
इसी धनपुरी क्षेत्र में मुख्यमंत्री के आने के हफ्ते भर पहले गाय की हत्या कर उसकी मांस के व्यापार का पर्दाफाश आम नागरिकों द्वारा किया गया कथित दोषी भी पकड़े गए पुलिस ने मामला भी दर्ज किया मुख्यमंत्री के आने के पहले विभिन्न सामाजिक संगठनों और जिले मुख्यालय में सर्व समाज समन्वय समिति के लोगों ने भी इस गौ हत्या पर और गौ मांस पर कड़ी टिप्पणी की मुख्यमंत्री की उपस्थिति में विपक्षी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने भी गौ हत्या को लेकर भी एक प्रदर्शन किया किंतु इससे सनातनयादव समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपनी लंबी चौड़ी घोषणाओं में गौ हत्या के मामले में विस्तार से कोई आश्वासन धनपुरी गौ हत्या के मामले में नहीं प्रदर्शित किया 
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के 8 फरवरी 2026 को शहडोल जिले के दौरे पर विकास कार्यों की घोषणाओं और गौ-रक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार करते हुए यह स्पष्ट है कि गौ-संरक्षण की दिशा में राज्य सरकार की प्रतिबद्धता तो दिखाई देती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसकी प्रभावी क्रियान्वयन और पीड़ित गोपालकों को तात्कालिक राहत की कमी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
शहडोल दौरा और विकास घोषणाएँ
8 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शहडोल जिले में ग्राम गंधिया और धनपुरी सहित विभिन्न स्थानों पर कुल 747.91 करोड़ रुपये की लागत से 139 विकास कार्यों का लोकार्पण और भूमि-पूजन किया। इसमें धनपुरी में 20 करोड़ रुपये की लागत से बने जल क्रीड़ा संसाधन (वाटर पार्क) का शुभारंभ प्रमुख था। दौरा मुख्य रूप से जनजातीय क्षेत्रों के विकास, माता शबरी की जयंती समारोह और हितग्राहियों को लाभ वितरण पर केंद्रित रहा। उपलब्ध समाचारों और आधिकारिक रिपोर्टों में गौ-रक्षा या गौ-हत्या से जुड़ी कोई नई विशिष्ट घोषणा या टिप्पणी दर्ज नहीं हुई। मुख्यमंत्री ने सामान्य रूप से गौ-संरक्षण और डेयरी प्रोत्साहन पर पहले भी जोर दिया है, जैसे 2025 में “गौ-संरक्षण वर्ष” घोषित करना और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए 600 करोड़ रुपये की योजनाएँ।
धनपुरी में गौ-हत्या/तस्करी के मामले
धनपुरी क्षेत्र (बुढ़ार थाना अंतर्गत) में गौ-हत्या और गोमांस व्यापार के कई वीडियो और घटनाएँ वायरल हुई हैं। हाल के महीनों में:जंगल में गोवंश की हत्या कर गोमांस तस्करी के मामले सामने आए।एक गोपालक महिला का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उसकी गाय चुराकर गोमांस बेचने का आरोप लगा और वह रोते हुए थाने पहुँची।जनवरी 2026 में अमलाई ओपन कास्ट माइंस क्षेत्र में दूषित पानी से 8 से अधिक गोवंशों की तड़प-तड़पकर मौत हुई, जिसके लिए गौरक्षकों ने एसईसीएल प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया।
इन घटनाओं के बावजूद मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान धनपुरी में किसी विशिष्ट मामले पर टिप्पणी, जांच का आश्वासन या पीड़ित गोपालकों को मुआवजा घोषणा नहीं हुई। यह कमी गौ-रक्षा की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाती है, खासकर जब मुख्यमंत्री यादव समुदाय से हैं और सनातन परंपरा में गौ-रक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है।
मध्य प्रदेश में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है:
मध्य प्रदेश गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम, 2004 (2010 में संशोधित) के तहत गौ-वंश (गाय, बैल, बछड़ा आदि) के वध पर 7 साल तक की कैद और जुर्माना।गौ-मांस परिवहन/बिक्री पर सख्त प्रावधान, वाहन जब्ती सहित।राज्य में गौ-संरक्षण वर्ष (2024-25) घोषित, डेयरी किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य (देश के दूध उत्पादन में 9% से 20% योगदान)।मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना: पंजीकृत गौ-शालाओं में प्रति गाय प्रतिदिन 20 रुपये अनुदान (पुरानी योजना, अब भी सक्रिय)। हालिया योजनाएँ: गोशालाओं से मुफ्त गाय/बछिया वितरण + मासिक 1500 रुपये सहायता (फॉडर/दवा के लिए), नस्ल सुधार पर जोर।गौ-अभयारण्य और गो-वंश संरक्षण पर 600 करोड़ से अधिक बजट आवंटन।
फिर भी, जमीन पर प्रभाव सीमित दिखता है। शहडोल जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में तस्करी और हत्या के मामले जारी हैं, जबकि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ितों को मुआवजा मिलता है, लेकिन गौ-हत्या पीड़ित गोपालकों के लिए कोई समान तात्कालिक मुआवजा व्यवस्था नहीं है। यदि गौ-पालन को “आवश्यक उद्योग” घोषित कर गौ-हत्या पर दोषी के साथ गोपालक को मुआवजा देने की नीति बनती, तो संरक्षण मजबूत होता।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की गौ-रक्षा पर सामान्य प्रतिबद्धता (जैसे दैनिक गौ-सेवा और योजनाएँ) सराहनीय है, लेकिन शहडोल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्थानीय घटनाओं पर चुप्पी या कोई ठोस कार्रवाई न होना उनकी गरिमा और यादव समुदाय की परंपरा के अनुरूप नहीं लगता। पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में संवेदनशीलता बरतने की संवैधानिक आवश्यकता है, लेकिन गौ-संरक्षण पर मुआवजा/जांच की कमी से सुरक्षा की गारंटी कमजोर पड़ती है। गौ-हत्या रोकने के लिए कानून सख्त हैं, पर प्रभावी क्रियान्वयन, स्थानीय पुलिस सतर्कता और पीड़ितों को त्वरित राहत जरूरी है। अन्यथा, “सब भूमि गोपाल की” वाली भावना मात्र प्रतीकात्मक रह जाएगी।

