
इस समय मैं जहां फरीदाबाद में ठहरा हूं वहां पर यानी सेक्टर 16 में कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार का कोई नाम लेने वाला नहीं था, यानी चुनाव प्रचार का पर्चा मुझे नहीं दिखा इसके बाद भी जब “माहौल क्या है..” में राजीव रंजन इसकी चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने यहां पर भारतीय जनता पार्टी को हराते हुए दिखाया यानी उसके पक्षधर लोग कम ही उनके शो में बोले। मैं आश्चर्यचकित रह गया..? तो क्या इस बार वास्तव में हरियाणा की में कांग्रेस पार्टी की सुनामी चलेगी…? 8 तारीख को जो रिजल्ट घोषित हो रहे थे तब शुरूआती रुझान इसी तरह के आते दिख रहे थे.. लेकिन 12:00 बजे के बाद उन रुझानों ने घर वापसी कर ली। यानी भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने की सरकार में पहुंच गई और रिजल्ट में सरकार बन गई। इस सुनामी का असर कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के चुनाव क्षेत्र में उनकी जीत के अंतर से जरूर देखा वह 71465वोट के अंतर से चुनाव जीत गए। लेकिन यह सुनामी जल्द ही दम तोड़ दी ….
………….(त्रिलोकीनाथ)………..
और शाम ढलने के पहले वही होना था जो हुआ, विधानसभा चुनाव में हरियाणा के लिए; कांग्रेस पार्टी के जयराम ने निर्वाचन आयोग पर तड़ातड़ प्रश्न उठा दिए, जितनी जल्दी प्रश्न उठा उससे ज्यादा जल्दी निर्वाचन आयोग का उत्तर भी आ गया… वह और आश्चर्यजनक था यह उत्तर सुनामी की गति से कम नहीं था । बहुतायत देखा गया है की निर्वाचन आयोग इतनी जल्दी उत्तर नहीं देता है। कम से कम हाल के इतिहास में यह निर्वाचन आयोग तो यही करता देखा गया है।और देर शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस में 90 और 99 के चक्कर में निर्वाचन आयोग को कटघरे में कांग्रेस ने खड़ा कर दिया। विस्तार से जब विस्तृत आंकड़े आ जाएंगे की एवं कहा कि एवं की बैटरी जहां 60-70% थी वहां पर कांग्रेस जीती और जहां 99% थी वहां पर भारतीय जनता पार्टी कैसे जीत गई…?हरियाणा चुनाव परिणाम पर प्रतिक्रिया देते हुए जमीनी किसान नेता राकेश सिंह टिकैत ने कहा जीत की राजनीति का जो मकर जल है वह हमारी समझ से परे हैप्रदेश की जनता नाराज थी फिर जीत के मत कहां से आ गए. कहा, किसानों और बेरोजगारी जैसी समस्या है प्रदेश की जनता नाखुश है फिर भी वोट किसने किया.. यह समझ से परे है.

प्रश्न तो बनता ही है कि क्या बैटरी की सुई अटक गई थी अगर यह बात सही है तो..? यह प्रश्न पहली बार नहीं उठा है। शहडोल मध्य प्रदेश में भी मतदान ईवीएम मशीन खुलने पर बैटरी के फूल होने पर प्रश्न चिन्ह उठाए गए थे कि आखिर बेड एवं की बैटरी का जब उपयोग हो गया है तो वह लगभगफुल चार्ज क्यों मिली…?
तो यह प्रश्न भारतीय निर्वाचन आयोग के सामने तो खड़ा ही है और विस्तार से इस तरह की जांच मांग रहा है जिस प्रकार से अत्यंत गोपनील तरीके से“इलेक्टोरल बांड” में भाजपा के लिए फंडिंग वन वे ट्रैफिक के स्टाइल में क्यों छप्पर फाड़ करके भारतीय जनता पार्टी को अरब-खरबपति बना दिया… और जिस प्रकार “इलेक्टोरल बांड” की गतिविधियां संदेह के घेरे में पूरी तरह से खड़े हैं इस प्रकार निर्वाचन आयोग “बैटरी के कम चार्ज और फुल चार्ज” के मामले में संदेह के कटघरे में खड़ा हो चुका है..।
निर्वाचन परिणाम की प्रक्रिया के पहले राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में मैं गया हुआ था भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद वहां पर आने वाले थे, मुझे भी उत्साह लगा। लेकिन वहां पर सिर्फ आमंत्रित लोगों को बैठने की अनुमति थी। इसलिए मैंने दूसरे दिन में अखबार में पूर्वराष्ट्रपति जी ने क्या बोला उस पर देखा। स्पष्ट तौर पर पूर्व राष्ट्रपति कोविद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति पर व्याख्यान देने आए थे… लेकिन उन्होंने पूरा व्याख्यान केंद्रित कर दिया था “एक राष्ट्र एक चुनाव पर” जबकि पूर्व राष्ट्रपति जी ने अपनी कमेटी में स्पष्ट तौर पर चुनाव एक साथ कराए जाने पर सिफारिश कर ही दिया है फिर क्या जरूरत थी की लाल बहादुर शास्त्री व्याख्यान माला पर वह एक साथ चुनाव कराने को हवा देने आए थे..?
