
इस्लामाबाद वार्ता (11-12 अप्रैल 2026) अमेरिका और ईरान के बीच क्यों विफल हुई?
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी और ईरानी संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर घलीबाफ के नेतृत्व में ईरानी टीम के बीच 21 घंटे की मैराथन वार्ता हुई। यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच उच्चतम स्तर की सीधी/मध्यस्थता वाली बातचीत थी। एक अस्थायी सीजफायर के बीच हुई इस वार्ता का मकसद मध्य पूर्व के युद्ध को खत्म करना था, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं।
मुख्य कारण वार्ता इन मुद्दों पर अटक गई:
ईरान का परमाणु कार्यक्रम
अमेरिका ने मांग की कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने की स्पष्ट, लंबी अवधि की प्रतिबद्धता दे और तेजी से हथियार बनाने वाले उपकरण/यूरिनियम स्टॉक (लगभग 900 पाउंड) को हटाए। ईरान ने इसे अत्यधिक और संप्रभुता का उल्लंघन बताया। अमेरिका के लिए यह “कोर डिमांड” था, जबकि ईरान ने इसे अस्वीकार कर दिया।
होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण
अमेरिका ने मांग की कि जलडमरूमध्य सभी के लिए खुला रहे और उसकी सुरक्षा अमेरिकी शर्तों पर हो। ईरान ने अपना नियंत्रण बनाए रखने पर जोर दिया और इसे पूर्ण शांति समझौते के बाद ही मानने को कहा। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम रास्ता है, इसलिए दोनों पक्ष अड़े रहे।
लेबनान/हिजबुल्लाह और व्यापक सीजफायर
ईरान ने लेबनान में इजरायल के हमलों को रोकने और हिजबुल्लाह से जुड़े मुद्दों को शामिल करने की मांग की। अमेरिका ने इसे अस्वीकार किया।
अन्य मुद्दे: प्रतिबंध हटाना , युद्ध क्षतिपूर्ति और विश्वास की कमी। ईरान ने कहा कि अमेरिका ने “excessive/unreasonable demands” रखीं, जबकि वेंस ने कहा कि ईरान ने “हमारी शर्तें स्वीकार नहीं कीं”
वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: “यह ईरान के लिए बुरी खबर है… हमने अपना अंतिम और सबसे अच्छा प्रस्ताव रख दिया है।” ईरानी विदेश मंत्रालय ने इसे “अनुचित मांगों” का परिणाम बताया।
क्या संभावना अभी जिंदा है?
हाँ, पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन बहुत नाजुक और कमजोर है। अमेरिकी पक्ष: वेंस ने कहा कि प्रस्ताव अभी टेबल पर है—ईरान अगर स्वीकार करे तो डील हो सकती है। लेकिन उन्होंने “फाइनल ऑफर” कहा, इसलिए शॉर्ट टर्म में नई डायरेक्ट टॉक्स की संभावना कम लग रही है। बैकचैनल या अप्रत्यक्ष बातचीत हो सकती है।
ईरानी पक्ष: कुछ अधिकारी कह रहे हैं कि “डिप्लोमेसी कभी खत्म नहीं होती” और एक राउंड में समझौता अपेक्षित नहीं था। लेकिन स्टेट मीडिया ने कहा कि अभी अगला राउंड प्लान नहीं है—ईरान “जल्दबाजी में नहीं” है। उन्होंने पाकिस्तान को धन्यवाद दिया और अमेरिका से “गुड फेथ” की मांग की।
पाकिस्तान की भूमिका: पाकिस्तान (मध्यस्थ) ने कहा कि वह बातचीत जारी रखेगा।
विश्लेषण: दोनों तरफ अत्यधिक जिद हैं। सीजफायर 22 अप्रैल तक है—अगर कोई प्रगति नहीं हुई तो युद्ध फिर शुरू हो सकता है। लेकिन डिप्लोमेसी का दरवाजा बंद नहीं हुआ है; भविष्य में अप्रत्यक्ष या निचले स्तर की बातचीत संभव है, बशर्ते दोनों पक्ष कुछ रियायत दें।संक्षेप में: वार्ता विफल हुई क्योंकि परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जैसे रेड लाइन मुद्दों पर कोई समझौता नहीं हुआ। संभावना जिंदा है, लेकिन दोनों देशों की जिद और क्षेत्रीय तनाव (इजरायल-लेबनान) इसे मुश्किल बना रहे हैं। अगले कुछ दिनों/हफ्तों में स्थिति स्पष्ट होगी—या तो बैकचैनल से प्रगति, या फिर तनाव बढ़ना। (ग्रोक)
आशा भोसले का 92 वर्ष की आयु में निधन
