
“प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम्”ऊंचे लोग ऊंची पसंद…. धड़ाधड़ मार रहे हैं चौआ और छक्का;उपराष्ट्रपति के बिगड़े बोल और और नष्ट होते हमलोग….
चलिए मान लें कि यह क्रांतिकारी विचारवीर हैं और ऐसे विचार अगर खौलते ही रहते हैं इन क्रांतिकारियों के दिमाग में तो वह उसे वक्त क्यों आत्महत्या कर लेते हैं जब देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू को अपेक्षित स्थान में चाहे वह भारत के नए संसद के उद्घाटन का अवसर हो.. या फिर 500 साल के बाद निर्मित हुए राम मंदिर के लोकार्पण मैं प्राथमिकता देने की बात हो… अथवा उन्हें छतरपुर में एक छोटे से कार्यक्रम में बागेश्वर धाम में हाजिरी लगाने को पहुंचने की बात हो… अथवा भारत रत्न देते वक्त लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष बैठे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खड़ी हुई भारत की राष्ट्रपति के नैतिक प्रोटोकॉल के पालन न होने की बात हो; इन क्रांतिकारी विचारों के विचार शून्य क्यों हो जाते हैं…? (त्रिलोकीनाथ)
संविधान के पहले शब्द में कहा गया है हम-लोग, यानी हम भारतीय नागरिक आम लोग हैं हमें यह माना जाता है कि हम कुछ भी बोल सकते हैं क्योंकि संविधान के बारे में हमारा ज्ञान उतना परिपक्व नहीं है जितना की क्रमशः विधायक, सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का ज्ञान परिपक्व होता है। और जो जितना वरिष्ठ होता चला जाता है माना जाता है वह संविधान का उतना ही ज्ञान रखता है।अब कोई वकील रहे बाद में राज्यपाल हो गये और वर्तमान में उपराष्ट्रपति हैं जगदीप धनकड़ जी, तो जब वह बोलते हैं तो कानून ही बोलते होगें ऐसी हमारी धारणा युगों से चली आई है। राजतंत्र में माना जाता था रानी के पेट से राजा ही पैदा होता है जो वह बोलता है वह कानून होता है इसी धारणा को लोकतंत्र में बढ़ाने का प्रयोग हो रहा है। भाषा शैली कुछ इसी दिशा में प्रकट हो रही है।
अगर धनखड़ जी पिछड़े वर्ग के हैं ऊपर से किसान हैं वकील तो है ही, तो कानून जानने का आरक्षण उनका उतना ही ज्यादा मजबूत हो जाता है ऐसी हमको धारणा रखनी चाहिए। ऐसा वातावरण का निर्माण होता दिख रहा है। तो पहले जान लेते हैं ऊपर से उपराष्ट्रपति जी ने क्या कहा..?
‘सुपर पार्लियामेंट बन जाएंगे’ नवभारत टाइम्स के अनुसार अद्यतन स्थिति मेंअपने विचार प्रवाह में प्रसिद्ध श्री धनकड़ ने कहा ने राज्यसभा के इंटर्न के एक कार्यक्रम में कहा था, ‘हम ऐसी स्थिति नहीं रख सकते जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और किस आधार पर?’उन्होंने आगे कहा, ‘एक हालिया फैसले में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहां जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमें बहुत संवेदनशील होना होगा। यह किसी के रिव्यू फाइल करने या न करने का सवाल नहीं है। हमने इस दिन के लिए लोकतंत्र की सौदेबाजी नहीं की। राष्ट्रपति को समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने के लिए कहा जा रहा है, और यदि नहीं, तो यह कानून बन जाता है।’ धनखड़ ने यह भी कहा, ‘तो हमारे पास ऐसे जज हैं जो कानून बनाएंगे, जो कार्यकारी कार्य करेंगे, जो सुपर पार्लियामेंट के रूप में कार्य करेंगे, और बिल्कुल कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है।’ उनका कहना है कि जज कानून बनाने लग जाएंगे, तो कार्यपालिका का काम भी करेंगे। वे संसद से भी ऊपर हो जाएंगे और उन पर किसी का नियंत्रण नहीं होगा।क्योंकि, देश का कानून उन पर लागू नहीं होता।हालांकि, विपक्षी दलों ने वक्फ एक्ट पर कोर्ट की टिप्पणी और राष्ट्रपति को दिए गए निर्देश की सराहना की है।
