
हालांकि नई पीढ़ी लोकतंत्र विरासत में पाई है, बहुत से लोग कुछ हद तक इसे ससुराल के धन जैसा विरासत में मिला हुआ मानते हैं। क्योंकि धन दो ही प्रकार से आ सकते हैं या तो स्वावलंबन से या फिर परालंबन (परजीविता) से, जिसे हम ईमानदारी से या बेईमानी से भी मान सकते हैं..
तो बात कर रहे थे विरासत में लोकतंत्र ने हमें क्या दिया..? देश की आजादी के बाद से हमें आधुनिक लोकतंत्र के कठपुतली (कंगना रानौत) की भाषा में समझे तो 2014 के बाद आजादी प्राप्त हुई और एक वास्तविक आजादी जो 1947 में हमें 1857 के बाद 90 साल की सतत कड़े अहिंसात्मक युद्ध के प्रयोग से संघर्ष मे प्राप्त हुई। हलांकि जाते-जाते ब्रिटिश साम्राज्य ने खिसियानी बिल्ली की तरह इसे जातिगत जमात में बदलने का काम भी किया जो भारत और पाकिस्तान के रूप में प्रकट हुआ। जैसे गल्फ कंट्री में फिलिस्तीन और इजरायल के बीच में संघर्ष आज भी बरकरार है उतना ही अमानवीय जितना हजारों साल में आदियुग का आदमी लड़ता रहा है। बस थोड़ा सा संसाधन अत्याधुनिक हो गए।
——————( त्रिलोकी नाथ)———————–
आजादी के बाद आजादी से जुड़ी हमारे पास दो दिवस संज्ञा के रूप में आए एक था 15 अगस्त 1947 को हर वर्ष मनाया जाने वाला “स्वतंत्रता दिवस” और दूसरा है 26 जनवरी 1950 का संविधान लागू होने का गणतंत्र दिवस।कठपुतली की भाषा में माने तो 2014 में जो आजादीआई, उसने दो और नए दिवस दे दिए.. 15 अगस्त को उत्साह और उमंग से मनाने के पहले आत्महत्या कर लेने जैसे वाली नकारात्मक “विभाजन विभीषिका दिवस” का दिवस 14 अगस्त को स्थापित किया गया। इसी तरह 26 जनवरी संविधान के लागू यानी जन्म लेने के दिन के एक दिन पहले अंक 25 जून तारीख को “संविधान हत्या दिवस” को स्थापित किया गया यानी 14 तारीख को “विभाजन वविभीषिका दिवस” और 15 तारीख को “स्वतंत्रता दिवस”; 25 तारीख को “संविधान हत्या दिवस” और 26 तारीख को “संविधान निर्माण दिवस” यानी “गणतंत्र दिवस” मनाया जाने की दो तिथियां और शामिल कर लोकतंत्र में उन लोगों के हिसाब से स्थापित किया गया है.. जिन्हें आजादी विरासत में मिली.., संघर्ष में नहीं।
सच में देखा जाए तो भारत की आजादी के पहले दो आइडियल व्यक्ति एक जैसे थे.. दोनों का चरित्र अलग-अलग परिस्थितियों में बदल गया.. मोहम्मद अली जिन्ना भी आजादी के पूर्व स्वतंत्रता के बड़े नायक रहे उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम योगदान दिया… लेकिन आजादी के बाद वह खलनायक बन गए… भारत के लिए।, क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों की “फूट डालो” का साथ दिया… यह अलग बात है कि वह पाकिस्तान के आदर्श पुरुष है।
इसी तरह आजादी के पहले तब तक जब तक की वीर दामोदर राव सावरकर, अंडमान की जेल में नहीं भेजे गए तब तक वह आदर्श आजादी के योद्धा थे, और हिंदुओं के आइडियल विचारक भी.. किंतु आजादी के बाद उनका रूप रंग चाल चरित्र चेहरा अंग्रेजों के लिए काम करता हुआ दिखाई देने लगा.. ऐसा कहा जाता है उनकी राष्ट्रभक्ति जेल के पहले और जेल के बाद जमीन आसमान की तरह बदल गई… इस तरह मोहम्मद अली जिन्ना की राष्ट्रभक्ति आजादी के पहले और आजादी के बाद भारत के लिए जमीन आसमान की तरह बदल गई… इस तरह समय काल और परिस्थिति ने दोनों की आईडियोलॉजी आदर्शवाद में बदलाव एक जैसा है.. समय का अंतर था, यह प्रकट चारित्रिक सत्य है।
किंतु ऐसे भी महान नेता हुए महात्मा गांधी जैसे जिन्होंने इस प्रकार की आजादी को कभी स्वीकार नहीं किया.., वह स्वतंत्रता के कट्टर पक्षधर थे जिसमें मानव समाज की स्वतंत्रता का चरित्र स्थापित था.. फिर चाहे वह देश का स्थिति से बड़ा हो या उस पार हो… इसीलिए वह पूर्ण जागृत व्यक्ति के रूप में अस्तित्व सहज नियम के परिचायक भी थे।
