शहडोल , हाथी-राज और  राजा के पिलई  का रामराज्य रंगमंच ( त्रिलोकीनाथ )

Share

शहडोल । वैसे भी मध्य प्रदेश में जनसुनवाई बुरी तरह से फेल है लोगों को अपनी मांग में सुनाने के लिए या तो निर्वस्त्र होकर केला का पत्ता लपेटे कलेक्टर के यहां आना पड़ेगा या फिर कलेक्टर के यहां आकर उनकी छत से कूद कर आत्महत्या प्रयास करना पड़ेगा। शहडोल में हाई कोर्ट जबलपुर का वह आदेश जो मोहन राम मंदिर ट्रस्ट शेड्यूल के मामले में 2012 में इस बात के लिए किया गया था कि ट्रस्ट के पक्षकारों को हटाकर एसडीएम द्वारा गठित स्वतंत्र कमेटी को तब तक प्रभार दे कर काम करने दिया जाए जब तक प्रकरण पर निराकरण ना हो जाए। एसडीम में दबाव में आकर स्वतंत्र कमेटी को गठित करती लेकिन प्रभार पानी के लिए स्वतंत्र कमेटी के सदस्यों को यातो निर्वस्त्र होकर केला का पत्ता लपेटे जनसुनवाई में मांग करना चाहिए। या फिर उन्हें कलेक्टर कार्यालय में आकर आत्महत्या का प्रयास करना चाहिए शायद तभी स्वतंत्र कमेटी को मंदिर ट्रस्ट का प्रभाव हाई कोर्ट के आदेश के पालन मेंमिल सकता है। यही एक व्यवस्था बची रह गई है बाकी स्वतंत्र कमेटी मंदिर में गुंडागर्दी करते रहने वाले प्रभावशाली लोगों से प्रभार नहीं पा सकती पिछले 13 वर्षों से शहडोल में हाईकोर्ट के आदेश पालन यही दुर्दशा हैऔर हो भी क्यों ना 3 महीने से ज्यादा पानी की बावड़ी बचाने के लिए जन आंदोलन चल रहा है तो ना ही न्यायपालिका निर्णय ले पा रही है और ना ही कार्यपालिका…?  दोनों पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चड्ढा के धमक का दबाव इस कदर है की डर के मारे फाइल ट्रांसफर हो रही है ठोस निर्णय नहीं दिए जा रहे हैं शहडोल में चाहे बात हाथियो की हो या राजा के पिलई की दोनों कहीं भी किसी भी वक्त घुसकर मुंह मारते रहते हैं यह तो उदाहरण है एक डायनासोर रिलायंस इंडस्ट्रीज के नाम पर भी पिछले 15 सालों से बिना खनिज अधिनियम के अधीन अनुबंध कारण शहडोल की गैस को खा रहा है’

शहडोल , हाथी-राज और  राजा के पिलई  का रामराज्य रंगमंच
शहडोल, मध्य प्रदेश का वह अनोखा रंगमंच, जहां हाथी नाचते हैं, प्रशासन तालियां बजाता है, और जनता केले के पत्तों में लिपटकर अपनी फरियाद लेकर कलेक्टर कार्यालय की छत पर आत्महत्या का ड्रामा रचने को मजबूर है। यहां चार हाथी मस्ती में मगन हैं, जैसे कोई सर्कस का तंबू खुला छोड़ दिया गया हो। प्रशासन? वह तो बस दूरबीन लेकर इन हाथियों की निगरानी कर रहा है, मानो वे कोई पर्यटक हों, जो शहडोल की सैर पर निकले हों। कोई नियंत्रण? अरे, नियंत्रण तो तब होता जब कोई नियम-कानून होता! यहां तो हाथियों को आजादी है—जो चाहे तोड़ो, जो चाहे फोड़ो, बस मस्ती करो।
वैसे, ये हाथी कोई साधारण हाथी नहीं हैं। ये काले हाथी हैं, थोड़ी-सी सफेदी लिए, जो सुंदरता का प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन सुंदरता के पीछे इनका निरंकुश और अराजक स्वभाव छिपा है। ये शहडोल की सड़कों पर यूँ घूम रहे हैं, जैसे कोई राजा अपने पिल्लों के साथ जंगल सफारी पर निकला हो। और क्यों न निकलें? जब कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चड्ढा के दबाव में फाइलें इधर-उधर ट्रांसफर करने में व्यस्त हों, तो हाथी क्यों न नंगा नाच करें?
शहडोल में 2012 से हाई कोर्ट का एक आदेश धूल खा रहा है। मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में कोर्ट ने कहा था कि एक स्वतंत्र कमेटी बनाओ, उसे प्रभार दो, और जब तक प्रकरण का निराकरण न हो, उसे काम करने दो। लेकिन एसडीएम साहब ने दबाव में आकर कमेटी तो बनाई, पर प्रभार? अरे, प्रभार लेने के लिए तो कमेटी वालों को या तो केले का पत्ता लपेटकर जनसुनवाई में नाचना होगा या कलेक्टर कार्यालय की छत से कूदने का नाटक करना होगा। शायद तभी हाई कोर्ट के आदेश का पालन हो! तेरह साल बीत गए, लेकिन मंदिर में गुंडागर्दी करने वाले प्रभावशाली लोग अभी भी प्रभार थामे बैठे हैं, जैसे कोई कुश्ती का दंगल जीत लिया हो।
और ये तो बस शुरुआत है। शहडोल में पानी की बावड़ी बचाने के लिए तीन महीने से जन आंदोलन चल रहा है। लेकिन न न्यायपालिका कोई निर्णय ले पा रही है, न कार्यपालिका कोई कदम उठा रही है। फाइलें इधर से उधर, उधर से इधर, जैसे कोई ताश का खेल चल रहा हो। और उधर, एक डायनासोर—नाम है रिलायंस इंडस्ट्रीज—पिछले 15 सालों से बिना खनिज अधिनियम के अनुबंध के शहडोल की गैस चट कर रहा है। ये है रामराज्य का असली स्वरूप, जहां हाथी खुश, राजा के पिल्ले खुश, और जनता? वह तो बस स्टैंड के तीसरे “विकास” के नाम पर अपनी जमीनों की कीमत बढ़ने का इंतजार कर रही है।
कभी डेढ़ करोड़ के जुगाड़ में गांधी चौक की तीन दशक पुरानी समस्या ठीक करने का नाटक चलता है, तो कभी पुराने नाले बंद करके नया “पारदर्शी रामराज्य” स्थापित करने का सपना दिखाया जाता है। सब कुछ इतना पारदर्शी है कि जनता को साफ दिख रहा है—यहां कुछ ठीक होने वाला नहीं। शहडोल का यह रंगमंच “सितारे जमीन पर” फिल्म से कम नहीं, जहां हर कोई अपने-अपने सिंड्रोम से ग्रस्त है। कोई भ्रष्टाचार का सिंड्रोम, कोई लाचारी का, और कोई दबाव का।तो शहडोल में क्या बचा? बस हाथियों का नंगा नाच, राजा के पिलई की मस्ती, और जनता की उम्मीद कि शायद 75 साल बाद कोई रिटायर हो, और कोई नया अवसर लेकर आए। तब तक, केले के पत्ते तैयार रखिए, क्योंकि शहडोल में सुनवाई का यही एकमात्र रास्ता बचा है! ( त्रिलोकीनाथ )


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles