क्या 2025, औद्योगीकरण का सूर्य के उत्तरायण का मार्ग प्रशस्त करेगा..?-( त्रिलोकी नाथ )

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       सरकारी कोयला खदान और बिजली कारखाना को छोड़ दें तो देश की आजादी के बाद शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र अंचल में तमाम प्राकृतिक संपदाओं से परिपूर्ण होने के बावजूद भी मोटा-मोटी दो-तीन कारखाने ही निवेश के लिए लगाए गए। 1965 में ओरिएंट पेपर मिल अमलाई के बाद शहडोल में रिलायंस इंडस्ट्रीज कोयला आधारित गैस पर 2009 में लगी और सरकार इन्हें खूब प्रोत्साहित किया। अनुभव के अनुसार उद्योगपतियों के लिए वरदान बन शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन उद्योगपतियों के आकर्षण का केंद्र रहा। वावजूद इसके इन दो उद्योगों को सरकार की तरफ से औद्योगिक प्रोत्साहन के लिए असीमित छूट दी गई। मात्र कागजी खाना पूर्ति करके लाभ पहुंचाने का भी काम किया गया किंतु शहडोल आदिवासी अंचल के लोगों को उसके अनुरूप कोई खास रोजगार परक क्रांतिकारी लाभ नहीं मिलते देखा गया। —–( त्रिलोकी नाथ )—–

ओरिएंट पेपर मिल्स को तो सोन नदी का पूरा पानी ही उपयोग करने की छूट दे दी गई थी जो आगे चलकर प्रदूषण का कारण बना। बल्कि शासन को एक अनुबंध का कागज 1970 में ओरिएंट पेपर मिलने एक भरोसे के रूप में दिया जब कभी सरकार सोन नदी के पानी पर कोई टैक्स सुनिश्चित करेगी वह उसे राजस्व का भुगतान करेगी किंतु जैसा कि होता है कि उद्योगपति, सत्ता के लोगों को खरीद लेते हैं उस कारण 1998 तक सोन नदी से जल कर के रूप में कोई नियम बना ही नहीं बना अथवा बनाया गया। जब बात 1992 में सामने लाई गई और चौतरफा पत्रकारिता के माध्यम से घेराबंदी की गई तब कांग्रेस के दिग्विजय सिंह शासन काल में 1998 में अपना मन मार करके सोन नदी से पानी लेने पर कानून बनाया गया। तब करीब 300 करोड रुपए पिछला बकाया के रूप में चिन्हित किया गया था, जो दिया तो नहीं गया भाजपा की सरकारें भी आए और छूट पर छूट मिलने के बाद अब वह करीब 100 करोड रुपए देनदारी जस की तस खड़ी हुई है। हां, नियमित मासिक भुगतान पर हमारी कार्यपालिका थोड़ा बहुत दबाव बना पाई है जो हो रहा है। बात 1965 में जो ओरिएंट पेपर मिल की मंसा के साथ खड़ी हुई थी वही 2009 में मुकेश अंबानी की नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज कंपनी ने पुनः दोहरा दिया, तब रिलायंस इंडस्ट्रीज ने मध्य प्रदेश शासन के साथ अपेक्षित खनिज के विहत नियमों के अनुसार उद्योग लगाने का काम किया किंतु 15 साल बीत जाने के बाद भी खनिज विभाग से कोई अनुबंध नहीं किया है। बल्कि दिल्ली में अब उद्योगपति मुकेश अंबानी का प्रबंधन इस प्रकार का वातावरण बनाने में कामयाब होता दिख रहा है की दिल्ली की कार्यपालिका आपस में यह विमर्श कर रही है कि मुकेश अंबानी की शहडोल स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज को किस प्रकार से खनिज अनुबंध से संभावित राजस्व करोड़ों-अरब रुपए की छूट दिलाई जाए और बाकायदा दूसरे राज्यों का हवाला दिया जा रहा है कि यदि वहां पर ऐसी छूट मिल सकती हैं तो मध्य प्रदेश में क्यों नहीं मिल सकती….?माना जाता है कि अगर मध्य प्रदेश खनिज नियम के अनुसार गैस उत्खनन का अनुबंध किया जाएगा तो कई करोड़ों रुपए मध्य प्रदेश शासन को राजस्व के रूप में मिल जाएंगे। जो अभी 20 साल के लिए हुए खनन पट्टे में 15 साल बीत जाने के बाद भी खनिज अनुबंध नहीं किया गया है।
यह मध्य प्रदेश में आदिवासी विशेष क्षेत्र में औद्योगिक प्रोत्साहन बढ़ाए जाने के सरकारों के तमाम प्रकार के भरपूर प्रयास रहे हैं इन सब के बावजूद भी इस आदिवासी विशेष क्षेत्र में ढेर सारी प्राकृतिक संसाधन के साथ मानव संसाधन का सबसे सस्ता बाजार होने के बाद भी उद्योगपति यहां पर निवेश करने से परहेज करते रहे हैं जो आश्चर्यजनक है।वास्तव में देखा जाए तो शहडोल उद्योगपतियों के लिए एक वरदान के समान है और भारी लाभ और प्रोत्साहन का धंधा भी जहांराजनीतिक हस्तक्षेप लगभग शून्य रहता है। वहीं पर उद्योग के प्रति समर्पण की भावना आम मजदूर की दायित्व बन जाता है ऐसा देखा गया है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के अनुसार शहडोल में करीब 20,000 करोड रुपए के निवेश होने की संभावना है जो निश्चय ही शहडोल के इस आदिवासी विशेष क्षेत्र को क्रांतिकारी औद्योगिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करेंगे ।जिसमें हजारों लोगों की रोजगार के अवसर भी मिलने की संभावना हो जाएगी किंतु जिस प्रकार से अभी कोल ब्लॉक कार्य करने का तरीका अपनाए हैं उससे इन दावों की सच्चाई में प्रश्न खड़े होने लगते हैं…? तब जब बाबूलाल गौर उद्योग मंत्री हुआ करते थे रिलायंस इंडस्ट्रीज को लगाना था और शहडोल में आकर उन्होंने स्पष्ट कहा था कि 90% रोजगार स्थानीय लोगों को भरकर किया जाएगा। किंतु ऐसा होता नहीं दिखा बल्कि गैस पाइपलाइन के जरिए गैस पूरी तरह से शहडोल क्षेत्र से निर्यात की जाने लगी। बल्कि स्वयं जो रिलायंस इंडस्ट्रीज के द्वारा गैस आधारित पावर प्रोजेक्ट लगाए जाने थे उसे पर भी उन्होंने चुप्पी साध ली..? और सरकार की प्रतिबद्धता उनके नेताओं के दावे झूठे साबित हो गए ।
इसलिए औद्योगीकरण से होने वाला लाभ शहडोल को पीछे धकेल दिया। अब एक नए सपना का सरकार “रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव” के माध्यम से होने जा रहा है यह सिर्फ पॉलिटिकल इवेंट न बनकर रह जाए इस पर आयोजकों की निष्ठा का प्रदर्शन होगा। क्योंकि इतने बड़े औद्योगिक सम्मेलन में जब स्थानीय बैगा समाज की भूमि पर हेरा फेरी करने वाले भू-माफिया टाइप के लोगों को  यदि उद्योगपति का नकाब पहनकर प्रस्तुत है तो प्रश्न तो खड़े ही होंगे…?
किंतु शहडोल को खनिज संपदा से हटकर आखिर अन्य प्राकृतिक संसाधनों वन संपदा पर आधारित औद्योगिक निवेश का प्रदर्शन ही यह तय कर पाएगा की क्षेत्रीय पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अनुसार यदि जब औद्योगिक विस्तार होता है तो वह वरदान साबित होना ही होना है। शहडोल में लघु वनोपज संपदा ढेर सारी ज्ञात- अज्ञात अथवा विलुप्त हो रही जड़ी बूटियां पर आधारित निवेश शहडोल के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। शहडोल नगर के विरासत में मिले तलावों पर निवेश करता आकर्षित अगर होते हैं तो यह पर्यावरण की दृष्टिकोण से अद्भुत होगा किंतु सवाल यह है की औद्योगिक स्टार्टअप करने वाले लोग भी क्या इस सेक्टर पर भरोसा को आगे बढ़ा पाएंगे ।पर्यटन का क्षेत्र शहडोल के लिए अत्यंत क्रांतिकारी क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है खुद केंद्रीय मंत्री रहे शहडोल के पूर्व कांग्रेस नेता स्वर्गीय दलवीर सिंह ने अमरकंटक से पेंड्रा के बीच में रोप-वे के जरिए पर्यटन का सपना देखा था अगर वह आज होते तो निश्चित तौर पर पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन से अमरकंटक तक का रोप-वे का बड़ा काम हो गया होता है। क्योंकि वह उस पर कटिबद्ध थे, उनकी दूर-दृष्टि में इस आदिवासी अंचल का पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास का यह एक भव्य मॉडल प्रदेश में सबसे बड़े रोप-वे का पर्यटन उद्योग खोल सकता था, जिसकी संभावना 16 जनवरी के रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव में दिखेगी…, यह भी देखने लायकहोगा। क्योंकि यह कोई नई बात नहीं थी पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन से ही रोप-वे के जरिए अमरकंटक क्षेत्र के बॉक्साइट खदानों का बॉक्साइट निकालकर निर्यात किया जाता था। हालात को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस पर रोक लग गया था। किंतु मानव आधारित पर्यटन के लिए इस पर कोई रोक नहीं है। बावजूद इस पर अभी तक काम नहीं हो पाया।