आज हम भी हमारा समाज इस सतत संघर्ष को जी रहा है जो महात्मा गांधी के विचारों आजादी के बाद भी में अधूरा है.. यही कारण है कि 1947 की आजादी और कठपुतली के अनुसार 2014 की आजादी मैं जो लोकतांत्रिक दिवस निर्धारित किए गए हैं उनका चाल चरित्र और चेहरा स्पष्ट रूप से पृथक पृथक दिख रहा है। तमाम परिस्थितियों के बाद जबकि हम 81 करोड लोगों को पेट भरने के लिए 5 किलो अनाज देने को पाते हैं जबकि मध्य प्रदेश की आधी आबादी इन महिलाओं को मुक्ति का 19000 करोड रुपए दे कर यह प्रमाणित कर रहे हैं की आर्थिक रूप से यह आबादी महिलाओं की बुरी तरह से आर्थिक पतन की कगार पर है, भारत विश्व की तथाकथित पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था से चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था को जंप करके तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की लंबी छलांग लगाने जा रहा है ऐसा प्रधानमंत्री बार-बार दावा करते हैं।क्योंकि भारत उस महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने जब यह देखा कि यहां के लोग गरीबों के कारण कपड़े नहीं पहन पा रहे हैं तो उन्होंने कपड़ा पहनना छोड़ दिया बैरिस्टर होते हुए भी, किंतु आज का भारत 81 करोड़ गरीब लोगों का होने के बावजूद अंबानी के शादी पार्टी में तीसरी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कर रहा है
जिसका एक प्रमाण पत्र दो गुजराती उद्योगपति अदानी और अंबानी में एक अंबानी के परिवार में विवाह उत्सव पर होने वाला खर्च प्रमाणित हो रहा है। यह अलग बात है कि इस प्रकार की आजादी की अर्थव्यवस्था में शहडोल जैसे भारत के अन्य स्थान में भी में आर्थिक अपराध नींव की ईंट की तरह खड़े होते हैं। स्पष्ट तौर से पारदर्शी रूप से नई आजादी के बाद संविधान की हत्या करते हुए 2009 में अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सीबीएम मीथेन गैस के लिए काम करना चालू किया संवैधानिक तरीके से इस उद्योग को शहडोल कलेक्टर के अधीन खनिज विभाग से नियमो और कानून में अनुबंध करके गैस का उत्सर्जन करना था.. किंतु 2024 यानी 25 साल बीतने के बाद भी अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने बिना अनुबंध के शहडोल से कीमती सीवीएम गैस को गैर कानूनी तरीके से निकलकर बेचने का काम कर रही है।
यही काम हमारे किशोरी लाल चतुर्वेदी किया करते थे वह भी सैकड़ो लोगों को गैर कानूनी तरीके से कोयला के खनिज उद्योग में लगाकर रखते थे उन्हें बुढ़ापे में शहडोल की पुलिस ने 420, 467 जैसे कई धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया। किंतु 25 साल बीतने के बाद भी मुंबई के रहने वाले मुकेश अंबानी या किसी भी गुर्गे को जो शहडोल में काम कर रहा है। अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है.. अथवा उनके साथ कानूनी कार्यवाही नहीं किया गया है क्योंकि वह “संविधान हत्या दिवस” को उत्साह से मानने वाला एक महत्वपूर्ण गुजराती घटक है..शहडोल पुलिस की माने तो जबकि हमारे किशोरी लाल चतुर्वेदी इसी शहडोल जिले के मसीरा गांव में रहने वाले स्थानीय निवासी घटक हैं …वह भी उतनी ही तन्मयता से संविधान की हत्या करते रहे….|; जितनी तन्मयता से राष्ट्रीय स्तर पर मुकेश अंबानी और उनकी फैक्ट्री करते हैं ऐसे में अंतर कहां है यह हमारे लिए स्वतंत्रता से सोचने का विषय है..?