यह अलग बात है सुप्रीम कोर्ट के अंदर भी अपनी एक समस्या है जो यशवंत वर्मा जस्टिस जैसे लोगों के घर में जब करोड़ों रुपए की नोट जले हुए पाए जाते हैं तो उसे पर प्रमाणित कोई अपराधी प्रकरण दर्ज नहीं होता यह कड़वी सच्चाई है। बावजूद।
अब भाजपा सांसद दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए लिखा है, “कानून यदि सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद भवन बंद कर देना चाहिए।” भाजपा की ओर से देश की सर्वोच्च अदालत पर यह बहुत बड़ी टिप्पणी है।
कुछ और नेता भी इसी प्रकार से बोलते ही रहते हैं तो प्रश्न तो उठता ही है की उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ की अपने अनुभव के आधार पर मजबूरी हो सकती है उन्हें राष्ट्रपति बनने की लालसा किसी भी सीमा पर पहुंचा सकती है लेकिन चौथी बार सांसद हुए निशिकांत दुबे उस सीमा को भी पार कर जाते हैं.. तो क्या प्रतियोगिता हो रही है…? या प्रोत्साहन हो रहा है. जब आप लोकतंत्र की न्यायपालिका को उसकी योग्यता पर चुनौती देते हैं उसका सार्वजनिक अपमान करते हैं क्योंकि इसका कोई प्रभावी स्तर का खंडन दिखाई नहीं देता, गलत बोलने वालों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जाती
।हद तब हो जाती है जब निशिकांत दुबे ने कहा था कि देश में जितने भी गृह युद्ध छिड़े हैं उसके जिम्मेदार सीजेआई संजीव खन्ना है।तो सवाल यह है की लगाम कौन लगाएगा इन माननीयों पर या फिर देश को गृह युद्ध में झोंकने के लिए वातावरण तैयार किया जा रहा है आरोप प्रत्यारोप लगाकर..?
यह अलग बात है कि जब भी इस प्रकार की डाइवर्ट करने वाली भाषा शैली भाजपा नेताओं की तरफ से आती है तो उसके पीछे कुछ बड़ी चीज छुपाने की बड़ी जद्दूजहद होती है ताकि हमलोग का जो लोकतंत्र है वह उसे गंभीर मुद्दे को भूल जाए और इस प्रकार की मुद्दों पर कुकुर-युद्ध या मुर्ग-युद्ध में जुट जाएं बहस बाजी में। लेकिन यह युद्ध अगर गृह युद्ध है और उसने आकार लिया तो देश कहां जाएगा…? इसकी कल्पना क्या इन बड़े पद में बैठने वालों ने की ही नहीं…?
या फिर सोचे समझे तरीके से कुछ लोगों को बचाने के लिए ऐसे बयान दिए जाते हैं तो यह भी सवाल है कि वह कौन लोग हैं अथवा वह कौन मुद्दे हैं जिन्हें बचाने के लिए देश को गृह युद्ध में डालने के हालात पैदा करने वाले बयान इन बयान वीरों द्वारा दिया जाता है और उसे संरक्षण मिलता है..
लेकिन जहां तक उपराष्ट्रपति जी की बात है उन्हें अब अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिए भारतीय न्यायपालिका को चुनौती नहीं देना चाहिए. वह बड़े पद पर स्थापित हैं कम से कम पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जो उनकी ही अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि के उपज थे उनसे सीखना चाहिए, भाषा किस स्तर पर संयमित हो..?
अपना नंबर बढ़ाने के लिए अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिए आखिर हम कब तक पूंछ हिलाते रहेंगे…? इस पूंछ हिलाओ प्रतियोगिता में देश का कहीं बंटाधार ना हो जाए…?
