
कहते हैं हजारों साल हो गए वर्णवाद की व्यवस्था को भारत में चलते हुए और जब देश की आजादी हुई ऐसा नहीं है उसे व्यवस्था में कुछ अच्छाई ना रही हो आज जब बेरोजगारी की महामारी को देखता हूं तो चतुर वर्णी व्यवस्था में जन्मजात रोजगार की गारंटी को नहीं भूला पाता और लोकतंत्र को इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए था सिर्फ श्रममूल्य आगे बढ़ा देते तो तमाम वर्ण व्यवस्था की बीमारियां अपने आप खत्म हो जाती। किंतु लोकतंत्र में वर्ण व्यवस्था संभव ही नहीं है, लेकिन यह नए रूप में जरूर आ गई है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे। चतुर्वर्णीय व्यवस्था में परिवर्तन हो गया लोकतंत्र सिर्फ 75 साल में तथाकथितअमृत काल भी आ गया। यह अलग बात है की वास्तविकता कुछ और है लेकिन इस वास्तविकता को प्रमाणित करने के लिए लोकतंत्र की व्यवस्थापिका का अंर्तचतुर वर्णी व्यवस्था का ब्राह्मण यानी कार्यपालिका का उत्कृष्ट भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) का समाज का पतन का दौर हमें बार-बार प्रमाणित होकर मिला। कुछ लोगों के कारण पूरा समाज भ्रष्टाचार का मॉडल बन चुका है। कुछ लोग ही होंगे जो कर्तव्य निष्ठा से इस इस समाज की उत्कृष्टता को प्राप्त करने के बाद उसकी गरिमा को बचा के रखते हैं।
हालांकि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के पालनहार इसमें भी दो टुकड़े कर दिए हैं एक वह जो प्रत्यक्ष परीक्षा देकर इस समाज का हिस्सा बनता है, दूसरा वह जो व्यवस्थापिका यानी कार्यपालिका के अनुभव से कई साल सर्विस होने के बाद अपनी कथित गुणवत्ता के आधार पर इस की डिग्री हासिल करता है। किंतु यह समाज में अपवाद ही देखने को मिले हैं कि उन्होंने इस की उत्कृष्टता को बरकरार करके रखा हो।
बहरहाल हम बात कर रहे थे जो प्रत्यक्ष परीक्षा के थ्रू अपनी शैक्षिक गुणवत्ता के द्वारा आइ ए एस की डिग्री हासिल करते हैं और इसके बाद उसे डिग्री को पचा पाते हैं ज्यादातर लोगों को उल्टी हो जाती है। यह देखा गया है। किंतु धीरे-धीरे या कहना चाहिए अन्य लोकतांत्रिक करणो से इसमें इतना प्रदूषण हो गया है कि इस पर और इसकी गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह स्वाभाविक रूप से लगने लगे हैं ।
इन्हीं प्रश्न चिन्ह को प्रमाणित करते हुए एक युवा महिला पूजा खेड़कर ने तो सभी सीमाओं को तोड़ दिया और उसने लोकतंत्र में उपलब्ध समस्त भ्रष्टाचार का रसास्वादन करते हुए न सिर्फ इस की डिग्री हासिल की बल्कि उसे हासिल करने के तत्काल बात जो 75 साल में इस समाज में प्रदूषण प्रमाणित हुआ है उसे पर वह उतराने लगी। परिणाम स्वरुप उनकी डिग्री भी वापस हो गई और अब उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।
यानी देश की आजादी के बाद यह पहली बार देखने को मिला है कि इस समाज में एक “भ्रूण-हत्या” हो गई है इसे ऐसे भी कहा जा सकता है की हजारों साल ब्राह्मण मस्तिष्क को परिपक्व होने में जातिगत व्यवस्था में बदलने में जो समय आया लगा उसे प्रदूषण होने में भी उतना समय लगा और वह पतित भी हो गया… किंतु सिर्फ 75 वर्ष में जब देश अपना तथाकथित अमृत काल जी रहा है तब कार्यपालिका का यह ब्राह्मण मस्तिष्क की भ्रूण हत्या हो जाना प्रमाणित करता हैकी पूरी व्यवस्था चरमरा गई है अथवा उसे प्रमाणित किया जा रहा है कि यह समाज नकारा साबित हो रहा है।