सुनहरे सपने का संसार का मार्ग बन पाएगा रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव
रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव (क्षेत्रीय औद्योगिक सम्मेलन) में पहली बार औद्योगिक क्रांतिकारी कदम की दृष्टिकोण से शहडोल के इंजीनियरिंग कॉलेज में यह विमर्श शहडोल के लाखों आबादियों का आकर्षण का केंद्र भी होगा जो उनके सुनहरे सपनों को साकार करने की क्षमता रखता है निश्चित रूप से इस सम्मेलन के जरिए औद्योगिकरण को माध्यम बनाकर स्थानीय संसाधन को लाखों युवकों और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं यदि निवेश कर्ता ईमानदारी के साथ निवेश को प्रोत्साहित करेंगे। तो यह कांक्लेव मील का पत्थर साबित होगा इसमें कोई शक नहीं है। किंतु यदि पूर्व में औद्योगिक अनुभव के हिसाब से क्षेत्रीय पिछड़ापन के नाम पर सिर्फ सरकारी-छूट के लिए उद्योगपति अपने संभावनाओं को देखेंगे तो अभी यह कहना बहुत मुश्किल है की क्षेत्रीय जनाकांक्षाओं को यह सम्मेलन वरदान साबित होगा…? उम्मीद करना चाहिए की औद्योगिक विकास के साथ स्थानीय मानव संसाधन विकास क्षेत्रीय पर्यावरण संरक्षण व सामान में के साथ औद्योगिकरण का सपना साकार करने में यह सम्मेलन सफल होगा।

बहरहाल आज पत्रिका समाचार पत्र ने अमरकंटक के शानदार फोटो कवर की है


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