जो स्थिति जेल जाने के पहले वीर सावरकर की राष्ट्रभक्ति में थी, जो स्थिति मोहम्मद अली जिन्हा की आजादी के पहले राष्ट्रभक्ति में थी, वही स्थिति आर्थिक साम्राज्यवाद के अपराधिक विस्तार को 1947 (वास्तविक आजादी) और 2014 के तथाकथित वास्तविक आजादी के बाद देखी जा रही है… खासतौर से इसे हम संविधान की पांचवी अनुसूची शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में देख सकते हैं।कहा जाता है बक्सवाहा में हीरे की खदान के लिए मध्य प्रदेश में समूल जंगल नष्ट किया जा रहा है इस तरह छत्तीसगढ़ में एक बड़ा समूल जंगल नष्ट किया जा रहा कथित तौर पर गुजराती अडानी के लिए किया जा रहा है।
इस तरह भारत में दो प्रकार के नागरिक पैदा किया जा रहे हैं एक वह जो तीसरी अर्थव्यवस्था को लक्ष्य में रखते हैं.. और दूसरे वह जो सरकारी भीख 5 किलो अनाज पाने को लक्ष्य में रखते हैं… स्पष्ट तौर पर जब करोड़ों आदमी के लिए आजादी के मायने अलग हो गए हैं,, और मुट्ठी भर या कहना चाहिए ऊंगली भर आदमियों के लिए मायने अलग हो रहे हैं.. तो आजादी के बाद लोकतंत्र के दिवस भी अलग किया ही जाने चाहिए थे… जिससे भ्रमजाल स्वतंत्रता का बरकरार रहे… यानी 14 तारीख को विभाजन विभीषिका दिवस और 15 तारीख को स्वतंत्रता दिवस; 25 तारीख को संविधान हत्या दिवस और 26 तारीख को संविधान निर्माण दिवस.. यही आधुनिक संसदीय राजनेताओं की राज-नीति है जो सिर्फ पंचायती व्यवस्था का पंचायत बनकर सामने आ रहा है… यह अलग बात है कि लोकतंत्र के आमलोगों के लिए इसमें क्या कुछ हित छुपा भी है अथवा नहीं…? किंतु जो दिख रहा है उसमें यह सर्वाधिक अहितकारी होता सिद्ध हो रहा है।
फिर चाहे राजनीति पक्ष की हो या विपक्ष की दोनों ही भारत के लिए शुभ सिद्ध नहीं हो रहे हैं.. कुछ साल उन्होंने राज किया अब इनकी बारी है… चाहे 400 पार हो या ना हो.. देखना होगा ऐसे में हमारा लोकतंत्र, गांधी (राहुल गांधी नहीं) के विचारों में कब तक जीवित रहता है..? क्योंकि संविधान की हत्या दिवस को मना कर हमने सिद्ध कर ही दिया है कि संविधान मर चुका है…; जो दिख रहा है वह कुछ और है… वह रहस्य में है.. ऐसा संविधान हत्या दिवस बनाने वाले प्रमाणित कर रहे हैं| यह अलग बात है कि जिस आपातकाल के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उपयोग किया था वह शायद उन्हें संविधान में ही प्रदत्त किया गया रहा होगा और जब उन्होंने लोकतंत्र के चुनाव कराए.. वह भी उन्हें संविधान ने ही अधिकार दिया रहा होगा….? बहरहाल वर्तमान में “संविधान की जय..” बोलने वाला एक पक्ष है तो दूसरा पक्ष “संविधान की हत्या को याद करने के लिए दिवस की घोषणा करने वाला करने वाला भी एक पक्ष है… और यही वर्तमान लोकतंत्र का कड़वा सच है…
जिसे हम जी रहे हैं…अथवा यही एक आपातकाल है जिसे हम रहस्यमय तरीके से जी रहे हैं।… कम से कम शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में हम यही देखते हैं जिसमें सहज अस्तित्व नियम के तमाम सिद्धांत पर्यावरण और परिस्थिति की विनष्ट हो रही है। और दूसरा पक्ष इसे ही विकास की स्थिति बता रहा है।
( त्रिलोकी नाथ)

