी दिशा में ले जाया जाएगा अथवा जल को कोविड की तरह महामारी तो नहीं लेकिन बड़ी बीमारी के रूप में स्लो प्वाइजन की तरह इस्तेमाल किया जाएगा..?
यह देश की बात है लेकिन जब हम शहडोल में इस समस्या को होता देखते हैं तो इसके विकरालता का अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि शहडोल में आदिवासी विशेष क्षेत्र होने के कारण शहडोल की कुछ विधानसभा क्षेत्र में जैसे सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र में कार्यपालिका के एक अफसर की निजी स्वार्थ और राजनीतिक व्यवस्था के कारण इसे भी आदिवासी विशेष क्षेत्र घोषित कर दिया गया और आदिवासी समाज की जो भी प्रतिनिधि हैं वह समस्याओं को चिन्हित करने में कोई रुचि रखते दिखाई नहीं देते उन्हें तो कार्यपालिका और उनके आका चम्मच की तरह इस्तेमाल करते रहते हैं। उन्हें उद्घाटन फीता काटने और उसके बदले विधायक का तनख्वाह पाने और बड़े भ्रष्टाचार के सपने में जीने के लिए छोड़ दिया गया है।

क्योंकि देखा गया है कि शहडोल नगर को यदि मॉडल माने जो की नदी तालाबों का भरपूर नगर था तो इसके जल स्तर और पानी की समस्या को किस तरह बीते 70 साल में अपाहिज और मानसिक रूप से विकलांग राजनीति ने विकराल समस्या के रूप में खड़ा कर दिया है हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि यदि पानी राजेंद्रकोयला खदान से जो वेस्टज के रूप में फेंका जाता है उसे उपयोग करके सरफा नाला के तहत शहडोल नगर वासियों को पीने के लिए न दिया जाए तो सदों के लोग प्यासों मर सकते हैं अथवा दिल्ली की पानीमाफिया गिरी का धंधा कॉरपोरेट जगत लूटने के नए तरीके में आजाद कर लेगा।
तो शायद प्राकृतिक रूप से यह पानी हमें नहीं मिलेगा क्योंकि सरफा नाला के सभी प्राकृतिक स्रोतों पर लगभग शून्यता आ गई है। शहडोल नगर के पूरे तालाबों पर ज्यादातर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोगों अथवा उनके संरक्षण में कब्जा कर लिया है और उसे लगातार भाठा जा रहा है उसके तालाब जल क्षेत्र के रकबे को बुरी तरह से नष्ट किया गया है तालाबों के जल आवक रास्ते को और जल के जाने के रास्ते को इन प्राकृतिक संरचना को बुरी तरह से तोड़ दिया गया है और यह सब काम नगर के मुख्य सड़क मार्गों मुंह में कार्यपालिका और राजनीति से जुड़े लोगों ने जिस तेजी से किया है उससे ज्यादा तेजी से यह काम अंदरूनी क्षेत्रों में माफिया ने वर्तमान राजनीतिक संरक्षण में अंजाम दिया है। तालाबों के प्रति आपसी विश्वास इस प्रकार से नष्ट हो गया है कि तालाबों के संबंध को बाउंड्री बाल बनाकर आम आदमी से दूर किया जा रहा है हाल में सुहागपुर में पोलैंड तालाब पर नागरिकों में यह प्रशासन के साथ विवाद ही खड़ा हो गया है तो सवाल यह उठता है कि नागरिकों का ट्रस्ट तालाब के प्रति प्रशासन ने क्यों बिगाड़ दिया है या ऐसी नीतियां क्यों नहीं विकसित की जा रही हैं जिससे नागरिक मानव का संबंध तालाब के पानी से विश्वसनीय बना रहे…?
कुछ जगह तो भाजपा के पार्षदों ने बकायदे तालाब के ऊपर अथवा बीच से सड़क निकाल दिया और उसमें खुला भ्रष्टाचार किया तो कुछ जगह प्रधानमंत्री आवास स्कीम के तहत अतिक्रमण करा अपने वोटर को बसाकर के उन्हें धारणाधिकार का पट्टा दे दिया गया है । यही काम पहले कांग्रेस के अर्जुन सिंह की सरकार ने तालाबों में झुग्गी झोपड़ी के पट्टे देकर किया था ।
हालात इस तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकार में आते-आते खत्म हो गए की 2004 में जब राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत सोन नदी के संरक्षण के मध्य प्रदेश में 11 नदियों के रूप में चिन्हित हुआ तो 1 साल के अंदर ही सोन नदी को नदी संरक्षण योजना से मध्य प्रदेश के भाजपा सरकार ने गायब कर दिया जिसके तहत शहडोल नगर के तमाम जल स्रोतों और संरचना को सुरक्षित और संरक्षित होना था। ताकि जल की समस्या कभी ना रहे किंतु षड्यंत्र के तहत सोन नदी संरक्षण को नाम विलुप्त करके भाजपा ने नगर को जल-युद्ध में धकेल दिया । मजे की बात यह है कि जो तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष सत्यभामा गुप्ता थी वह उसे कमेटी प्रदूषण नियंत्रण कमेटी में राज्य में सदस्य भी बनी जिसके अधीन सोन नदी को नदी संरक्षण के तहत चिन्हित किया गया था और बाद में गायब कर दिया गया सत्यभामा की नजर में यह बात लाई गई किंतु भ्रष्टाचार जब सर्वोपरि लक्ष्य बन जाता है तो आम आदमी का जीवन कोई कीमत नहीं रखता..? सत्यभामा ने सोन नदी की सत्य को अपने भ्रष्टाचार की कीमत पर खत्म कर दिया..? क्योंकि भाजपा के लोगों को तालाबों को अतिक्रमण करके या तो कॉलोनी बनाना था या फिर उसे नष्ट करना था। वर्तमान में अब प्रशासकीय तरीके से जन अभियान परिषद नमक कमेटी के जरिए फोटो सेशन का काम होता दिखाई दे रहा है वह जिले में एक औपचारिकता किंतु आवश्यक जागरूकता की हिस्सा के तहत आवश्यक हो रहा है लेकिन शहडोल की पड़ती हुई आबादी और उसके भविष्य को जल युद्ध के लिए धागे दिया गया है इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए।
सब कुछ सुनयोजित तरीके से ऐसे चल रहा है जैसे कानून और उसका शासन सिर्फ माफिया के विकास के लिए समर्पित हो..?
इससे शहडोल नगर का जल स्तर उसका भूजल स्तर कई गुना आम आदमी की पहुंच से दूर हो गया और उसकी निर्भरता नगर पालिका के जल वितरण पर जानबूझकर धकेल दी गई की है जिनके पास पैसा था उन्होंने इस जहर को और आगे लगाया भूजल स्तर को बोरिंग के जरिए प्रदूषित करने का काम किया और जल संकट और गहरा था चला गया हर साल यह जल स्तर नीचे की ओर जा रहा है बचा शान शहडोल के आसपास उद्योगपतियों के हित में कोयला खदानें गैस खदानें मनमानी तरीके से आवंटित करके भूचाल स्तर को चारों तरफ से नष्ट कर रही है उससे संबंधित प्रदूषण नियंत्रण विभाग का अधिकारी शायद उसका जन्म ही भ्रष्टाचार के जरिए हुआ था वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता दिखाई देता है क्योंकि उसके पास कोई आंकड़े नहीं है कि किस प्रकार से शहडोल नगर का भूजल स्तर क्यों और किस कारण नष्ट हो रहा है और उसे कैसे बचाया जा सकता है..? वही विलासिता की जीवन में अपने को सुखी समझता है क्योंकि वही उसकी योग्यता है…
तो भविष्य का जल युद्ध अक्सर विवाद का कारण बनते हैं इसकी शुरुआत जो पानी नगर पालिका10 रूपये माह देती थी उसे कार्यपालिका के एक सिरफिरे अधिकारी ने ₹100 माह तक कर दिया आंधी परिषद ने इसमें मनमानी जुर्माना लगाना चालू कर दियाहै। बजाज जल संकट को प्राकृतिक रूप से समझने के…?स्पष्ट है कि सुनियोजित तरीके से माफिया काकस जो कार्यपालिका और राजनीति के गर्भ में पैदा हुआ और संरक्षित है उसने शहडोल नगर के लोगों को प्रकृति दत्त पानी को खत्म करने का काम किया उसे प्रदूषित करने का काम किया और अब उसे महंगा करके आम आदमियों को लूटने का काम हो रहा है।

