और फिर हुई पेपर मिल में क्लोरीन गैस एक्सीडेंट; कोई नई बात नहीं… ( त्रिलोकी नाथ)

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             बीते शनिवार को ओरिएंट पेपर मिल में अक्सर होने वाला क्लोरीन एक्सीडेंट फिर से हो गया फिर से कुछ लोग बेहोश हो गए कुछ लोग लंबे समय के लिए क्लोरीन अटैक से प्रभावित हो गए। एक खबर अखबार में थोड़ा सा छप गई और शहडोल का सिस्टम अनवरत फिर चालू हो गया। किसी नए एक्सीडेंट के लिए किसी नए एक्सीडेंट की इंतजार में हमारी व्यवस्था सालों से इसी प्रकार से हर दुर्घटना को आम दुर्घटना की तरह दिखाने के लिए मामले में थोड़ा सा उठा पटक कर लेती है लोकतंत्र का एक्सरसाइज भी हो जाता है।
कहते हैं कि क्लोरीन एक्सीडेंट के बाद वहां डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं रहा कंपाउंडर से काम चलाना पड़ा। तो चुकी कई सालों से यह घटना हो रही है और प्रशासन इस मामले में लगभग असफल रहा है हर बार एक जांच कमेटी बनती है हर बार उसमें कुछ अधिकारी आते हैं प्रबंधन का कोई भी व्यक्ति आपराधिक दंड से दंडित होता नहीं देखा गया। औद्योगिक सुरक्षा वह संबंधितों के लिए ऐसी दुर्घटनाएं अधिकारियों वह नेताओं के लिए ओरिएंट पेपर मिल एक नियमित चारागाह है ।
—————–( त्रिलोकीनाथ)—————————–
इस क्लोरीन एक्सीडेंट के मामले में शायद इसी प्रकार की व्यवस्था ने रिलायंस इंडस्ट्रीज को भ्रष्ट सिस्टम में जीने का अवसर दे दिया निश्चित तौर पर इसमें नेताओं का अपना बंदर बांट भी सुनिश्चित होगा इसलिए वह अक्सर औद्योगिक दुर्घटनाओं को लेकर जरा भी सतर्क नहीं है। और कोई भी सबक लेने को तैयार नहीं है ।
यह बात बार-बार स्पष्ट हो रही है की मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस ईवीएम इंडस्ट्रीज शहडोल से जो मीथेन गैस निकाल रही है वह एक बड़ा विस्फोटक संभावना वाला उद्योग है, दक्षिण में ऐसे ही उद्योग में विस्फोट होने से कई लोग मर गए हैं वह भी एक क्लोरीन एक्सीडेंट की तरह खबर बनकर रह गई। कुछ लोग दंडित हो गए होंगे शायद …? इसीलिए इस दुर्घटनाओं को आदिवासी विशेष क्षेत्र में आम दुर्घटना की तरह देखने के लिए नागरिकों मेंआदत डालने का बंधुआ मानसिकता को प्रबंध किया जा रहा है।
देखा गया है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज आदिवासी विशेष क्षेत्र की गैसखनिज संपदा उत्खनन के लिए करीब 20 वर्ष के लिए ठेका लेती है उसे मध्य प्रदेश में लागू होने वाले खनिज नियमों के तहत खनिज अनुबंध कराया जाना चाहिए था । क्योंकि इसी में आसपास के रहने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित भी है।हमारा प्रशासनिक व्यवस्था लगातार रिलायंस इंडस्ट्रीज से विनती करता चला आ रहा है बार-बार पत्राचार कर रहा है कि वह खनिज अनुबंध के नियमों के अधीन एग्रीमेंट साइन करें; इस नियम में मध्य प्रदेश शासन को करोड़ों रुपए का राजस्व भी मिलना है स्टांप ड्यूटी के जरिए और इन सबसे बड़ी बात की एक नियामक व्यवस्था के तहत नियमित तरीके से रिलायंस इंडस्ट्रीज को गैस निकालने की प्रक्रिया से गुजरना होता है जिसमें इस बात की सुनिश्चितता होती है की आसपास के स्थानीय आदिवासी विशेष क्षेत्र के निवासी जनो की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. इसी प्रकार से अन्य कई प्रावधान औद्योगिक दुर्घटना की सुरक्षा के लिए सुनिश्चित होते हैं . फिलहाल 2024 तक अगर 20 साल का अनुबंध माने तो अनुबंध खत्म होने के लिए 5 साल रह गए हैं इसके बाद उन्हें नया अनुबंध करना पड़ेगा अगर उत्पादन नियमित जारी रहता है तो..।
तो अनुबंध खत्म होने को आया है और जिस अनुबंध को साइन करके ही गैस निकाली जा सकती थी अन्यथा नहीं.. उस अनुबंध पत्र को रिलायंस इंडस्ट्रीज अपने पैर की जूती की नोक में रखते हुए अंग्रेजी में पत्राचार करके प्रशासनिक अधिकारियों और शासन में बैठे नेताओं को गोल-गोल घूमाती रहती है ।पिछले पिछले 14-15 साल से रिलायंस इंडस्ट्रीज सफलता के साथ इस अपराध को लगातार कर रही है अगर कोई स्थानीय आदमी एक ट्रैक्टर रेत भी निकलता है तो उसका ट्रैक्टर पकड़ जाता है उसके बैंक लोन में वह बर्बाद हो जाता है उसके बावजूद इस राजस्व का दंडित होना पड़ता है। संभावितरूप मे जेल भी जा सकता है इसके लिए ट्रैक्टर मालिक को ऊपर का भी पैसा देना पड़ता है यह शहडोल के स्थानीय निवासियों के लिए दंड प्रावधान है; लेकिन उद्योगपति मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के सामने पूरी व्यवस्था गुलामों की तरह जी-हुजूरी में दिखाई देती है वह शायद किसी बड़ी औद्योगिक दुर्घटना के इंतजार में है…? तब यह सुनिश्चित होगा रिलायंस इंडस्ट्रीज के अधिकारियों कीकिसी भी दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं है… क्योंकि वह तो पेटी कॉन्टैक्टर और फ्रेंचाइजी सिस्टम पर आउटसोर्स के जरिए पूरा काम करती है… यानी जिस प्रकार की विश्व व्यापी स्तर पर चर्चित गैस दुर्घटना भोपाल में घटी थी जिसे सदियों याद करना पड़ेगा इसके असर आज भी हैं उसे स्तर का तो नहीं कि उसे कम भी नहीं और खान या पाइपलाइन गैस दुर्घटना रिलायंस इंडस्ट्रीज से संभावित क्यों नहीं है…?