चलिए मान लें कि यह क्रांतिकारी विचारवीर हैं और ऐसे विचार अगर खौलते ही रहते हैं इन क्रांतिकारियों के दिमाग में तो वह उसे वक्त क्यों आत्महत्या कर लेते हैं जब देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू को अपेक्षित स्थान में चाहे वह भारत के नए संसद के उद्घाटन का अवसर हो या फिर 500 साल के बाद निर्मित हुए राम मंदिर के लोकार्पण मैं प्राथमिकता देने की बात हो अथवा उन्हें छतरपुर में एक छोटे से कार्यक्रम में बागेश्वर धाम में हाजिरी लगाने को पहुंचने की बात हो अथवा भारत रत्न देते वक्त लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष बैठे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खड़ी हुई भारत की राष्ट्रपति के नैतिक प्रोटोकॉल के पालन न होने की बात हो; इन क्रांतिकारी विचारों के विचार शून्य क्यों हो जाते हैं…?
यह तो सोचना ही चाहिए… तो इससे यह तय तो होता है कि सब कुछ सुनियोजित होता है नैतिकता अवसर के हिसाब से जिंदा होती है लेकिन अवसर किसके लिए है..? ऐसी आपदाएं किन के लिए पैदा की जाती हैं और अवसर तालासें से जाते हैं…?
इसलिए लगता है कि यह बहुत बड़े लोग हैं की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं इन “ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद” है शायद हमलोग आदिवासी क्षेत्र के निवासियों के समझ में नहीं आ रहा है.. इसलिए समझने का प्रयास करते हैं और कोई बात नहीं आपके समझ में आ जाए तो हमें भी बताइएगा इन ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद के बारे में…. जो देश को गृह युद्ध के हालात की कल्पना करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं को सुप्रीम संसद न बनने की सलाह देने के मामले में ऐसा आखिर वह क्यों सोचते रहते हैं..?
क्या भारतीय संविधान में संरक्षित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे उद्योग जो कानून की नहीं मानते हैं और भारी राजस्व की चोरी करते रहते हैं जमीनों पर हेरा फेरी करते रहते हैं ऐसे उद्योग पूरे भारत में जो अराजकता बनाए हुए हैं… अथवा विदेश में अदानी जैसे लोग अमेरिका अदालतों में अपराधी बनकर दबे हुए हैं उन्हें बचाने के लिए यह बयान वीर अपने बयान देते रहते हैं …?
हम अपने छोटी सी सोच में आदिवासी स्तर की सोच में क्यों न सोचें…? आखिर क्या कारण है कि जब जल गंगा संवर्धन अभियान प्रदेश में चल रहा है
तो शहडोल के एक किरण टॉकीज के पास गंगा नदी को संवर्धन करने वाले प्राचीन सरोवर-जल स्रोत को बचाने के लिए गत 16 दिन से हमलोग यानी आम आदमी क्रमिक अनशन कर इस भीषण गर्मी में शासन और प्रशासन को आगाह कर रहा है की गंगा को बचाने के लिए किरण टॉकीज के जल स्रोत को बचाना जरूरी है… और उसे नहीं बचाया जा रहा है…? क्या ऐसे भी बात इन्हीं भूमि अतिक्रमणकारियों को बचाने के लिए पूरे देश में हमलोग की नष्ट करने की कीमत पर बोले जाते हैं… चाहे वह उपराष्ट्रपति हों या सांसद हों कुछ भी बोलते रहेंगे और अखबारों में कब्जा कर लेंगे ताकि हमलोग की आवाज दवा दी जाए…?
क्योंकि बनारस पहुंचकर प्रधानमंत्री ने कहा था “गंगा ने उन्हें बुलाया है” क्या इस गंगा संवर्धन के लिए हम गिलहरी की भांति किरण टॉकीज के जल स्रोत को जिसे माफियाओं ने हत्या करने का प्रयास किया है, पुनर्जीवन नहीं दे सकते…?ऐसे न जाने कितने जल स्रोत शहडोल में या अन्य स्थानों में नष्ट कर दिए गए हैं और हम गंगा संवर्धन के प्रचार प्रसार की औपचारिकता में व्यस्त हैं..? हम ऐसा क्यों न सोचें और कोई बात नहीं….? यही वर्तमान का प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम् है।