लंबी बीमारी और कार्डियक अरेस्ट के बाद मुंबई में ली अंतिम सांस, संगीत जगत में शोक की लहर मुंबई, भारतीय संगीत जगत के लिए एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। महान गायिका आशा भोसले का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। बताया जा रहा है कि उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, जिसके चलते उनका निधन हो गया। जानकारी के अनुसार, बीती रात उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था, जिसके बाद तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे पहले उनकी पोती जनाई भोसले ने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया था कि आशा भोसले को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी और उनके फेफड़ों में संक्रमण था। उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी दादी को काफी कमजोरी महसूस हो रही है और उनका इलाज जारी है। आशा भोसले का अंतिम संस्कार मुंबई के शिवाजी पार्क में किया जाएगा, जहां उनके चाहने वाले और संगीत जगत से जुड़े लोग उन्हें अंतिम विदाई देंगे। उनके निधन की खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। आशा भोसले भारतीय संगीत की उन महान हस्तियों में से थीं, जिन्होंने अपने करियर में सात दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहकर संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने करीब 12,000 से अधिक गीत गाए, जिनमें हिंदी के अलावा कई अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के गीत भी शामिल हैं।(ईएमएस)।
रुपया गुरुवार को डॉलर के मुकाबले 92.51 पर बंद
मुंबई (ईएमएस)। रुपया शुक्रवार को 10 पैसे मजबूत होकर 92.41 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि रुपये में कारोबार के दौरान भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है क्योंकि बैंकों को अपने ओवरनाइट पोजीशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित करने के लिए केंद्रीय बैंक के निर्देशों की समय सीमा आज समाप्त हो रही है।
35 साल की रिसर्च में खुलासा, देश से 80 प्रतिशत बंदर हुए कम
(ईएमएस)।भोपाल
आजकल हाइवे और दूसरे सडक़ मार्गों और यहां तक रहवासी बस्तियों में बंदरों के झुंड के झुंड नजर आते हैं। इन झुंडों को देखकर हम समझते हैं कि बंदरों की संख्या इतनी ज्यादा हो गयी है कि वो जंगलों से रहवासी इलाकों की तरफ रूख करने लगे हैं। लेकिन हकीकत कुछ और ही है और प्रकृति को लेकर चिंता बढ़ाने वाली है। देश के जाने माने जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर मेवासिंह ने पिछले 35 सालों से बंदरों पर अध्ययन किया है और उनके मार्गदर्शन में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को आगे बढ़ाया है। जिसमें पाया गया है कि बंदरों की संख्या तेजी से कम हो रही है। उनका दावा है कि, 80 फीसदी बंदर खत्म हो चुके हैं, क्योंकि जंगलों में बंदरों को खाने के लिए कुछ नहीं बचा है, इसी वजह से वो बस्तियों और खेतों की तरफ रूख कर रहे हैं और अगर जंगल से बंदर खत्म हो गए, तो धीरे-धीरे जंगल खत्म हो जाएगा। क्योंकि जंगल के विस्तार में बंदरों की अहम भूमिका होती है और फल खाकर सबसे ज्यादा उनके बीजों का फैलाव बंदर ही करते हैं। देश के जाने माने वैज्ञानिक प्रोफेसर मेवाराम की रिसर्च सागर विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग में व्याख्यान देने पहुंचे प्रोफेसर मेवासिंह देश के जाने माने जीव वैज्ञानिक हैं। जिनका जीव विज्ञान और खासकर पशु व्यवहार को लेकर शोध में देश और दुनिया में बड़ा नाम है। जो मैसूर यूनिवर्सिटी के विशिष्ट प्रोफेसर हैं, जिनके 200 से ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं। उनके द्वारा संपादित मकाक सोसाइटीज – ए मॉडल फॉर द स्टडी ऑफ सोशल ऑर्गेनाइजेशन कैम्ब्रिज यूनिवर्सटी ने प्रकाशित की है। प्रोफेसर मेवा सिंह दुनिया भर में प्राइमेटोलॉजिस्ट (बंदर विशेषज्ञ) के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने बंदरों के व्यवहार पर 35 साल के आंकड़े इक_ा किए हैं। उन्होंने मुख्य रूप से कर्नाटक के मध्य पश्चिमी घाट की अघनाशिनी और शरावती नदियों के जंगलों में बंदरों के प्राकृतिक आवास पर अध्ययन किया है। जिसको उनके शिष्य लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा कर्नाटक के शहरी क्षेत्रों में भी बंदरों के व्यवहार और भोजन पर अध्ययन किया है।