    मध्य प्रदेश का खान सुरक्षा विभाग भोपाल गैस त्रासदी से शायद कुछ भी नहीं सीखा है और इसको प्रमाणित करने के लिए बार-बार ओरिएंट पेपर मिल्स में क्लोरीन गैस एक्सीडेंट होता रहता है लोग मरते भी होंगे…? देर सवेर उसके व्यापक असर उसे व्यक्ति के जीवन में पढ़ते होंगे… जो इससे प्रभावित होता है तो इसकी मॉनिटरिंग कोई करता ही नहीं।ऐसे में “दुर्घटना करो और दरिया में फेंक दो” के अंदाज पर आदिवासी विशेष क्षेत्र जो भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में सुरक्षित है औद्योगिकआपराधिक षडयंत्र का प्रयोगशाला बन गया है… प्रयोगशाला के कारण पर्यावरण और पारिस्थितिकी को जो भयानक नुकसान होगा या हो रहा है इसकी गणना का कोई उचित भी नहीं समस्था इसलिए जनता को इसकी जानकारी भी नहीं होने पाती।
जब रिलायंस इंडस्ट्रीज मध्य प्रदेश शासन के नियमों को ही मानकर नहीं चलती है अनुबंध नहीं करती है करोड़ों रुपए का स्टांप ड्यूटी की चोरी करती है…? ऐसा कहना चाहिए तो वह अफसर को नियमित रूप से खुश रखना कुछ नेताओं को पैसे की जूठन फेंक देना और एक कुशल गिरोह की तरह अपनी औद्योगिक गतिविधियों को समाप्त करने की दिशा में काम करना उसका लक्ष्य बन गया है…. क्योंकि उन्हें स्थानीय निवासियों से कोई लगाव नहीं है दुर्घटना होगी तो लोग मरेंगे या घायल होंगे और लंबे समय तक प्रभावित रहेंगे यह मोदी की गारंटी सुनिश्चित है की मुकेश अंबानी और अन्यायोक्ता जो रिलायंस इंडस्ट्रीज के शीर्ष प्रबंधन में है तथा दूसरी लाइन के स्थानीय अधिकारी गण वह तो नहीं मारेंगे और ना ही घायल होंगे और बिना अनुबंध के चल रहे काम में कोई फर्क पड़ने वाला है….शायद इसी बात का भ्रष्टाचार का भयानक बंदरबांट ऊपर होता होगा आखिर में इन्हीं मध्य प्रदेश की न दिए गए अथवा चोरी किए गए राजस्व से ही से कहीं तो बंदर बांट है. कौन उसे अपने जेब से देना है।
यही हाल ओरिएंट पेपर मिल के लिए रहे हैं राजस्व की चोरी उनकी एक व्यवस्था बन गई थी वेलफेयर के नाम पर प्रशासन कार्यपालिका और विधायिका को खुश रखना वही उनका प्रबंधन हो गया था और इसीलिए ओरिएंट पेपर मिल्स में इसमें आज भी एक भयानक क्लोरीन एक्सीडेंट का इंतजार है और उससे भी भयानक गैस त्रासदी का इंतजार रिलायंस इंडस्ट्रीज से भी क्यों नहीं करना चाहिए…?
लेकिन परेशान मत हो इन दोनों दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या क्षेत्र रहने वाले निवासियों के अनुपात में नाम मात्र की होगी अगर आप फंस जाएंगे वह आपका दुर्भाग्य होगा इससे ज्यादा कुछ नहीं .. यही इस आदिवासी क्षेत्र की नियत बनती जा रही है।
सांसद और विधायक ऐसे मुद्दों को समाधान की स्थिति तक आखिर क्यों नहीं ले जाते क्या वह जनप्रतिनिधि ; यह बड़ा प्रश्न है ।नियमित रूप से और बार-बार होने वाली क्लोरीन एक्सीडेंट ने इसे प्रमाणित कियाहै अन्यथा अफीम का जिम्मेदारबड़ा अधिकारी जेल में होता और उससे पहले संबंधित सरकारी सुरक्षा अधिकारी सस्पेंड हो गया होता.. दोनों नहीं हुआ यही आदिवासी क्षेत्र का लोकतंत्र है..


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