तो क्या यह पृष्ठभूमि में इस चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए हरियाणा के चुनाव की बैटरी कम होना या फुल चार्ज होना अथवा जम्मू कश्मीर की भी जो परिणाम आएंगे उसके बारे में भी बैटरी का फुल चार्ज होना या कम चार्ज पाया जाना एक निर्णायक सुनियोजित मतदान प्रक्रिया की परिणाम- परिस्थिति का प्रयोग है… और इसका प्रयोग हमें आगे भी महाराष्ट्र झारखंड अथवा दिल्ली के चुनाव में एक बार और प्रयोगशाला के रूप में होता दिखाई देगा कि आखिर कितना हल्ला होता है इवीएम वोटिंग मशीन की कार्यप्रणाली के संदेह पर…
मैं नहीं मानता की निर्वाचन आयोग निष्पक्षता तथा विश्वसनीय के क्रांतिकारी स्थिति पर खड़ा होना चाहिए. उस पर ऐसे प्रश्न उठाना ही लोकतंत्र की सुनियोजित हत्या का एक तरीका है.. इसलिए इस पर प्रश्न उठाना ही बेहद गंभीर परिस्थितियों पर इस देश को ला खड़ा करता है। जो हारता है वह ऐसे आरोप-प्रत्यारोप करेगा ही और उसे पर कितना बवाल मचता है जनता इस बवाल को किस स्तर पर विश्वास करती है और उस विश्वास से जनता-जनार्दन में किस तरह की क्रांति अथवा बदलाव के लक्षण दिखते हैं..? क्या इसमें भी क्या प्रयोग हो रहे हैं…?
स्पष्ट तौर पर कांग्रेस पार्टी ने यह नहीं कहा है की पूरी विधानसभा क्षेत्र में इस प्रकार के प्रश्न उठे हैं.. लेकिन चयनित रूप से जिन भी स्थान पर ईवीएम वोटिंग मशीन की बैटरी फुल पाई गई वहां कांग्रेस ने प्रश्न चिन्ह खड़े किए हैं… तो क्या जहां कांग्रेस पार्टी चुनाव जीती है वहां वास्तव में ईवीएम मशीन की बैटरी फुल थी…? या नहीं थी…? इसके आंकड़े निर्वाचन आयोग को जारी करना ही चाहिए…।
इस पर अब कोई प्रश्न नहीं रह गया है कि ईवीएम मशीन को कितना प्रभावित किया जा सकता है..। हमने हाल में देखा है इज़रायल और लेबनान के युद्ध में किस तरह से अपने पैसे से जेब में खरीद कर रखी गई “पेजर मशीन” पर जो मोबाइल की जगह है। वैकल्पिक तौर पर संदेशों का आदान-प्रदान करती थी उसे मशीन पर एक झटके में इजरायल ने अपनी इलेक्ट्रॉनिक ताकत से बम विस्फोट किया। आम आदमी की जेब में रखी पेजर को हथियार के रूप में उसकी बैटरी का उपयोग किया और वह मशीन कई लोगों की मौत का, तो हजारो लोगों की घायल होने का कारण बनी। जो स्पष्ट तौर पर प्रमाणित हुआ है उस घटना ने तो व्यक्तिगत तौर पर मुझे इस बात के लिए दहला दिया की जो मोबाइल हम 10000 से लेकर ₹1 लाख तक या लाखों रुपए तक खरीद कर अपने जेब में रखे हुए हैं अगर वह “मेड इन चीन” का है तो क्या होने वाले कभी भी संभावित युद्ध होने के हालात में चीन मेरे जेब में रखे हुए मोबाइल को हथियार की तरह इस्तेमाल करके मुझे विस्फोट से घायल कर सकता है या मेरी हत्या कर सकता है …? निश्चित तौर पर अभी इस प्रश्न का जवाब भारत सरकार ने या किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्थान है नहीं दिया है।
हम आदिवासी स्तर के पत्रकार हैं इसलिए हमारी सोच बैकवर्ड होनी ही चाहिए .. चाहिए हम कितने भी फॉरवर्ड क्यों ना हो जाए.. इसलिए भी मुझे आदिवासियों की तरह सोचा ही चाहिए.. क्योंकि भारतीय संसद में इज़रायल से भारत सरकार द्वारा अनुबंधित तथा कथित कंप्यूटर सॉफ्टवेयर “पैगासेस” के जरिए तमाम नेताओं, राजनीतिज्ञों , पत्रकारों, न्यायाधीशों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों की जो जासूसी मोबाइल के जरिए करवाई जा रही थी उन आरोपों का भी अभी स्पष्ट प्रमाणित तौर पर निराकरण नहीं हुआ है। भलाई उस बात को हवा में उड़ा दिया गया.. वह बात उसी तरह पूरी तरह से जिंदा है जिस प्रकार से सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित कर दिए गए “इलेक्टोरल बांड” की बात जिंदा है…. ,जिस प्रकार से “ईवीएम मशीन पर कम बैटरी और ज्यादा बैटरी चार्ज” का मुद्दा कांग्रेस जिंदा करने के प्रयास में लगी है…