वैसे भी देखने को मिला है कि जो कर्तव्य आईएएस होने के बाद पदस्थ अधिकारियों को मिलता रहा है उन्होंने कर्तव्य निष्ठा से उसका पालन नहीं किया है बल्कि नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस पद को राजनीतकियों की गुलामी के लिए सौंप दिया है ताकि वह व्यक्तिगत जीवन में अपने और अपने परिवार का पेट पाल सके। जबकि भारतीय प्रशासनिक सेवा की डिग्री देश सेवा के लिए मात्र होती है और शासन भी इतना ज्यादा व्यवस्था सुख और सुविधा रुपए और पैसा देता ही है कि उसे यहां वहां मुंह मारने की जरूरत नहीं है। लेकिन कहते हैं कि जब भ्रष्टाचार का प्रदूषण फैलता है तो वह किसी को नहीं छोड़ता। किंतु बीते 10 वर्ष के दौर में ही यह चुनौती भारतीय प्रशासनिक सेवा के समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को मिल चुकी है कि वह डिग्री हासिल करने के बाद मैंने अपने प्रारंभ दिवस इस महत्वपूर्ण सेवा को प्राप्त करने के बाद भ्रष्टाचारियों और व्यवस्था की गुलामी कम से कम आंशिक रूप से स्वीकार करता है अथवा देश के प्रति वफादारी लेकिन आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में या राज्य स्तर पर जो देखने और समझने को आया है इस समाज के अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति जो जागरूकता का प्रदर्शन का अवसर उन्हें मिलता है तो वह उन्हें नजरअंदाज करते हैं यह कहकर कि फलां नेता का, फलां अफसर का फोन आ गया था और हमको भी अपना परिवार का पेट पालना है ,नौकरी करना है शायद इसीलिए यह समाज अपने कर्तव्य पथ से भटक गया और यह भटकाव की धारा कहां से चल रही है इसके पूजा खेड़कर ने प्रमाणित किया है। अच्छा हुआ है कि संबंधित प्रबंधन ने अपने नैतिक दिशा का प्रदर्शन करते हुए देश के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए ही सही एक भ्रष्ट जन्म ले रहे भारतीय प्रशासनिक सेवा में एक वायरस को खत्म करने का काम किया। पता नहीं यह महिला होकर कितनी खतरनाक इस देश के लिए साबित होती। इसलिए यह हर युवा भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य अधिकारियों के लिए सबक भी है और देश के प्रति वफादार रहने का संदेश भी कि उसे लोकतंत्र और लोकतंत्र की भोली भाली जनता जनार्दन के हित में समर्पित रहना चाहिए। न्याय, सत्य और अपने प्रशासनिक धर्म उसकी अटूट निष्ठा का प्रदर्शन होना भी चाहिए और दिखाना भी चाहिए अन्यथा भ्रूण हत्या से बच पाए अन्य लोगों लोकतंत्र को जो नुकसान पहुंचा रहे हैं वह उन्हें कितना गुलाम बना रहा है यह दिख भी रहा है।
कहने के लिए इस समाज का अपना एक संगठन भी है किंतु कभी नहीं देखा गया की जिम्मेदारी से भ्रष्ट राजनेताओं की नीतिगत मामलों में जिन्हें यह संगठन जानता है कभी खुलकर देश के प्रति निष्ठा जताता हुआ प्रदर्शित हो। बल्कि अपवाद में कहीं कोई अधिकारी युवा व्यक्ति सामने आ गया तो उसे पूरा समाज यह सीखाने में लग जाता है कि समाज बचाना है तो भ्रष्टाचार को और अनैतिकता को अपनी गुणवत्ता के स्तर पर स्वीकारना पड़ेगा और शायद उसी का यह परिणाम भी है की शीर्ष स्तर पर जहां इस समाज के बच्चों का जन्म होता है वहां पर भ्रष्टाचार भ्रूण हत्या करना पड़ा…इस भ्रूण हत्या(बध) के लिए बहुत-बहुत बधाई । क्योंकि गंगा को पवित्र रखने के लिए पहली शर्त यह है कि ऊपर से साफ सफाई होनी चाहिए अमृतकाल में अगर यह सफाई प्रारंभ हुई है तो इसे लोकतंत्र की जीत ही कहा जा सकता है।