दुर्भाग्य यह है की नगर में ऐसी कोई राजनीतिक हलचल दिखाई नहीं देती जो इस जल-युद्ध के लिए सतर्क हो, कांग्रेस या भाजपा में जो प्रायोजित नेता हैं उनमें यह क्षमता नहीं है कि वह जल-युद्ध के तमाम काम को लिए शासन और प्रशासन को आगाह कर सकें पालिका परिषद तालाबों को सुरक्षित करने के लिए कोई प्रस्ताव पारित नहीं करते.. वही रट कुछ तालाबों पर वह भ्रष्टाचार के लिए पैसा अप्लाई करती है और फोटोग्राफी के लिए विधायक और सांसदों का उपयोग होता है यही छोटे-छोटे कारण भविष्य में यदि वर्तमान जल संरचना को नष्ट के करने के कारण बन जाते हैं तो उसका परिणाम दिल्ली मॉडल में गंदी राजनीति का उपज होता है… जिसके तहत तात्कालिक समस्या के रूप में तात्कालिक राजनीतिक मांग की जरूरत के हिसाब से दिल्ली की जल मंत्री और उनकी सरकार भाजपा के केंद्र और हरियाणा के राज्य सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठी है… फिलहाल यही समझ में आता है।
इससे एक चीज तो अवश्य शहडोल की कार्यपालिका प्रशासनिक अधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता को चुनौती के रूप में मिलती है क्या उन्होंने जो पढ़ाई की है वह चमचागिरी से आई है अथवा ईमानदारी से और उसमें ईमानदारी से मानव जीवन को जिंदा रखने के लिए विशेष कर जल समस्याको निदान के लिए कोई योजना है..? अथवा वह भी सिर्फ भ्रष्टाचार को लक्ष्य लेकर के सरकारी योजनाओं के खाना पूर्ति करते रहते हैं.. यह उनकी वर्तमान कार्यशैली से सिद्ध भी होगा.. यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है और यही भविष्य का जल-युद्ध वर्तमान का प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् है।


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