और निर्वाचन आयोग शुतुरमुर्ग की तरह उसमें आंख मूंदे हुए हैं। भलाई सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम मशीन के इश्यू पर अपने आदेश में उसे पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं करने की बात कही है, तो पैगासेस के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश नहीं किया है। वह तो बात ही वहां जाने के पहले दम तोड़ दी। भारत के संसद में पैगासेस उपहास की तरह उड़ाया गया…? जबकि पैगासेस मामले को और उसे विध्वंसक कार्यप्रणाली को लेबनान में पेज़र मैं विस्फोट अटैक के माध्यम से इजरायल ने प्रमाणित किया है कि वह ऐसा कर सकता है …
तो लोकतंत्र में क्या यह सब प्रयोग हो रहे हैं… और भारत के लोकतंत्र में क्या इन्हीं प्रयोग के लिए आक्रमण के रूप में निर्वाचन आयोग के जरिए “एक साथ चुनाव” की बात की पृष्ठभूमि सुनिश्चित की जा रही है…? अन्यथा पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी सिफारिश दे दी है उसको मनाना या ना मानना केंद्रीय मंत्रिमंडल और भारत सरकार का मुद्दा है . पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जरिए बार-बार उसे पर प्रश्न उठाने.. उसे पर सहमति बताना… बहुत उचित नहीं लगा।, अगर स्मृतियां स्व. प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की व्याख्यान माला की थी ..? तो क्या यह स्पष्ट न माना जाए की हरियाणा का चुनाव मील का पत्थर साबित होने जा रहा है जम्मू कश्मीर का भी चुनाव। और इसके बाद अगर एक साथ चुनाव नहीं कराई जाने की स्थिति में “महाराष्ट्र अथवा झारखंड का चुनाव या दिल्ली का चुनाव उसकी “स्वतंत्रता की सहनशीलता” में यह अंतिम प्रयोग के रूप में कहलायेंगे ….?
और इसके बाद एक साथ चुनाव एक राष्ट्र चुनाव का बम पटक दिया जाएगा ।क्योंकि एवं की मशीन 99% जहां फुल चार्ज रहेगी वहां भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जीतना ही जीतना है। या फिर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष उन्हें समर्थन देने वाले उम्मीदवारों के पक्ष में भी फुल चार्ज बैटरी लोकतंत्र में विस्फोट करने वाली है यह बड़ा प्रश्न है… तो तैयार रहिए “एक राष्ट्र-एक चुनाव” के लिए और इसके बाद अघोषित तौर पर घोषित तरीके से लोकतंत्र को हाईजैक करने की कार्यप्रणाली पर भी… ऐसा हमें क्यों नहीं सोचना चाहिए..
क्योंकि हम बैकवर्ड, अनुसूचित दलित क्षेत्र संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित और सुरक्षित आदिवासी विशेष क्षेत्र के रहने वाले पत्रकार हैं, ऐसा मानकर भी हम सोचते हैं..
हो सकता है हमारी सोच गलत हो.. ईश्वर करे हमारी सोच गलत ही हो; अन्यथा हजारों वर्ष की गुलामी और लाखों लोगों की सहीद होने की परंपरा के हम आप स्थाई साक्षी होंगे कि हमने इस इतिहास को जिया है। देश लोकतांत्रिक तरीके से किस प्रकार गुलाम होता है.. मन में आया, कह दो आखिर आदिवासी पत्रकार हैं और कोई बात नहीं… क्योंकि कानून हमारे क्षेत्र में इसी प्रकार से प्रमाणित तौर पर दम तोड़ता है.. वह मरता नहीं है जिंदा रहने का प्रयास करता भर रहता है.. कम से कम शहडोल की मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज के मामले में शहडोल ही नहीं, मध्य प्रदेश की कार्यपालिका और देश की कार्यपालिका को पिछले 15 वर्ष से गिड़गिड़ाते हुए दम तोड़ते हुए हमने प्रमाणित तौर पर पाया है। कि उसने इस क्षेत्र की कानूनी सुरक्षा का “गैस खनिज काअनुबंध नहीं किया है” और नहीं करेगा…. हम देखेंगे कि क्या न्यायपालिका भी ऐसा ही प्रयास करती नजर आती है..? अगर हां.. तो पहले कौन दम तोड़ता है… इस लोकतंत्र को बचाने के लिए । हमारी न्यायपालिका या फिर हमारा भारतीय निर्वाचन आयोग इसकी प्रतियोगिता भी हम देखना चाहेंगे.. यह अलग बात है कि हम उसके लिए कितना सक्षम हैं ; या हो सकते हैं..? यही हरियाणा और जम्मू कश्मीर के बाद होने वाले महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के चुनाव के परिणाम में घोषित भी होगा की बैटरी फुल चार्ज होती है तो क्या होता है…? बैटरी कम चार्ज होती है तो क्या होता है…? जय हो लोकतंत्र की…

